Srishti Khanda Extracted Page 356
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-356
Sanskrit Original
नामो गौर्यै नमः पुष्टयै नमः कांत्यै नमः श्रियै । रंभाये ललितायै च वामदेव्यै नमो नमः ॥७७॥ एवं संपूज्य विधिवदग्रतः पद्ममालिखेत्। पत्रैः षोडशभिर्युक्तं क्रमेणैव सकर्णिकम् ॥७८॥ पूर्वेण विन्यसेद्रौरीमपर्णा च ततः परम् । भवानीं दक्षिणेतदवद्रुद्राणीं च ततः परम् ॥७९॥ विन्यसेत्पश्चिमे भागे सौम्यां मदनवासिनीम् । वायव्ये पाटलामुग्रामुत्तरेण तथा उमाम् ॥८०॥ साध्यां पथ्यां तथा सौम्यां मंगलां कुमदां सतीम् । भद्रां च मध्ये संस्थाप्य ललितां कर्णिकोपरि ॥८ १॥ कुसुमैरक्षताद्धिर्वा नमस्कारेण विन्यसेत् । गीतमंगलघोषं च कारयित्वा सुवासिनीम् ॥८ २॥ पूजयेद्रक्तवासोभी रक्तमाल्यानुलेपनैः। सिंदूरं स्नानचूर्णं च तासां शिरसि पातयेत् ॥८ ३॥ सिंदूरं कुंकुमं स्नानमतीवेष्टं यतस्ततः। तथोपदेष्टारमपि पूजयेद्यततो गुरुम् ॥८४॥ न पूज्यते गुरुर्यत्र सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः । जप्यैश्च पूजयेद्रौरीमुत्पलैरसितैः सदा॥८५॥ बन्धुजीवैः प्रिये पूज्या कार्तिके मासि यत्नतः । जातीपुष्पे मार्गशिरे पौषे पीतैः कुरंटकैः ॥८६॥ कुंदैः कुमुदपुः्पैश्च देवी माधेपि पूजयेत्। सिंदुवारेण जात्या वा फाल्गुनेप्यर्चयेन्नरः ॥८७॥ चैत्रे तु मल्लिकाशोकै वैशाखे गंधपाटलैः । ज्येष्ठे कमलमंदारै राषाढे च जलांबुजैः ॥८८॥ मंदारेरथमालत्या श्रावणे पूजयेत्सदा । गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधिसर्पिः कुशोदकम्॥८९॥ बिल्वपत्रार्ककुसुमांबुजगौश्ंगवारि च। पंचगव्यं बिल्वं च प्राशयेत्क्रमशः सदा॥९०॥ इस मन्त्र से दोनों नेत्रों की पूजा करे, तुष्टयै नमः ललाटं पूजयामि इस मन्त्र से देवी के ललाट की पूजा करे, कात्यायन्यै नमः इस मन्त्र से शिर की पूजा करे ॥७६।। इसके बाद हाथ जोड़कर कहे गौर्ये नमः, पुण्यै नमः, कान्त्यै नमः, श्रियै नमः, रम्भायै नमः, ललितायै नमः, वामदेव्यै नमः ॥७७।॥ इस तरह से विधिपूर्वक देवी की अङ्ग पूजा करके, देवी के समक्ष षोडश दल कमल का निर्माण करे । उसमें कर्णिका भी होनी चाहिए ॥७८॥ पूर्व दिशा में गौरी देवी की स्थापना करे, उसके बाद वाम दल में अपर्णा की स्थापना करे । दक्षिण दल में भवानी की स्थापना करे, उसके बाद वाले दल में रुद्राणी की स्थापना करनी चाहिए ॥७९॥ पश्चिम वाले दल में मदनवासिनी देवी की स्थापना करे । वायव्य कोण वाले दल में उग्रपाटला देवी की स्थापना करे, उत्तर वाले दल में उमा की स्थापना करे ॥८०॥ बीच में, साध्या, पथ्या, सौम्या, मङ्गला, कुमुदा, सती तथा भद्रा देवी की स्थापना करके पूजा करे । ललिता देवी की कर्णिका में स्थापना करे । इन सभी चतुर्थ्यन्त नामों के अन्त में नम: पद लगाकर, फूल, अक्षत अथवा जल से स्थापना करे । उस समय सौभाग्यवती स्त्रियों से गीत तथा मङ्गल कराये ॥८२॥ देवी की पूजा लाल वस्र, लाल माला और रक्त चन्दन से करना चाहिए । देवियों के शिर पर सिन्दूर, स्नानचूर्ण चढाये ॥८३॥ देवी को सिन्दूर और कुंकुम से स्नान अत्यन्त प्रिय है, उसके बाद आचार्य की पूजा करे ॥८४॥ जो व्यक्ति आचार्य की पूजा नहीं करता है, उसकी सारी क्रियाएँ. व्यर्थ हा जाती हैं । उसके बाद गौरी देवी की पूजा जपाकुसुम अथवा कमल से करे ॥८५॥ हे प्रिये ! कार्तिक के महीने में देवी की पूजा दुपहरिया के फूल से अवश्य करे । मार्गशीर्ष के महीने में जाती के फूल से करे तथा पौष के महीने में कुरंटक के फूल से करे ॥८६॥ माघ के महीने में देवी की पूजा कुन्द तथा कुमुद के पुष्प से करे । फाल्गुन के महीने में सिन्दुवार अथवा जाती के फूल से करे ॥८७॥ चेत्र के महीने में मल्लिका (मालती) तथा अशोक के पुष्पो से करे । वैशाख के महीने में;देवीं की पूजा सुगन्धित गुलाब से करे । ज्येष्ठ के महीने में कमल और मन्दार से पूजा करे और आषाढ में पूजा जल कमल से करे ॥८८॥ श्रावण के महीने में पूजा सदा मन्दार और मालती से करे ॥८९॥ उसके बाद विल्वपत्र, मन्दार पुष्प, कमल गौ के सींग के जल,
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