Srishti Khanda Extracted Page 357

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-357

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Sanskrit Original

प्रीपद्ममहापुराण एतद्धाद्रपदादौ तुप्राशने समुदाहृतम्। प्रतिपक्षं च मिथुनं तृतीयायां वरानने ॥९९॥ भोजयित्वार्चयेद्धक्तया वख्रमाल्यानुलेपतैः । पुंसः पीतांबरे दद्यात् खियाः कौशेयवाससी॥९२॥ निष्पावजीरलवणभिक्षुदंडगुडान्ितम् । सियै दद्यात्फलं पुंसः सुवर्णोत्पलसंयुतम् ॥९३॥ यथा न देविदेवस्त्वां संपरित्यज्य गच्छति । तथामामुद्धराशेष दुः खसंसारसागरात् ॥९ ४॥ कुमुदा विमला नंदा भवानी वसुधा शिवा। ललिता कमला गौरी सती रम्भाथ पार्वती ॥९५॥ नभस्यादिषु मासेषु प्रीयतामित्युदीरयेत्। ब्रतांते शयनं दद्यात् सुवर्णकलान्वितम्॥९६॥ मिथुनानि चतुर्विंशद् द्वादशाथ समर्चयेत् । अष्टावष्टाथवा भूयश्चतुर्मसेऽ थवार्चयेत् ॥९७॥ पूर्व दत्वाथगुरवे पश्चादन्यान् समर्चयेत् । उक्तानन्ततृतीयैषा सदानंतफलप्रदा ॥९८॥ सर्वपापहरा देवी सौभाग्यारोग्यवर्धिनी। न चैनं वित्तशाठ्येन कदाचिदपि लंघयेत् ॥९९॥ नरो बा यादि वा नारी सोपवासत्रतं चरेत्। गर्भिणी सूतिकानक्तं कुमारीवाथरोगिणी॥९००॥ यदाऽ शुद्धातदान्येन करायेत्प्रयतास्वयम् । इमामनंतफलदां यस्तृतीयां समाचरेत् ॥ १ ० ९॥ कल्पकोटिशतं साग्रं शिवलोके महीयते। वित्तहीनोपि कुर्वीत यावद्वर्षमुपोषणम्॥९०२॥ पुष्पमंत्रविधानेन सोपि तत्फलमाप्नुयात् । नारी वा कुरुते या तु आत्मनः शुभमिच्छती॥९०३॥ जन्मपौरुषामाप्रोति गौर्यनुग्रहकारितम् । इति पठति श्रुणोति वा य इत्थं गिरितनया व्रतमिंद्रलोकसंस्था: ॥९ ० ४॥ पंचगव्य और विल्व फल का क्रमश: प्राशन करे ॥९०॥ यह प्राशन का कार्य भाद्रप्रद के प्रारम्भ में करना चाहिए । हे वरानने प्रत्येक पक्ष की तृतीय को ब्राह्मण दम्पती को भोजन कराये उसके बाद भक्तिपूर्वक वस्र, माला तथा चन्दन से उनकी पूजा करे । फिर पुरुष को दो पीताम्बर और खी को दो रेशमी वस्र (साड़ी और चादर) दे ॥९१-९२॥ ब्राह्मणी को निष्पावा, जीरा, नमक, ईख तथा गुड के साथ फल प्रदान करे ब्राह्मण को सुवर्ण निर्मित कमल के साथ फल प्रदान करे ॥९३॥ इसके वाद प्रार्थना करे-- हे देवि ! जिस प्रकार श्रीभगवान् आपको छोड़कर कहीं नहीं जाते हें, उसीतरह से हे देवि ! मेणा इस दुःखमय संसार सागर से उद्धार करें ॥९४॥ श्रावण आदि महीनों में क्रमश: कुमुदा, विमला, नन्दा, भवानी, स्वधा, शिवा, ललिता, कमला गौरी, सती, रम्भा और पार्वती इन नामों का उच्चारण करके प्रीयताम् पद का उच्चारण करे । जैसे कुमुदा प्रियताम्, विमला प्रीयताम् इत्यादि ब्रत की समाप्ति हो जाने पर ब्राह्मण को सुवर्ण निर्मित कमल के साथ शय्या का दान करे ॥९५-९६॥ फिर चौबीस या बारह ब्राह्मण दम्पती की पूजा करे अथवा प्रत्येक चार-चार महीने पर आठ-आठ ब्राह्मण दम्पती की पूजा करे । (ऐसा करने से भी एक वर्ष में चौबीस ब्राह्मण दम्पती की पूजा हो जायेगी) ।।९७॥ इसमें पहले आचार्य की पूजा करके बाद में अन्य ब्रह्मणां की पूजो करे । इसको अनन्त तृतीया का ब्रत कहते हैं । यह सदा अनन्त फल देने वाला ब्रत है ॥९८॥ देवी सभी पापों को नष्ट करने वाली तथा सौभाग्य एवं आरोग्य को बढाने वाली हैं । इनकी आराधना में कभी भी कंजूसी नहीं करे ॥९९॥ खी हो या पुरुष उसे उपवास रखकर ही त्रत करना चाहिए । गर्भिणी, प्रसव करने वाली कुमारी अथवा रोगिणी नारी रात में भोजन कर लें ॥१००॥ यदि ब्रत करने वाली नारी आशुद्ध हो तो स्वयं नियम का पालन करते हुए दूसरे के द्वारा इस व्रत को कराये । इस अनन्त फल प्रदान करने वाली तृतीया के ब्रत को जो करता है, वह सौ करोड़ कल्प तक शिवलोक में निवास करता है । यदि ब्रती निर्धन हो तो एक वर्ष तक प्रत्येक तृतीया को उपवास करके इस व्रत को करे ॥१०१-१०२॥ पुष्प तथा मन्त्रविधि का पालन करने वाले उस व्यक्ति को भी वही

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