Srishti Khanda Extracted Page 362

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-362

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Sanskrit Original

अब्दोदकं तथा वारि कुष्ठचूर्णान्वितं पुनः । उशीरसलिलं चैव यवचूणोंदक पुनः ॥१५५॥ तिलोदकं च संप्राश्य स्वपेन्मार्गशिरादिषु। मासेषु पक्षद्वितयं प्राशनं समुदाहृतम् ॥१५६॥ सर्वत्र शुक्लपुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने। दानकाले च सर्वत्र मंत्रमेतमुदीरयेत् ॥१५७॥ गौरी मे प्रीयतां नित्यमघनाशाय मङ्गला। सौभाग्यायास्तु ललिता भावानी सर्वसिद्धये ॥१५८॥ संवत्सरांते लवणं गुडकुंकुमसंयुतम् । चंदनेन युतं कुंभं सहस्वर्णास्बुजेन च ॥१५९॥ उमायाः प्रीतये हैमं तद्वदिक्षुफलैर्युतम् । सास्तरावरणां शय्यां सविश्रामां निवेदयेत् ॥१६०॥ सपत्मीकाय विप्राय गौरी मे प्रीयतामिति । आत्मानंदकरीं नाम प्राप्तुयात्संपदं नरः ॥१६९॥ आयुरानंदसंपन्नो न क्वचिच्छोकमाप्रुयात् । नारी वा कुरुते यातु कुमारी विधवा तथा ॥१६२॥ सापि तत्फलमाप्नोति देव्यनुग्रहलालिता । प्रतिपक्षमुपोष्यैवं मंत्रार्चनविधानतः ॥१६ ३॥ रुद्राणां लोकमाप्रोति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। इमां यः शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वापि भक्तितः ॥१६४॥ शक्रलोकं स गत्वा तु पूज्यते कल्पसंस्थितः । शङ्कर उवाच एवंविधा भवति चेन्नारी व्रतपरायणा ॥१६५॥ सावित्री तु वराकी सा तस्याः शापस्तु कीदृश:। न काचिद्रणना चास्ति यतस्रैलोक्यसुंदरी ॥१६६॥ सापूर्वस्यापि वन्द्या च लक्षमीर्विष्णुप्रतिग्रहात् । मया पूर्व॑ तवार्थाय दक्षयज्ञस्तु नाशितः ॥१६७॥ लक्ष्म्यर्थं विष्णुना चापि वारिधिर्मथितः पुरा। आज्ञाकरौ भवत्योश्च मा कुरुष्व भयं क्वचित्॥१६८॥ सावित्र्या माननाकार्या कुपितायाः प्रसादनम् । मया च विष्णुना चैव ब्रह्मणामानमीप्सुना ॥१६९॥ का जल, मेघ का जल तथा कूठ के चूर्ण मिश्रित जल, खश के जल तथा यव के चूर्ण से युक्त जल तथा तिल का जल मार्गशीर्ष आदि चार महीनों में दोनों पक्षों में पीकर सो जाय ॥१५४-१५६॥ सभी पूजाओं में उजले फूल से पूजन श्रेयस्कर है और दान करते समय सदा इन मन्त्रों को बोलना चाहिए ॥१५७॥ मेरे ऊपर गौरी देवी प्रसन्न हो,मङ्गला देवी मेरे पापों का विनाश करें, ललिता देवी मुझे सौभाग्य प्रदान करें तथा भवानी सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करें ॥१५८॥ संवत्सर के अन्त में, नमक, गुड, कुंकुम, चन्दन तथा स्वर्ण निर्मित कमल के साथ, ईख तथा फल के साथ सुवर्ण घट का दान उमा देवी की प्रसन्नता के लिए करे तथा चादर तथा विस्तर से युक्त सुखप्रद शय्या का दान सपत्नीक ब्राह्मण को गौरी मे प्रीयताम् कह कर दे ।।१५८-१६०॥ ऐसा करने वाला पुरुष आत्मानन्द प्रदान करने वाली सम्पत्ति को प्राप्त करता हे ॥१६१॥ आयु तथा आनन्द से सम्पन्न उस पुरुष को कभी भी शोक नही प्राप्त होता है । यदि कोई स्त्री, कुमारी अथवा विधवा इस ब्रत को करती है तो ॥१६२॥ वह भी देवी की कृपा से उसी फल को प्राप्त करती है । प्रत्येक पक्ष, में मन्त्रो द्वारा विधिपूर्वक पूजा करने वाला व्यक्ति पुनरावृत्ति से रहित रुद्रो के लोक में जाता है । जो पुरुष इस प्रसङ्ग को भक्ति पूर्वक पढता अथवा सुनता है, वह इन्द्रलोक में जाकर एक कल्प तक पूजा प्राप्त करता है शङ्करजी ने कहा-- यदि इस तरह से कोई नारी ब्रत करती है ॥१६३-१६५॥ तो उसके लिए बेचारी सावित्री तथा उसके शाप का क्या महत्त्व है, क्योंकि देवी तो त्रैलोक्य सुन्दरी है ॥१६६॥ त्रैलोक्य सुन्दरी देवी तो पहले लक्ष्मी की भी वन्द्या है । लक्ष्मी विष्णु भगवान् की पत्नी पूज्या हैं । प्राचीन काल में लक्ष्मी को प्राप्त करने के लिए श्रीभगवान् विष्णु ने समुद्र का मन्थन किया । सावित्री तो आप दोनों (भवानी तथा लक्ष्मी) की आज्ञा का पालन करने वाली हैं । अतएव भयमत करो ॥१६७-१६८॥। ब्रह्माजी का मान बढाना चाहने

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