Srishti Khanda Extracted Page 355
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-355
Sanskrit Original
शङ्कर उवाच शुणुष्वावहिता देवि तथैवान्यत्स्वयं कृतम् ॥६४॥ नराणामथ नारीणामाराधनमनुत्तमम् । नभस्ये वाथ वैशाखे पुण्ये मार्गाशिरस्यथ ॥६५॥ शुक्लपक्षे तृतीयायां स्नातः सगौरसर्षपैः । गोरोचनं सगोमूत्रं गोदुग्धं घृतं तथा ॥६६॥ दधि चंदन संमिश्रं ललाटे तिलकं न्यसेत् । सौभाग्यारोग्यकृद्यस्मात्सदा च ललिताप्रियम्॥६७॥ प्रतिपक्षं तृतीयायां पुमान्वापि सुवासिनी । धारयेद्रक्तवस्त्राण कुसुमानि सितानि च॥६८॥ विधवा शुक्लवस्त्रं वै त्वेकमेव हि धारयेत् । कुमारी शुक्लसूक्ष्मे च परिदध्यात्तु वाससी॥६९॥ देवीं च पंचगव्येन ततः क्षीरेण केवलं । स्नापयेन्मधुना ततद्दत्पुष्पगंधोदकेन तु ॥७०॥ पूजयेच्छुक्लपुष्पैस्तु फलैर्नानाविधैरपि । धान्यलाजादिलवण गुडक्षीरघृतान्वितैः ॥७१॥ शुक्लाक्षततितलैरर्चा कार्या देवि सदा त्वया । पादयोरर्चनं कुर्या्प्रतिपक्षं वरानने ॥७२॥ वरदायै नमः पादौ तथा गुल्फौ श्रियै नमः । अशोकायै नमो जंघे पार्वत्यै जानुनी तथा ॥७३॥ ऊरू मांगल्यकारिण्यै वामदेव्यै तथा कटिम् । पद्मोदरायै जठरं नमः कंण्ठे श्रियै. नमः ॥७४॥ करौ सौभाग्यदायिन्यै बाहू च सुमुखश्रियै । मुखं दर्पविनाशिन्यै स्मरदायै स्मितं पुनः ॥७५॥ गौयैं नमस्तथा नासामुत्पलायै च लोचने । तुष्ट्यै ललाटमलकं कात्यायन्यै नमः शिरः ॥७६॥ तथा लक्ष्मी दोनों को सावित्री देवी ने शाप दे दिया है ॥६२-६३॥ जिस तरह से मैं लक्ष्मी के समान प्रधान हो जाऊं उस उपाय को आप मुझे बतलायें । शङ्करजी ने कहा-- हे देवि ! आप सावधानी पूर्वक सुनें उसी तरह से पुरुषों तथा खियों के लिए समान रूप से आराधन को बतलाया गया है । श्रावण मास, वैशाख मास तथा मार्गशीर्ष मास में तृतीया तिथि को पीली सरसो मिश्रित जल से स्नान करे, फिर गोरोचन, गोमूत्र, गोदुग्ध तथा गोघृत, दघि तथा चन्दन इन सबों को मिलाकर ललाट में तिलक लगाये । यह ललिता देवी को प्रिय है । तथा सौभाग्य तथा आरोग्य को प्रदान करने वाला है ॥६४-६७॥ प्रत्येक पक्ष की तृतीया तिथि को पुरुष अथवा सौभाग्यवती नारी लाल रङ्ग के वस्र को धारण करे तथा उजले पुष्पों को धारण करे ॥६८॥ विधवा नारी को तो उजला तथा एक ही वस्र को धारण करना चाहिए । कुमारी कन्या पतले (महीन) श्वेत दो वस्र को धारण करे ॥६९॥ देवी को केवल गोदुग्ध से मधु (शहद) तथा पुष्प के गन्ध से युक्त जल से स्नान कराये ॥७०॥ उसके बाद श्वेत पुष्पों तथा अनेक प्रकार के फलों से पूजा करे । हे देवि ! धान्य, लावा, नमक, गुड, दुग्ध तथा घी से युक्त ॥७१॥ श्वेत अक्षत तथा श्वेत तिल से देवी की पूजा करे । हे वरानने ! उनके चरणों की पूजा प्रत्येक पक्षों में करे ॥७२॥ देवी के पूजन के मंत्र इस प्रकार है वरदायै नमः पादौ पूजयामि इस मन्त्र से दोनों चरणों की पूजा करे, श्रियै नमः गुल्फौ पूजयामि इस मन्त्र से दोनों गुल्फों की पूजा करे, अशोकायै नमः जङ्घे पूजयामि इस मन्त्र से दोनों जह्घों की पूजा करे, पार्वत्यै नमः जानुनी पूजयामि इस मन्त्र से दोनों घुटनों की पूजा करे ॥७३॥ माङ्गल्यकारिण्यै नम: ऊरू पूजयामि इससे दोनों ऊरूओं की पूजा करे । वामदेव्यै नमः कटिं पूजयाभि इस मन्त्र से उदर की पूजा करे । श्रियै नमः कण्ठं पूजयामि इस मन्त्र से कण्ठ की पूजा करे ॥७४॥ सौभाग्यदायिन्यै नमः करौ पूजयामि इस मन्त्र से दोनों हाथों की पूजा करे । सुमुखश्रियै नमः बाहू पूजयामि इस मन्त्र से दोनों भुजाओं की पूजा करे । दर्षविनाशिन्यै नमः 'मुखं पूजयामि इस मन्त्र से मुख की पूजा करे, स्मरदायिन्यै नमः स्मितं पूजयामि इस मन्त्र से मुस्कान की पूजा करे ॥७५॥ गौर्यै नमः नासे पूजयामि इस मन्त्र से दोनों नाकों की पूजा करे, उत्पलायै नमः लोचने पूजयामि
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