Srishti Khanda Extracted Page 353
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-353
Sanskrit Original
% श्रीपद्ममहापुराण ततोस्य वरदास्सर्वे वभूवुः शंकरादयः । ब्रह्मा विष्णुश्च भगवान् वरदानाय जग्मतुः ॥४२॥ वरंवृणीश्च भद्रं ते यश्चाभीष्टोऽत्र वै मुने। अगस्त्य उवाच यावद्वह्मसहस्त्राणां पंचविशतिकोटयः ॥४ ३॥ बैमानिकोभविष्यामि दक्षिणांबरवर्त्मनि । मद्ठिमानोदयात्कुर्यद्य:. कश्चित्पूजनं मम ॥४४॥ स सप्तलोकाधिपतिः पर्यायेण भविष्यति । यस्त्वाश्रमं पुष्करे तु मन्नाम्ना परिकीर्तयेत् ॥४५॥ स चैव पुष्यतां यातु वर एष वृतो मया । श्राद्धं येऽत्रकरिष्यन्ति पिंडपूर्वं तु भक्तितः ॥४६॥ तेषां पितृगणास्सर्वे मया सह दिवि स्थिताः । एतत्कालं वसिष्यंति एष एव वरो मम॥४७॥ एवमस्त्विति तेप्युक्त्वा जम्मुर्देवा यथागतम् । तस्मादर्घः प्रदातव्यो ह्यागस्त्याय सदा बुधैः ॥४८॥ भीष्म उवाच कथमर्घप्रदानं च कर्तव्यं तस्य वै मुनेः। विधानं यदगस्त्यस्य पूजने तद्वदस्व मे॥४९॥ पुलस्त्य उवाच प्रत्यूषसमये विद्वान्कुर्यादस्योदये निशि । स्नानं शुक्लतिलैस्तद्वच्छुक्लमाल्यांबरो गृही ॥५०॥ स्थापयेदव्रणं कुंभं माल्यवस्त्रविभूषितम्। पंचरत्नसमायुक्तं घृतपात्रेण संयुतम् ॥५९॥ अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं तथैव सुवर्णमध्यायतबाहुदंडम् । चतुर्भुजं कुम्भमुखे निधाय धान्यानि सप्ताचलसंयुतानि ॥५२॥ सकांस्यपात्राक्षत शुक्लयुक्तं मंत्रेण दद्यादाद्विजपुंगबाय । उत्क्षिप्य कुंभोपरि दीर्घबाहु मनन्यचेता यमदिङ्मुखस्थम् ॥५३॥ वे समुद्र पी गये ॥४१॥ यह देखकर शङ्कर आदि देवताओं ने उनको वरदान दिया । ब्रह्मा तथा विष्णु भी उनको वरदान देने के लिए उनके पास गये ॥४२॥ उन्होंने कहा हे मुने ! आप अपने मनोऽनुकूल वरदान माँग लें । अगस्त्य महर्षि ने कहा-- पचीस हजार करोड़ ब्रह्मा की आयु पर्यन्त मैं दक्षिण आकाश मार्ग (पितृगण का देवता बना रहूँ) मेरे विमान का उदय (अगस्त्योदय) होने पर जो कोई भी मेरी पूजा करे ॥४४॥। वह बारी-बारी से सातो द्वीपों का स्वामी बने । पुष्कर तीर्थ में मेरे नाम का जो आश्रम है उसका नाम लेने वाला भी पुण्यवान् हो जाय यही वरदान मैं माँगता हूँ । जो लोग पुष्कर के अगस्त्याश्रम में भक्तिपूर्वक श्राद्ध करके पिण्डदान करेंगे । उनके पितृगण मेरे साथ दक्षिणापथ में निवास करेंगे । और वे भी स्वर्गलोक में इतने ही समय तक निवास करेंगे ॥४७॥ वे देवता भी; ऐसा ही होगा, यह कहकर चले गये । अतएव विद्वानों को चाहिए कि वे अगस्त्य महर्षि को सर्वदा अर्घ्य दान करते रहें । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- विद्वान् को चाहिए कि जब अगस्त्योदय हो जाय तो वह प्रात:काल प्रत्यूष की बेला में स्नान करके, श्वेत वस्र धारण करे उसे श्वेत तिल मिश्रित जल से स्नान करना चाहिए ।।५०। वह माला तथा वस्र से अलङ्कृत कलश की स्थापना करे । पञ्चरत्न तथा घृतपात्र से युक्त कलश की स्थापना करे ॥५१॥ उस पर सुवर्ण निर्मित अंगुष्ठ प्रमाणक पुरुष की स्थापना करे, उसकी भुजायें लम्बी हो, उसकी चार भुजाएँ हों, उसे कुम्भ के मुख पर स्थापित करे । सात प्रकार के अन्नों के पर्वत, चावल से भरे कांस्य पात्र, इन सबो का दान ब्राह्मण को मंत्र पढते हुए करे । लम्बी भुजाओं वाली पुरुष मूर्ति को घड़े की ऊपर रखकर भक्तिपूर्वक दक्षिणाभिमुख होकर दान करे॥५२-५३॥ यदि शक्ति हो तो खुरों में चाँदी मढाकर दूध देने वाली, बछड़े से युक्त श्वेत वर्ण की गौ को वस्र
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