Srishti Khanda Extracted Page 350
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-350
Sanskrit Original
बाइसवाँ अध्याय भीष्म उवाच भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोको5 थ महर्जनः। तपःसत्यं च सप्तैते देवलोकाः प्रकीर्तिताः ॥१॥ पर्यायेण तु सर्वेषामाधिपत्यं कथं भवेत्। इह लोके शुभं रूपमायुरारोग्यमेव च॥२॥ लक्ष्मीश्च विपुला ब्रह्मन् कथं स्यात्सुरपूजित । पुलस्त्य उवाच पुरा हुताशनः सार्द्ध मारुतेन महीतले ॥३॥ आदिष्टः पुरुहूतेन विनाशाय सुरद्विषाम् । निर्दग्धेषु ततस्तेनदानवेषु सहस्रशः ॥४॥ तारकः कमलाक्षश्च कालदंष्ट: परावसुः। विरोचनस्तु संह्वादः प्रयातास्ते तदावसन् ॥५॥ अंतः समुद्रमाविश्य सन्निवेशमकुर्वत। अशक्ता इति तेप्यग्नि मारुताभ्यामुपेक्षिताः ॥६॥ ततः प्रभूति वै देवान् मानुषान् सभुजंगमान् । संपीड्य च मुनीनूसर्वान् प्रविशंति पुनर्जलम् ॥७॥ एवं युगसहस्त्राणि ते वीराः सप्त पंच च । जलदुर्गबलाद्राजन्पीडयंति जगत्त्रयम् ॥८॥ ततः पुनरथोवह्विमारुतावमराधिपः । आदिदेशाचिरादंबुनिधिरेषविशोष्यताम् ॥९॥ यस्मादस्मद्द्विषां चैष शरणं बरुणालयः। तस्माद्धवद्भयामद्यैव शोषमेष प्रणीयताम्॥९०॥ तावूचतुस्ततः शक्रं मयशम्बरसूदनम्। अधर्म एष देवेंद्र सागरस्य विनाशनम्॥९९॥ यस्माज्जीवनिकायस्य महतः संक्षयो भवेत् । तस्मादुपायमन्यं तु समाश्रय पुरंदर ॥९२॥ भूलोक आदि सातो लोकों के स्वामित्व प्राप्ति के उपाय का वर्णन, समुद्र को सुखा देने के लिए इन्द्र की आज्ञा का पालन नहीं करने पर अग्नि तथा मारुत को इन्द्र का शाप और उन दोनों का पृथिवी पर जन्म, अगस्त्य महर्षि का चरित्र, अगस्त्य को अर्ध्य देने की विधि का वर्णन, शिवजी द्वारा पार्वतीजी को गौरी तृतीया ब्रत का उपदेश, रुद्र का आश्वासन प्राप्त करके गौरी का ब्रह्माजी के यज्ञ में जाना, भगवान् विष्णु का रुद्र को अपने व्रत के ख्यापन का आदेश तथा सारस्वत व्रत का विधान वर्णन भीष्मजी ने कहा-- हे ब्रह्मन् ! भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महलोंक, जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक।ये सात लोक जो बतलाये गये हैं इन लोको के स्वामित्व की प्राप्ति किस उपाय से होती है ? तथा इस लोक में सुन्दर रूप, आरोग्य तथा आयु की प्राप्ति का साधन क्या है ? इसे आप मुझे बतलाइये ॥१-२॥ श्रीपुलस्त्य महर्षि ने कहा-- प्राचीनकाल में इन्द्र ने वायु तथा अग्नि को असुरों का विनाश करने के लिए आदेश दिया । उसके बाद अग्नि ने हजारों दानवों को भस्म कर दिया ॥३-४॥ तारक, कमलाक्ष, कालदंष्ट, परावसु, विरोचन, संहाद आदि परथिवी से पलायन कर गये ॥५॥ और जाकर समुद्र के भीतर रहने लगे । इसके बाद अग्नि तथा वायु ने उन सबों को यह सोचकर उपेक्षा कर दी कि ये असमर्थ हैं ॥६॥ उसी समय से वे दैत्य देवताओं, मनुष्यों, सर्पो तथा मुनियों को कष्ट देकर समुद्र के जल में घूस जाते थे ॥७॥ इस तरह से वे वीर दानव हजारों युग पर्यन्त जल को ही अपना दुर्ग (किला) बनाकर त्रैलोक्य को पीड़ित करते रहे ॥८॥ उसके बाद इन्द्र ने पुन: अग्नि तथा वायु को आदेश दिया कि तुम दोनों शीघ्र ही समुद्र को सुखा दो ॥९॥ क्योंकि यह समुद्र हमलोगों के वैरियों का रक्षक बन गया है । इसलिए तुम दोनों आज ही इसे सुखा देने का काम करो ॥१०॥ इसके बाद मय नामक दानव तथा शम्बरासुर को
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