Srishti Khanda Extracted Page 358

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-358

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Sanskrit Original

मतिमपि च ददाति योपि देवै रमरवधूजनकिन्नरैः स पूज्य: । अन्यामपि प्रवक्ष्यामि तृतीयां णपनाशिनीम् ॥१०५॥ रसकल्याणिनीमेतां पुरा कल्पभवा विदुः । माघे मासि तु संप्राप्य तृतीयां शुक्लपक्षतः ॥१०६॥ प्रातर्गधेन पयसा तिलैः स्नानं समाचरेत् । स्रापयेन्मधुना देवी तथैवेक्षुरसेन तु॥१०७॥ गंधोदकेन च पुनः पूजनं कुंकुमेन तु । दक्षिणांगानि संपूज्य ततो वामानि पूजयेत् ॥१०८॥ ललितायै पदं देव्यै वामगुल्फौ ततोर्चयेत् । जंघेजानुतथाशांत्यै तथैवोरुं श्रियै नमः ॥१०९॥ मदालसायै च कटिममलायै तथोदरम्। स्तनौ मदनवासिन्यै कुमुदायै च कंधराम्॥११०॥ भुजं भुजाग्रं माधव्यै कमलायै सुखस्मिते। भ्रूललाटं च रुद्राण्यै शंकरायै तथालकम् ॥११९१॥ मदनौ ललाटं तु मोहनायै पुनर्क्षुवौ । नेत्रे चंद्रार्थधारिण्यै तुष्ट्यैच वदनं पुनः ॥९९२॥ उत्कंठिन्यै नमः कंठममृतायै नमस्तनुम् । रंभायै च महाबाहू विशोकायै नमः करौ ॥११३॥ हृदयं मन्मथाह्वायै पाटलायै तथोदरम् । कटिं सुरतवासिन्यै तथोरू पंकजश्रियै ॥११४॥ जानुजंघे नमो गौर्यै गुल्फौ शांत्यै तथार्चयेत् । धराधरायै पादौ तु विश्वकायै नमः शिरः ॥९१५॥ नमो भवान्यै कामिन्यै वासुदेव्यै जगच्छियै । आनंददायै नंदायै सुभद्रायै नमो नमः ॥११६॥ फल प्राप्त होता है । यदि कोई नारी अनेक कल्याण के लिए इस ब्रत को करती है तो ॥१०३॥ वह गौरी की कृपा से पुरुष का जन्म प्राप्त करती है । इस पार्वतीजी के ब्रत के प्रसङ्ग को जो पढता अथवा सुनता है अथवा दूसरे को इसे करने की प्रेरणा देता है, वह इन्द्र लोक में रहकर अप्सराओं तथा किन्नरों से पूजित होता है । अब मैं दूसरी भी पापों को विनष्ट करने वाली तृतीया का वर्णन करता हूँ । इस तृतीया को रस कल्याणिनी कहते हैं । माघमास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के आने पर ॥१०४-१०६॥ प्रातःकाल चन्दन, दुग्ध तथा तिल मिश्रित जल से स्नान करे । उसके बाद शहद तथा ईख के रस से देवी को स्नान कराये ॥१०७॥ उसके बाद चन्दन के जल से तथा कुंकुम से देवी की पूजा करे । उसके बाद देवी के दाहिने अंगों की पूजा करके उसके बाद वायें अङ्गों की पूजा करे।१०८॥ ललितायै नमः से पहले दाहिने पैर की पूजा करके, फिर बाये पैर की पूजा करे, देव्यै नमः से उसी क्रम से दोनों गुल्फों (पिण्डलियों) की पूजा करें शान्त्यै नमः से उसी क्रम से दोनों जड्डों और घुटनों की पूजा करे, श्रियै नमः से दोनों ऊरुओं की पूजा करे ॥१०९॥ मदालसायै नमः से कटि भाग की पूजा करे, अमलायै नमः से पेट की पूजा करे मदनवासिन्यै नमः से दोनों स्तनों की पूजा करे । कुमुदायै नमः से कन्थे की पूजा करे॥११०॥ माधव्यै नमः से भुजाओं तथा भुजाओं के अग्रभाग की पूजा करे कमलायै नमः से स्मित (ओष्ठ) की पूजा करे रुद्राण्यै नमः से भौंहों तथा ललाट की पूजा करे, शङ्करायै नमः से केशों की पूजा करे ॥१११॥ मदनायै नमः से ललाट की पूजा करे और मोहनायै नमः से फिर भौहों की पूजा करे, चद्रार्धधारिण्यै नमः से दोनों नेत्रों की पूजा करे तथा तुष्ट्यै नमः से फिर मुख की पूजा करे ॥११२॥ उत्कण्ठिन्यै नमः से कण्ठ की पूजा करे अमृतायै नमः से शरीर की पूजा करे, रम्भायै नमः से दोनों भुजाओं की पूजा करे, विशोकायै नमः से दोनों हाथों की पूजा करे ॥११३॥ मन्मथायै नमः से ललिता देवी के हृदय की पूजा करे और पाटलायै नमः से उदर की पूजा करे सुरतवासिन्यै नमः से कटि प्रदेश की पूजा करे, पङ्कजश्रियै नमः से दोनों ऊरूओं की पूजा करे॥११४॥ गौर्यै नमः से धुटनों तथा जंघों की पूजा करे शान्त्यै नमः से दोनों गुल्फों की पूजा करे, धराधरायै नमः से दोनों चरणों की पूजा करे विश्वकायै नमः से शिर की पूजा करे ॥११५॥ उसके बाद भाविन्यै नमः,

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