Srishti Khanda Extracted Page 351

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-351

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Sanskrit Original

यस्य योजनमात्रेपि जीवकोटिशतानि च । निवसंति सुरश्रेष्ठ स॒ कथं नाशमर्हति ॥१३॥ एवमुक्तः सुरेंद्रस्तु क्रोधसंरक्तलोचनः । उवाचेदं वचो रोषादमरावप्निमारुतौ ॥१४॥ न धर्माधर्मसंयोगं प्राप्रुवंत्यमराः क्वचित्। भवंतौ तु विशेषेण महात्मानौ च तिष्ठतः ॥१५॥ ममाज्ञा न कृता यस्मान्मारुतेन समं त्वया ।मुनिब्रतपरो भूत्वा परिगृह्य कलेवरम् ॥१६॥ धर्मार्थशासत्ररहितां योनिं प्रतिबिभावसो । तस्मादेकेन वषुषा मुनिरूपेणमानुषे ॥१७॥ मारुतेन समं लोके तव जन्म भविष्यति । यदा तु मानुषत्वेऽपि त्वया गंडूषशोषितः॥१८॥ भविष्यत्युदधिर्वह्वे तदा देवत्वमाप्स्यसि । इतींद्रशापात्पतितौ तत्क्षणात्तौ महीतले॥१९॥ अवाप्तवंतौ देहे च कुंभाज्जन्म ततोभवत्। मित्रावरुणयोरवीर्याद्मसिष्ठश्चात्जो भवत् ॥२०॥ ततोगस्त्य उग्रतपा बभूव मुनिसत्तमः । अस्मादभ्रातुः स वै भ्राता वसिष्ठस्यानुजो मुनिः॥२१॥ भीष्म उवाच कथं च मित्रावरुणौ पितरावस्य तौ स्मृतौ । जन्म कुंभादगस्त्यस्य यथाभूत्तद्वदाधुना ॥२२॥ पुलस्त्य उवाच पुरा पुराणपुरुषः कदाचिद्रंधमादने। भूत्वा धर्मसुतो विष्णुश्चचार विपुलं तपः॥२३॥ तपसा चास्य भीतेन विघ्नार्थे प्रेषितावुभौ । शक्रेण माधवानंगावप्सरोगणसंयुतौ ॥२४॥ यदा च गीतवाद्योन भावहावादिना हरिः ।न काममाथवाभ्यां च मोहं नेतुमशक्यत॥२५॥ तदा काममधुस्त्रीणां विषादमभजद्णः । संक्षोभाय ततस्तेषामूरुदेशान्नराग्रजः ॥२६॥ नारीमुत्पादयामास त्रैलोक्यस्यापि मोहिनीम् । संमोहितास्तया देवास्तौ तु चैव सुरावुभौ॥२७॥ मारने वाले इन्द्र से अग्नि तथा वायु ने कहा-- हे देवेन्द्र ! सागर को विनष्ट करना अधर्म है ॥११॥ क्योकि इस कार्य को करने से बहुत अधिक जीव समूह का नाश हो जायेगा । अतएव हे इन्द्र ! आप कोई दूसरा उपाय करें॥ १२॥ जिसके एक ही योजन में सैकड़ों करोड़ जीव हैं उस समुद्र को कैसे नष्ट किया जा सकता है 2॥१३॥ इस तरह से अग्नि तथा वायु के द्वारा कहे जाने पर क्रोध से आँखें लाल करके इन्द्र ने उन दोनों देवताओं से कहा।। १४।। देवताओं को धर्म अथवा अधर्म का फल नहीं मिलता है । आप दोनों तो विशेष रूप से महात्मा हैं॥१५॥ धर्मार्थ शास्र रहित योनि वाले होकर भी आपने मुनित्रत का पालन किया है । अतएव तुम दोनों मुनिब्रत के पालन करने वाले मानव शरीर को धारण करोगे । जब मनुष्य लोक में भी जाकर तुमलोग अपने आचमन मात्र से॥१६-१८॥ समुद्र को सुखा दोगे तब फिर तुम देवत्व को प्राप्त करोगे । इसतरह इन्द्र के शाप के कारण अग्नि और वायु का तत्क्षण ही पतन हो गया ॥१९॥ उसके बाद उन दोनों का कुम्भ (घड़े) से मित्रावरुण देवता के पुत्र के रूप में जन्म हुआ वे दोनों अगस्त्य तथा वसिष्ठ हुए ॥२०॥ उसके बाद आगस्त्य महर्षि मुनियों में श्रेष्ठ तथा उग्र तपस्वी हुए । उनके भाई वसिष्ठ महर्षि हुए अगस्त्य महर्षि वसिष्ठ महर्षि के अनुज थे ॥२१॥ भीष्मजी ने कहा-- इन दोनों के पिता मित्र और वरुण देवता कैसे हुए ? तथा अगस्त्य महर्षि के घड़े से जन्म की कथा आप मुझे `` बतलाइये ॥२२॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- प्राचीनकाल में पुराण पुरुष श्रीभगवान् धर्म के पुत्र रूप से उत्पन्न होकर गन्धमादन पर्वत पर अत्यधिक तपस्या किए ॥२३॥ इनकी तपस्या से डर कर इन्द्र ने उनकी तपस्या में विघ्न करने के लिए अप्सराओं के समूह के साथ वसन्त तथा काम को भेजा ॥२४॥ काम और वसन्त आदि के द्वारा प्रदर्शित गीत तथा वाद्य एवं भावों के द्वारा श्रीहरि मोहित नहीं हुए ॥२५॥ तब काम, वसन्त तथा अप्सराओं को अत्यन्त भय हो गया a

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