Srishti Khanda Extracted Page 354
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-354
Sanskrit Original
श्वेता च दद्याद्यदिशक्तिरस्ति रौप्यैः खुरै हेममुखीं सवत्साम् । धेनुं नरः क्षीरवतीं प्रणम्य स्राग्वस्त्रघंटाभरणां द्विजाय ॥५४॥ आसप्तरात्रादुदयेनृपास्य दातव्यमेतत्सकलं नरेण । यावत्समास्सप्तदशाथवा स्यु रथोदर्ध्वमप्यत्र वदंति केचित् ॥५५॥ काशपुष्पप्रतीकाश अग्रिमारुतसं भव । मित्रावरुणयोः पुत्र कुंभयोने नमोस्तु ते॥५६॥ प्रत्यब्दं च फलत्यागमेवं कुर्वन्न सीदति । होमं कृत्वा ततः पश्चाद्वर्तयेन्मानवः फलम् ॥५७॥ अनेन विधिना यस्तु पुमानर्घ निवेदयेत् । इमं लोकमवाप्रोति रूपारोग्यफलप्रदम् ॥५८॥ द्वितीयेन भुवलोकं स्वलोकं च ततः परम्। सप्तैव लोकानाप्नोति सप्तार्घान्यः प्रयच्छति ॥५९॥ इति पठति श्ृणोति यो हि सम्यक् चरितमगस्त्यसमर्चनं च पश्येत् । गतिमपि च ददाति सोपि विष्णो भवनगतः परिपूज्यतेऽ मरौधैः ॥६०॥ भाष्मउवाच सौभाग्यारोग्यफलदममित्रक्षयकारकम् । भुक्तिमुक्तिप्रदं यच्च तन्मे ब्रूहि महामते॥६१॥ पुलस्त्य उवाच यदुमाया पुरा देव उवाचांधकसूदनः । कथासु संप्रवृत्तासु धर्म्यासु ललितासु च ॥६२॥ तदिदानीं प्रवक्ष्यामि भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्। गोर्युवाच दत्तः शापो हि सावित्र्या मह्यं लक्ष्म्यै सुरेश्वर ॥६३॥यथा लक्ष्मी प्रधानत्वमहं यामि तथा वद् । तथा घण्टा से अलंकृत करके ब्राह्मण को दान दें ॥५४॥ हे राजन् ! अगस्त्योदय के पश्चात् सात रात्रियों तक इन सारी वस्तुओं तथा अर्घ्य देने का काम करे । कुछ लोग वर्षभर तक, कुछ लोग सत्रह रात्रियों तक तथा कुछ लोग उसके बाद तक भी इस प्रकार से अर्घ्य प्रदान करने को बतलाते हैं ॥५५॥ अगस्त्य महर्षि को अर्घ्य दान करने का मन्त्र है काश पुष्प के समान श्वेत वर्ण वाले अग्नि तथा वायु से उत्पन्न होने वाले, हे मित्रावरुण के पुत्र कुम्भयोने अगस्त्य महर्षि ! आपको नमस्कार है ॥५६॥ जो व्यक्ति प्रत्येक वर्ष एक फल का त्याग करने वाला होता है वहकमी भी दुःखी नही होता है । मनुष्य को चाहिए कि पहले होम करके फल का प्रयोग करे ॥५७॥ जो पुरुष इस विधि से एक अर्घ प्रदान करता है, वह इस संसार में लोगों का स्नेह, रूप और आरोग्य रूपी फल को प्राप्त करता है ॥५८॥ दूसरे अर्घ के द्वारा वह भुवर्लोक को प्राप्त करता है, तीसरे अर्घ्य के द्वारा वह स्वर्गलोक को प्राप्त करता है । इसतरह से जो महर्षि आगस्त्य को सात अर्घो को प्रदान करता है, वह सातो लोकों को प्राप्त करता है ॥५९॥ इसतरह से जो अगस्त्य महर्षि के चरित को अच्छी तरह से पढता और सुनता है तथा महर्षि अगस्त्य की पूजा का दर्शन करता है, अथवा जो दूसरों को इस ब्रत को करने की प्रेरणा देता है, वह भी भगवान् विष्णु के लोक में जाकरदेवताओं के द्वारा पूजित होता है ॥६०॥ भीष्मजी ने कहा-- हे महामते ! जिस ब्रत को करने से सौभाग्य तथा प्र रूपी फल की प्राप्ति होती है तथा शत्रुओ का नाश होता है, उसे आप मुझे बतलायें ॥६ १॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- सद्धर्म विषयक तथा ललित कथाओं के प्रसङ्ग में भगवान् शङ्करजी ने पार्वतीजी को बतलाया था उसे मैं तुम्हें बतला रहा हूँ वह भोग तथा मोक्ष दोनों को प्रदान करने वाला ब्रत है गौरी देवी ने कहा- हे सुरेश्वर ! मुझे
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