Srishti Khanda Extracted Page 360
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-360
Sanskrit Original
तद्होमिथुन॑ चैव सुवर्णस्य सितांबरम् । सवस्त्रं भाजनं दद्याद्धवानी प्रीयतामिति ॥१३१॥ अनेन विधिना यस्तु रसकल्याणिनीव्रतम् । कुर्याच्च सर्वपापेभ्यस्तत्क्षणादेवमुच्यते ॥१३२॥ भवानां च सहस्रं तु न दुःखीजायते क्वचित् । अग्निष्टोमसहस्रेण यत्फलं तदवाप्नुयात् ॥१३३॥ नारी वा कुरूते या तु कुमारी वा वरानने। विधवा च वराकी वा सापि तत्फलभागिनी॥९३४॥ सौ भाग्यारोग्यसंपन्ना गौरीलोके मही यते इति पठति य इत्थं यः शृणोति प्रसंगात् सकलकंलुषमुक्तः पार्वतीलोकमेति ॥१३५॥ मतिमपि च विधत्ते यो नराणां प्रियार्थं विवुधपतिजनानां लोकगः स्यादमोघः । तथैवान्या प्रवक्ष्यमि तृतीयां पापनाशिनीम् ॥१३६॥ नाम्ना च लोकविख्यातामम्र्यानंदकरीमिमाम्। यदा शुक्लतृतीयायामाषाढक्ष॑ भवेत्क्वचित् ॥१३७॥ ब्रह्मर्ध वाथा च मघा हस्तो मूलमथापि वा । दर्भगंघोदकैः स्नानं तदा सम्यक्समाचरेत्॥१३८॥ शुक्लमाल्यांबरधरः शुक्लगंधानुलेपनः । भवानीमर्चयेद्धक्तया शुक्लपुष्पैः सुगंधिमिः॥१३९॥ महादेवं च सकलमुपविष्टं महासने । वासुदेव्यै नमः पदौ शंकरायै नमो हरेः॥९४०॥ जंघे शोकविनाशिन्यै मानदायै नमः प्रभोः । रंभायै पूजयेदूरू शिवाय च पिनाकिने ॥९४९॥ आनंदिन्यै कटि देव्याः शूलिनश्शूलपाणये। माधव्यै च तथा नाभिमथ शंभो भवाय वै॥१४२॥ को अक्ष सूत्र तथा कमण्डलु से युक्त होना चाहिए । चार भुजाओं, चन्द्रमा तथा दो श्वेत वस्त्रो से ढंकी हुयी मूर्ति को होनी चाहिए ॥|१३०॥ इसी तरह सुवर्ण की गौ तथा वृषभ को भी होना चाहिए । श्वेत वस्त्र से युक्त, वस्त्र तथा पात्र सहित होना चाहिए । इन सबों को भवानी प्रीयताम् कहकर दान देना चाहिए ॥१३१॥ जो व्यक्ति इस विधि से रस कल्याणिनी व्रत को करता है, वह तत्क्षण ही समस्त पापों से रहित हो जाता है ॥१३२॥ वह हजारों शिव के काल तक कभी दुःखी नहीं होता है । वह हजारो अग्निष्टोम याग के करने का फल प्राप्त करता हें ॥१३३॥ कोई नारी, या कुमारी या विधवा भी यदि इस व्रत को करे तो वह भी फल को प्राप्त करती हे । इस व्रत को करने वाली सौभाग्य तथा आरोग्य से सम्पन्न होकर गौरी के लोक में सुशोभित होती है । जो व्यक्ति इस व्रत के प्रसङ्ग को पढता है या सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर पार्वतीजी के लोक में जाता है ॥१३५॥ जो कोई इस व्रत को करने के लिए दूसरे को प्रेरित करता है, वह भी प्रजापति के लोक में जाता है । यह अमोघत्रत है । अब मैं पापनाशिनी तृतीया के ब्रत का वर्णन करता हूँ ॥१३६॥ वह अपने इस नाम से लोको में विख्यात है तथा वह सर्वश्रेष्ठ आनन्द प्रदान करने वाली है । जब कभी भी तृतीया को आषाढा (जैसे पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा) नामक नक्षत्र हो, या ब्रह्मनक्षत्र (अभिजित्) हो या मघा अथवा हस्त नक्षत्र हो, या मूल नक्षत्र हो तो उस समय कुश तथा चन्दन के जल से अच्छी तरह से स्नान करे ।।१३८॥ व्रती श्वेत वस्त्र तथा श्वेत माला धारण करे । वह श्वेत चन्दन लगाये । उसके बाद विधिपूर्वक श्रेष्ठ आसन पर उपविष्ट भवानी तथा शङ्करजी की पूजा सुगन्धित श्वेत पुष्पों से करे ॥१३९॥ वासुदेव्यै नमः पादौ पूजयामि इस मन्त्र से भवानी के चरणों की पूजा करे और शङ्करायै नमः इस मन्त्र से शङ्करजी के चरणों की पूजा करे ॥१४०॥ शोक विनाशिन्यै नमः जङ्घे पूजयामि इस मंत्र से भवानी के जङ्घाओं की पूजा करे और मानदायै नमः इस मंत्र से शङ्करजी के जङ्घाओं की पूजा करे । रम्भायै नमः ऊरू पूजयामि इस मंत्र से देवी के ऊरू प्रदेश की पूजा करे और शिवाय नमः इस मन्त्र से शङ्करजी के ऊरूप्रदेश की पूजा करे ॥१४१॥ आनन्दिन्यै नमः कटिं पूजयामि इस मन्त्र से देवी के कटि प्रदेश की पूजा करे और शूलपाणये नमः इस मन्त्र से शङ्करजी की पूजा करे।
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know