Srishti Khanda Extracted Page 349

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-349

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Sanskrit Original

`: श्रीपद्ममहापुराण फलैर्नानाविधै भक्ष्यैः घृतपायससंयुतैः । दद्याद्द्विकालवेलायामर्यया ग्रीयतामिति॥३१०॥ पंचगव्यं च संप्राश्य स्वपेद्धूमावसंस्तरे। ततः प्रभाते संजाते भक्त्या संतर्पयेद्द्विजान् ॥३१९॥ अनेन विधिना दद्यान्मासि मासि सदा नरः। वाससी वृषभं हैमंतद्वद्रां कांचनोद्भवाम् ॥३९२॥ संवत्सरांते शयनमिक्षुदंडगुडान्वितम्। ताम्रपात्रे तिलप्रस्थं सौवर्ण वृषभं तथा॥३१३॥ दद्याद्वेदविदे सर्व विश्वात्मा प्रीयतामिति । अनेन विधिना विद्वान् कुर्याद्यः शुभसप्तमीम् ॥३ ९४॥ तस्य श्रीर्विमला कीर्ति भवेज्जन्मनि जन्मनि। अप्सरोगणगंधर्वैः पूज्यमानः सुरालये॥३१५॥ वसेद्रणाधिपो भूत्वा यावदाभूतसंप्लवम् । कल्पादाववतीर्णश्च सप्तद्वीपाधिपो भवेत्॥३१६॥ ् रूणहत्यासहस्रस्य ब्रह्महत्याशतस्य च । नाशायालमियं पुण्या पठ्यते शुभसप्तमी ॥३१७॥ इमां पठेद्यः श्ृणुयान्मुहूर्त पश्येत्प्रसंगादपि दीयमानम् । सोप्यत्र सर्वाधविमुक्तदेहः प्राप्रोति विद्याधरनायकत्वम् ॥३ १८॥ यावत्समास्सप्तनरः करोति यः सप्तमीं सप्तविधानयुक्ताम् । स सप्तलोकाधिपतिः क्रमेण भूत्वा पदं यातिपरं मुरारेः ॥३९९॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे पुष्करमाहात्म्ये एकविंशोऽध्यायः ।॥ २ १॥ re हूँ । उसके बाद एक ताम्बे के पात्र में एक प्रस्थ की मात्रा में तिल रखकर उसीमें सुवर्ण निर्मित वृषभ (बैल) वस्न, माला, गुड तथा तकिया इत्यादि से युक्त शय्या ॥३०८-३०९॥ अनेक प्रकार के फल, मिठाइयाँ, घी तथा खीर का दान सायंकाल की बेला में अर्यमा की प्रसन्नता के लिए करना चाहिए ॥३१०॥ इसके बाद पञ्चगव्य को पीकर बिना विस्तार के ही रात्रि में भूमि पर ही शयन करे । उसके बाद प्रात:काल की बेला में ब्राह्मणों की भक्तिपूर्वक पूजा करे! इसी विधि से पूरे एक वर्ष तक प्रत्येक मास की सप्तमी को ब्रत करे ॥३११॥ संवत्सर के अन्त में दो वस्र (धोती- चादर) सुवर्ण निर्मित बैल तथा उसी तरह की सुवर्ण निर्मित गौ ॥३१२॥ ईख के साथ ताम्बे के पात्र में एक प्रस्थ तिल इन सबों का विद्वान् वैदिक ब्राह्मण को दान विश्वात्मा प्रीयताम् इस वाक्य का उच्चारण करके दे । इस विधि से जो विज्ञ पुरुष शुभ सप्तमी का व्रत करता है ॥३१३-३१४॥ उसको अनेक जन्मों तक निर्मल कीर्ति, और लक्ष्मी की प्राप्ति होती रहती है । मृत्यु के प्रश्चात् वह पुरुष स्वर्गलोक में प्रलय काल पर्यन्त, अप्सराओं के साथ गणाधिप के रूप में निवास करता है । पुनः कल्प के प्रारम्भ में मर्त्यलोक में आकर सातो द्वीपों का स्वामी होता है ॥३१५-३१६॥ इस शुभ सप्तमी को हजारों गर्भपातों तथा सैकड़ों ब्रह्महत्याओं को भी विनष्ट करने में समर्थ बतलाया गया है।३ १७॥ इस शुभ सप्तमी के प्रसङ्ग को जो पढता है या सुनता है अथवा शुभ सप्तमी के दानों को देते समय उसका दर्शन करता है, उस व्यक्ति के भी समस्त पाप विनष्ट हो जाते हैऔर वह विद्याधरों का नायक होता है ॥३ १८॥ जो व्यक्ति पूरे एक-एक वर्ष तक इन सातो प्रकार के सप्तमियों का विधान पूर्वक करता है वह क्रमश: सातो द्वीपों का स्वामी होकर अन्त में भगवान् विष्णु के लोक में चला जाता है ॥३१९॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के पुष्कर महात्म्य वर्णन नामक इक्कीसवे अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। २९।। ह शिक 2

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