Srishti Khanda Extracted Page 348
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-348
Sanskrit Original
पश्चिमे बेदधाप्रे च वायव्ये चंडभानवे । पूष्णे चोत्तरतः पूज्य आनंदायेति तत्परम्॥२९६॥ कर्णिकायां च पुरुषः स्थाप्यः सर्वात्मनेपि च। शुक्लवस्रैः समावेष्ट्य भरक्ष्यैर्माल्यफलादिभिः ॥२९७॥ एवमभ्यर्च्य तत्सर्वं दद्याद्वेदविदे पुनः । भुंजीतातैललवणं वाग्यतः प्राङ्मुखो गृही ॥२९८॥ अनेन विधिना सर्व सप्तम्यां मासि मासि च। कुर्यात्संवत्सरं यावद्वित्तशाठ्यविवर्जितः ॥२९९॥ एतदेव ब्रतांते तु निधाय कलशोपरि । गोभिर्विभवतः सार्द्ध दातव्यं भूतिमिच्छता ॥३००॥ नमो मंदारनाथय मंदारभवनाय च ।त्वं रवे तारयस्वास्मानस्मात्संसारसागरात् ॥३०९॥ अनेन विधिना यस्तु कुर्यान्मंदारसप्तमीम्। विपाप्मा ससुखी मर्त्यः कल्पं च दिवि मोदते॥३ ० २॥ इमामघौघपटलभीषणध्वांतदीपिकाम् । गच्छन्संगृह्ण संसारशर्वर्या न स्खलेन्नरः॥३०३॥ मंदारसप्तमीमेतामीप्सितार्थफलप्रदाम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि सोपि पापैः प्रमुच्यते ॥३०४॥ अथान्यामपि वक्ष्यामि शोभनां शुभसप्तमीम् । यामुपोष्य नरो रोगशोकौघात्तु प्रमुच्यते ॥३०५॥ पुण्यमाश्वयुजे मासि कृतस्नानजपः शुचिः । वाचयित्वा ततो विप्रानारभेच्छुभसप्तमीम् ॥३०६॥ कपिलां पूजयेद्भक्त्या गंधमाल्यानुलेपनैः । नमामि सूर्यसंभूतामशेषभुवनालयाम् ॥३०७॥ त्वामहंशुभकल्याणि स्वशरीरविशुद्धये । अथ कृत्वा तिलप्रस्थं ताम्रपात्रेण संयुतम् ॥३०८॥ कांचनं वृषभं तद्दद्दसत्रमाल्य गुडान्वितम् । सोपधानं च विश्रामभाजनासनसंयुतम् ॥३ ० ९॥ से पूजा करे । फिर अर्काय नमः इस मन्त्र से नैऋत्य कोण में पूजा करे । अर्यम्णे नमः इस मन्त्र से पश्चिम दल में पूजा करे । वेदधाम्ने नमः इस मन्त्र से वायव्य कोण वाले दल में पूजा करे । उसके बाद चण्डभानवे नमः से पूजा करके फिर पूष्णे नमः इससे उतरदल में पूजा करे । उसके बाद ईशान कोण में आनन्दाय नमः इस मंत्र से पूजा करे ।।२९४-२९६।। इसके बाद कमल की कर्णिका में सौवर्ण पुरुष की स्थापना करे और उसकी पूजा सर्वात्मने नमः इस मन्त्र से करे । उसके बाद उजले वस्र से वेष्टित करके उसकी मिठाई, माला तथा फल से पूजा करे ॥२९७॥ इस तरह से उसकी पूजा करके उसको वेदज्ञ ब्राह्मण को दान दे दे । उसके बाद वह पूर्वाभिमुख बैठकर मौन होकर तेल तथा नमक रहित भोजन करे ॥२९८॥ इसी प्रकार वह एक वर्ष तक प्रत्येक मास की सप्तमी तिथि को उदारता पूर्वक पूजन करे ॥२९९॥ ऐश्वर्य चाहने वाले पुरुष को चाहिए कि वह व्रत के अन्त में इन्ही सारी वस्तुओं को कलश पर रखकर अपनी शक्ति के अनुसार गायों के साथ दान करे ॥३००॥ इसके बाद सूर्य की प्रार्थना करते हुए कहे कि हे मन्दारनाथ ! हे मन्दारभवन ! सूर्य ! आप हमको इस संसार सागर से पार करें ॥३०१॥ जो व्यक्ति इसी विधि से मन्दार सप्तमी का व्रत करता है, वह पाप से रहित होकर सुख पूर्वक एक कल्प पर्यन्त स्वर्ग लोक में आनन्दानुभव करता है ॥३०२॥ यह मन्दारसप्तमी पाप समूह रूपी भयङ्कर अन्धकार को प्रकाशित करने वाले प्रदीप के समान है, इसको अपनाकर संसार रूपी रात्रि में चलने वाले पुरुष का पतन नहीं होता है ॥३०३॥ जो व्यक्ति अभिलषित फल प्रदान करने वाली इस मन्दार सप्तमी नामक प्रसङ्ग को पढता है अथवा सुनता है वह भी पापों से मुक्त हो जाता है ।॥।३०४॥ अब मैं आपको शुभसप्तमी नामक व्रत को सुनता हूँ उसका व्रत करके मनुष्य रोग, शोक तथा पाप समूह से मुक्त हो जाता है ॥३०५॥ पवित्र आश्विन मास में स्नान तथा जप करके पवित्र बने हुए मनुष्य को ब्राह्मणों से स्वस्ति वाचन इत्यादि कराकर शुभ सप्तमी नामक ब्रत को करना चाहिए ॥३०६॥ ब्रती भक्ति पूर्वक कपिला गौ का चन्दन तथा माला आदि से पूजन करके उसकी स्तुति करते हुए कहे मैं सूर्य से उत्पन्न तथा सम्पूर्ण जगत् के आश्रय स्वरूपिणी ॥३०७॥ हे शुभ कल्याणि ! तुम्हारा ब्रत अपने शरीर की शुद्धि के लिए करता
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