Srishti Khanda Extracted Page 363

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-363

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Sanskrit Original

गमिष्ये ब्रह्मसदनं त्वं च तिष्ठ वरानने। एवमुक्त्वा गतो रुद्रो गौरी तत्र व्यवस्थिता ॥१७०॥ कृतं युगं समग्रं च चज्ञेतस्मिन्हुताशनः । वहंस्तु हव्यं देवानां प्रीणयानो जगत्त्रयम् ॥१७ ९॥ भोजनं द्विजमुख्येषु भोगान्विद्याधरे गणे। कामावाप्तिं मनुष्येषु सर्वमेव ददौ प्रभुः ॥१७२॥ रुद्रेणोक्तस्तदाविष्णु धर्मास्ते त्वं प्रकीर्त्य । गौरीधर्मन्सरस्वत्या व्रतं यत्परिकीर्तितम् ॥१७३॥ इत्येवमुक्ते रुद्रेण विष्णुः प्रोवाच सादरम्। नाहं धर्म ख्यापयिष्ये स्वकीयं शंकराधुना ॥१७४॥ भवानाख्यातु महात्म्यं मदीयं सुरसत्तम । त्वया वै कथितं पूर्वं कृते वै पापसंक्षयः ॥१७५॥ भविष्यति न संदेहो भवान् पूतो भविष्यति । भीष्म उवाच मधुरा गीर्भवेत्केन व्रतेन मुनिसत्तम ॥१७६॥ तथैव जनसौभाग्यं मतिर्विद्यासु कौशलम् । अभेदश्वापि दांपत्ये संगो बंधुजनेन च॥१७७॥ आयुश्च विपुलं पुंसां तन्मे कथय सत्तम । पुलस्त्य उवाच सम्यकपृष्टं त्वया राजन् शृणु सारस्वतं व्रतम् ॥१७८॥ यस्य संकीर्तनादेव देवीतुष्येत्सरस्वती। यावद्धक्तः स्तवं कुयदितद्व्रतमनुत्तमम्॥९७९॥ प्राग्वासरादौ संपूज्य दिव्यं स्तवं समारभेत् । अथवा रविवारेण ग्रहताराबलेन च ॥१८०॥ पायसं भोजयेद्विप्रान् कुर्याद्वाह्मणवाचनम् । शुक्लवस्त्राणि दत्त्वा च सहिरण्यानि शक्तितः॥ ९८ १॥ गायत्रीं पूजयेद्भक्त्या शुक्लमाल्यानुलेपनैः । यथा न देवि भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ॥१८२॥ त्वां परित्यज्य तिष्ठेच्च तथा भव वरप्रदा । वेदशास्त्राणि धर्माणि नृत्यगीतादिकं च यत् ॥१८३॥ के कारण मैंने तथा विष्णु ने क्रुद्ध हुयी सावित्री देवी को मानाया ॥१६९॥ हे वरानने ! तुम यहीं रहो मैं ब्रह्माजी के घर जाऊँगा,यह कहकर रुद्र ब्रह्माजी के लोक में चले गये और गौरी वहीं स्थित रही ॥१७०॥ पूरे सत्ययुग पर्यन्त अग्निदेव उस यज्ञ में देवों के हविष्य का वहन तथा त्रैलोक्य का प्रीणन करते रहे ॥१७१॥ ब्रह्माजी उस यज्ञ में श्रेष्ठ - ब्राह्मणों को भोजन, विद्याधरों को भोग तथा मनुष्यों की सारी कामनाओं की पूर्ति करते रहे ।। १७२॥ रुद्र ने भगवान् विष्णु से कहा कि आप अपने धमों को बतलायें, शङ्करजी के इस तरह कहने पर भगवान् विष्णु ने आदर पूर्वक कहा। विष्णु ने कहा-- हे शङ्कर इस समय में अपने धर्मो की स्थापना नहीं करूँगा ॥१७४॥ हे सुरश्रेष्ठ ! आप ही मेरे माहात्म्य का वर्णन करें । आपके द्वारा सर्वप्रथम उसका वर्णन किए जाने पर उसका अनुष्ठान करने से पापों का नाश होगा ॥१७५॥ और आप भी निःसन्देह रूप से पवित्र हो जायेंगे । भीष्मजी ने कहा- हे मुनिश्रेष्ठ ! किस ब्रत को करने से वाणी मधुर होती है? ॥१७६। आप मुझे उस ब्रत को बतलायें जिसके करने से सौभाग्य, विद्या की कुशलता, पति-पत्नी में प्रेम, बान्धवों से सम्बन्ध तथा विपुल मात्रा में आयु की प्राप्ति होती है । महर्षि पुलस्त्य ने कहा-- हे राजन् ! आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, अतएव आप सारस्वत व्रत का श्रवण करें ।॥ १७७- १७८॥ मनुष्य जब तक इस सर्वोत्तम व्रत को करता है, तब तक इसके कीर्तन मात्र से सरस्वती देवी प्रसन्न रहती हैं।१७९॥दिन के प्रारम्भ में (प्रातःकाल) सरास्वती देवी की पूजा करके इस दिव्य स्तोत्र को प्रारम्भ करना चाहिये। अथवा जिसरविवार को ग्रहों तथा तारा का बल प्राप्त हो ॥१८०॥ उस दिन ब्राह्मणों को खीरान्न (पायस) भोजन कराकर फिर ब्राह्मणों से स्वस्ति वाचन कराये । अपनी शक्ति के अनुसार सुवर्ण के साथ धवल वस्र प्रदान करे। १८१।। उसके बाद भक्तिपूर्वक श्वेत माला तथा श्वेत चन्दनादि से गायत्री देवी की पूजा करे । उसके बाद प्रार्थन करे- हे देवि !

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