Srishti Khanda Extracted Page 352

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-352

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Sanskrit Original

अप्सराणां समक्षं हि देवानामब्रवीद्रिः । उर्वशीति च नाप्नेयं लोके ख्यातिं गमिष्यति ॥२८॥ ततः कामयमानेन मित्रेणाहूयतोर्वशी । प्रोक्त मां रमयस्वेति वाढमित्यब्रवीच्च सा ॥२९॥ गच्छंती तु ततः सूर्यलोकमिन्दीवरेक्षणा । वरुणेन वृता पश्चाद्चनं तमाभाषत ॥३०॥ मित्रेणाहं वृता पूर्व मम सूर्यः पतिः प्रभो । उवाच वरुणश्चित्तं मयि संन्यस्य गम्यताम् ॥३९॥ गतायां बाढमित्युक्त्वा मित्रः शापमदादथ । अद्यैव मानुषे लोके गच्छ सोमसुतात्मजम् ॥३२॥ भजस्वेति यतो मिथ्या धर्म एष त्वया कृतः। जलकुंभे ततो वीर्य मित्रेण वरुणेन च॥३३॥ प्रक्षप्तमथ संजातौ द्वावेव मुनिसत्तमौ । निमिर्नाम नृपः स्त्रीभिः पुरा द्यूतमदीव्यत॥३४॥ तदंतरेऽ भ्याजगाम वसिष्ठो ब्रह्मसंभवः। तस्य पूजामकुर्वाणं शशाप समुनिर्नृपम् ॥३५॥ विदेहस्त्वं भवस्वेति शप्तस्तेनाप्यसौ मुनिः । अन्योन्यशापादुभयोर्विशरीरे तु तेजसी॥३६॥ जम्मतुश्शपनाशय ब्रह्माणं जगतः पतिम्। अथ ब्रह्मसमादेशाल्लोचनेष्ववसन्निमिः ॥३७॥ निमेषाः स्युश्च लोकानां तद्विश्रामाय पार्थिव । वसिष्ठोप्यभवत्तस्मिञ्जलकुं भेच पूर्ववत् ॥३८॥ ततो जातश्चतुर्बाहुः साक्षसूत्रकमंडलुः । अगस्त्य इति शांतात्मा बभूव ऋषिसत्तमः ॥३९॥ मलयस्यैकदेशे तु वैखानसविधानतः । सभार्यः संवृतोविप्रैस्तपश्चक्रे सुदुष्करम् ॥४०॥ ततः कालेन महता तारकादिनिपीडितम् । जगद्दीक्ष्यसकोपेन पीतवान्वरुणालयम् ॥४९॥ उसके बाद भगवान् नारायण ने अपने जंघे से उन सबों को क्षुब्ध करने के लिए त्रैलोक्य मोहिनी नारी को उत्पन्न कर दिया उसको देखकर सभी देवता, काम तथा वसन्त सबके सब मोहित हो गये ॥२७॥ अप्सराओं के सामने ही श्रीहरि ने देवताओं से कहा यह नारी संसार में उर्वशी के नाम से विख्यात होगी ॥२८॥ उसके बाद मित्र नामक देवता ने एक दिन उर्वशी से कहा कि तुम मेरे साथ रमण करो और उसने भी उस बात को स्वीकार कर लिया॥२९॥ उस समय वह सूर्य और चन्द्रमा के लोक में जा रही थी उसके बाद वरुण देवता ने उसका वरण किया तो उर्वशी ने कहा ॥३०॥ हे प्रभो ! मेरे पति सूर्य हैं मित्र देवता ने इस समय मेरा वरण किया है । इस पर वरुण देवता ने कहा तुम अपना मन मुझमें लगा कर जाओ ॥३१॥ इसर पर उर्वशी ने कहा ठीक है । यह देखकर मित्र देवता ने शाप दे दिया । तुम आज ही मर्त्यलोक में सोम के पुत्र बुध के आत्मज पुरुरवा की पत्नी हो जाओ ॥३२॥ क्योंकि तुमने मुझसे झूठ बोला है । इसके बाद मित्र और वरुण दोनों ने जल के घड़े में अपने वीर्य का पात कर दिया ॥३३॥ उससे दो श्रेष्ठ मुनि उत्पन्न हुए । प्राचीन काल में निमि नामक राजा अपनी पत्नियों के साथ द्यूतक्रीडा (जुआ) कर रहे थे ॥३४।॥ उसी समय वहाँ महर्षि वसिष्ठ आ गये । किन्तु राजा उनकी पूजा नहीं कर सके, यह देखकर महर्षि वसिष्ठ ने उन्हें शाप दे दिया ॥३५॥ कि तुम देह रहित (विदेह) हो जाओ । इस पर राजा ने भी महर्षि वसिष्ठ को भी शाप दे दिया । परस्पर उन दोनों के शाप के कारण उन दोनों का शरीर पात हो गया । इसके बाद दोनों की आत्माएं ब्रह्माजी के पास गयीं कि वे शाप का नाश कर दें । इससे ब्रह्माजी के आदेश से निमि ने लोगों के नेत्र में निवास किया ॥३६॥ हे पार्थिव भीष्म ! निमि के विश्राम के ही लिए लोगों का निमेषपात होता है । वसिष्ठ भी उस जल के घड़े से पहले के ही समान हो गये ॥३७-३८॥ उसके बाद उस घड़े से ही चार भुजाओं : तथा अक्ष सूत्र एवं कमण्डलु धारण किए हुए महर्षि आगस्त्य प्रकट हुए ।चे शान्त प्रकृति वाले ऋषियों में श्रेष्ठ अगस्त्य हुए ॥३९॥ वे मलयाचल पर्वत के एक स्थान में वैखानस विधि से अपनी पत्नी तथा ऋषियों के साथ रहते हुए कठोर तपस्या किए ॥४०॥ उसके बहुत समय बाद तारक आदि असुरों से पीडित संसार को देखकर क्रोध करके

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