Srishti Khanda Extracted Page 359
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-359
Sanskrit Original
एवं संपूज्य विधिवदिह्वजदांपत्यमर्चयेत्। भोजयित्त्वा तथान्नेन मधुरेण विमत्सरः ॥१९७॥ समोदकं वारिकुंभं शुक्लांबरयुगद्दयम् । दत्त्वा सुवर्णकमलं गंधमाल्यैरथार्चयेत्॥९ १ ८॥ प्रीयतामत्र कुमुदागृह्णीयाल्लवणब्रतम् । अनेन विधिना देवीं मासि मासि सदार्चयेत् ॥१९९॥ लवणं वर्जयेन्माघे फाल्गुने च गुडं पुनः ! नवनीतं तथा चैत्रे वर्ज्य मधु च माधवे ॥१२०॥ पानीयं ज्येष्टमासे तु तथाषाढे च जीरकम् । श्रावणे विर्जयेत्क्षीर दधि भाद्रपदे तथा ॥१२१॥ घृतमाश्वयुजे तद्वदूर्जे वर्ज्यं च माक्षिकम्। धान्याकं मार्गशीर्षे तु पौषे वर्ज्या च शर्करा॥१२२॥ ब्रतांते करकं पूर्णमेतेषां मासि मासि च । दद्याद्विकालवेलायां भक्ष्यपात्रेण संयुतम् ॥१२३॥ लङुकास्सेवकाश्चैव संयावमथ पूरिका । नारिका घृतपूर्णाश्च पिष्टपूर्णा च नंदिकी ॥१२४॥ क्षीरशाकं च दध्यन्नं पिंडशाकं तथैव च। माघादौ क्रमशो दद्यादेतानि करकोपरि ॥१२५॥ कुमुदा माधवी रंभा सुभद्रा च शिवा जया। ललिता कमलाऽनंगा मंगला रति लालसा ॥१२६॥ क्रमान्माघोदिमासेषु प्रीयतामिति कीर्तयेत् । सर्वत्र पंचगव्यं च प्राशनं समुदाहृतम् ॥९२७॥ उपवासी भवेन्नित्यमशक्तौ नक्तमिष्यते । कुयदिवमिदं नारी रसकल्याणिनीब्रतम् ॥१२८॥ पुनमघि च संप्राप्ते शर्कराकलशोपरि । कृत्वा तु कांचनीं गौरी पंचरत्नसमन्विताम् ॥१२९॥ स्वकीयांगुष्ठमात्रं च साक्षसूत्रकमंडलुम्। चतुर्भुजामिंदुयुतां सितनेत्रपड्टावृताम् ॥९३०॥ कामिन्यै नमः, वासुदेव्यै नमः, जगछियै नमः, आनन्ददायै नमः, नन्दायै नमः तथा सुभद्रायै नमः इन मन्त्रो से भी देवी की पूजा करे ॥११६॥ इसतरह से अच्छी तरह से पूजा करके ब्राह्मणदम्पती की पूजा करे तथा प्रसन्नता पूर्वक उन्हें मधुर अन्न का भोजन कराकर ॥११७॥ मिठायी, जल का घड़ा तथा दो वस्त्र प्रदान करे । उसके बाद सुवर्ण निर्मित कमल देकर चन्दन और माला से पूजा करे ॥११८। और कहे कि इस मेरे लवणब्रत को स्वीकार करके कुमुदादेवी प्रसन्न हों । (इदं लवणव्रतं स्वीकृत्य कुमुदादेवी प्रीयताम् न मम) इसी विधि से प्रत्येक मास में देवी की पूजा करनी चाहिए ॥११९॥ ब्रत के दिन माघ मास में नमक न खाय, फाल्गुन मास में गुड न खाय, चेत्र मास में नवनीत का त्याग करे, वैशाख मास में मधु (शहद) का त्याग करे ॥१२०॥ ज्येष्ठ मास में ब्रत के दिन पानी न पिये, आषाढ मास में जीरा न खाय । श्रावण के महीने में दुग्ध न पिये । भाद्रपद में दधि का परित्याग करे। आश्विन मास में घृत न खाय तथा कार्तिक मास में माक्षिक का त्याग करे । अगहन में चावल न खाय और पोष मास में चीनी का त्याग करे ॥१२२॥ व्रत की समाप्ति होने पर जल भर करके का प्रत्येक महीने में सायंकाल की बेला में दान करे। भक्ष्य या मिठायी भरा पात्र भी होना चाहिए ॥१२३॥ लडू, सेव, संयब, पूडी, घृत भरे नारियल, चूर्ण से भरी नंदिकी भी रहना चाहिए ॥१२४॥ दूध, शाक, दही, अन्न, तथा पिण्डशाक (जैसे आलू इत्यादि) इन सबों को माघ आदि के महीनों में करके के ऊपर रखकर देना चाहिए । माघ आदि मासों में ब्रत के अन्त में क्रमश: कुमुदा, माधवी, रम्भा, सुभद्रा, शिवा, जया, ललिता, कमला, अनङ्गा, मङ्गला और रतिलालसा, ॥१२५-१२६॥ इन नामों का प्रत्येक मास में उच्चारण करके उसके अन्त में प्रीयताम् कहे (जैसे माघ मास में कुमदा प्रीयताम्, फालगुन में माधवी प्रीयताम् इत्यादि) प्रत्येक मास के. व्रत में पञ्चगव्य का प्राशन अवश्य करना चाहिए ॥१२७॥ व्रत के दिन उपवास करे असमर्थ होने पर रात्रि में (मीठा) भोजन कर ले । इसी तरह से स्री को भी रस कल्याणिनी ब्रत करना चाहिए ॥१२८॥ वर्ष के अन्त में जब माघ का महीना आये तो कलश के ऊपर चीनी रखकर, पञ्चरत्न से युक्त सुवर्ण की गौरी देवी की मूर्ति बनाये ॥१२९॥ उस मूर्ति का परिमाण ब्रती के अंगुष्ठ परिमाण का होना चाहिए । मूर्ति
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