Srishti Khanda Extracted Page 361
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-361
Sanskrit Original
श्रीपद्ममह!पुराण स्तनौ चानंदकारिण्यै शङ्करस्येदुधारिणे। उत्कंठिन्ये नमः कंठंनीलकंठाय वै हरेः ॥१४३॥ करावुत्पलधारिण्यै रुद्राय जगतः प्रभोः। बाहू च परिरंभिण्यै नृत्यप्रीताय वै हरेः॥१४४॥ देव्या मुख विलासिन्यै वृषभाय पुनर्विभोः। स्मितं च स्मरणीयायै विश्ववक्त्राय वै विभोः॥१४५॥ त्रे मंदारवासिन्यै विश्वधाम्ने त्रिशूलिनः । भ्रुवौ नृत्यप्रियाये च शंभोर्वे पाशशूलिने ॥१४६॥ देव्या ललाटमिन्द्राण्यै वृषवाहाय वै विभोः । स्वाहायै मकुटं देव्या विभोगंगाधराय वै ॥१४७॥ विश्वकायौ विश्वभुजौ विश्वपादमुखौ शिवौ । प्रसन्नवरदौ वदे पार्वतीपरमेश्वरौ॥१४८॥ एवं संपूज्य विधिवदग्रतः शिवयोः पुनः । पद्मोत्पलानि रजसा नानावर्णेन कारयेत् ॥१४९। शंखचक्रे सकटके स्वस्तिकं शुभकारकम्। यावंतः पांसवस्तत्र रजसः पतिता भुवि ॥१५०॥ तावद्वर्षसहस्राणि शिवलोके महीयते। चत्वारि घृतपात्राण सहिरण्यानि शक्तितः ॥१५९॥ दत्वा द्विजाय करकमुदकेन समन्वितम् । प्रतिपक्षं चतुर्मासं यावदेतान्निवेदयेत् ॥१५२॥ ततस्तु चतुरो मासान् पूर्ववत्करकोपरि। चत्वारि घृतपात्राणि तिलपात्राण्यनंतरम् ॥९५३॥ गंधोदकं पुष्पवारि चंदनं कुङ्कमोदकम्। अपक्वं दधि दुग्धं च गोशृंगोदकमेव च ॥१५४॥ माधव्यै नमः नाभिं पूजयामि इस मन्त्र से देवी की नाभि की पूजा करे, भवाय नमः इस मन्त्र से शङ्करजी की पूजा करे ॥१४२॥ आनन्दकारिण्यै नमः इस मन्त्र से देवी के स्तनों की पूजा करे इन्दुधारिणे नमः मन्त्र से शङ्करजी के स्तनों की पूजा करे, उत्कण्ठिन्यै नमः इस मंत्र से देवी के कण्ठ की पूजा करे और नीलकण्ठाय नमः इस मन्त्र से शङ्करजी के कण्ठ की पूजा करे ॥१४३॥ उत्पलधारिण्यै नमः इस मन्त्र से देवी के दोनों हाथों की पूजा करे और रुद्राय नमः इस मन्त्र से जगत् के स्वामी शङ्करजी की पूजा करे परिरम्भिण्यै नमः इस मन्त्र से देवी की दोनों भुजाओं की पूजा करे और नृत्यप्रीताय नमः इस मन्त्र से श्रीशङ्करजी के भुजाओं की पूजा करे ॥१४४॥ विलासिन्यै नमः इस मन्त्र से देवी के मुख की पूजा करे, वृषभाय नमः इस मंत्र से शङ्करजी के मुख की पूजा करे। स्मरणीयायै नम: इस मन्त्र से देवी के स्मित (ओष्ठों) की पूजा करे और विश्ववक्त्राय नमः इस मन्त्र से शङ्करजी के स्मित की पूजा करे ॥१४५॥ मन्दारवासिन्यै नमः इस मन्त्र से देवी के दोनों नेत्रों की पूजा करे और विश्वधाम्ने नमः इस मन्त्र से शङ्करजी के नेत्रों की पूजा करे, जृत्यप्रियाये नमः इस मंत्र से देवी के दोनों भौहों की पूजा करे और पाशशूलिने नमः इस मन्त्र से शङ्करजी के भौहों की पूजा करे ॥१४६॥ इन्द्राण्यै नमः इस मन्त्र से देवी के ललाट की पूजा करे, वृषबाहाय नमः इस मन्त्र से शङ्करजी के ललाट की पूजा करे । स्वाहायै नमः इस मन्त्र से देवी के मुकुट की पूजा करे और गङ्गाधराय नमः इस मन्त्र से शङ्करजी के भृकुटी की पूजा करे ॥१४७॥ इसके बाद प्रार्थना करे में जगत् शरीरक, विश्वबाहु, विश्वपाद, विश्वमुख, विश्व के कल्याण स्वरूप, प्रसन्न तथा वरदान देने वाले पार्वती और परमेश्वर (शिवजी) की वन्दना करता हूँ ॥१४८॥ इसतरह पार्वती एवं शङ्कर की विधिपूर्वक पूजा करके उनके सामने नील कमल तथा कमलों का निर्माण अनेक रङ्गों से करे ॥१४९॥ शङ्क, चक्र, कटक तथा मङ्गलमय स्वस्तिक चिह्नों का निर्माण कराये इन सबों के बनाने में जितन रजकण पृथिवी पर पड़ते हैं, उतने हजार वर्ष तक ब्रती शिव लोक में सुशोभित होता है । घी से भरे चार पात्र तथा उसमें अपनी शक्ति के अनुसार सुवर्णा।१५०-१५१॥ तथा जल भरे करक को ब्राह्मण को चार मासों तक प्रत्येक पक्ष में दान करे ॥१५२॥ उसके बाद चार मासों तक पहले के ही समान करक के ऊपर चार घी के पात्रों को रखे, उसके ऊपर तिल भरे पात्रों को रखे ॥१५३॥ चन्दन का जल, फूल का जल, चन्दन, कुंकुम का जल, विना गर्म किए दूध एवं दही, गौ के शृङ्ग
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