Srishti Khanda Extracted Page 346

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-346

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

अनेन विधिना सर्व मासि मासि समाचरेत्। संवत्सरांते शयनं शर्करा कलशान्वितम्॥२६९॥ सर्वोपस्करसंयुक्तं तथैकां गां पयस्विनीम् । गृहं च शक्तिमान्दद्यात्समस्तोपस्करान्वितम् ॥२७०॥ सहस्रेणाथ निष्काणां कृत्वा दद्याच्छतेन वा। दशभिर्वा त्रिभिर्वापि निष्केणैकेन वा पुनः ॥२७९॥ पद्यं स्वशक्तितो दद्यात्पूर्ववम्मंत्रपाठनम् । वित्तशाठ्यं न कुर्वीत कुर्वन्दोषान्समश्नुते ॥२७२॥ अमृतं पिबतो कक्रात्सूर्यस्यामृतबिंदवः । समुत्पेतुर्द्रण्यां ये शालिमुद्नेक्षवस्तु ते ॥२७३॥ शर्कराया रसस्तस्मादिक्षुसारोऽ मृतात्मवान् । इष्टारवे रतः पुण्या शर्करा हव्यकव्ययोः ॥२७४॥ शर्करा सप्तमी चेयं वाजिमेघफलप्रदा। सर्वदुष्टोपशमनी पुत्रपौत्रविवर्थिनी ॥२७५॥ यः कुर्यात्परया भक्तद्या सपरं ब्रह्मगच्छति। कल्पमेकं वसेत्स्वर्गे ततो याति परंपदम् ॥२७६॥ इदमनघश्पृणोति यः स्मरेद्वा परिपठतीहसुरेश्वरस्य लोके । मतिमपि च ददाति सोपि देवै रमरपुरे परिपूज्यते मुनीन्द्रैः ॥२७७॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि तद्वत्कमलसप्मीम् । यस्यास्संकीर्त्तनादेव तुष्यतीह दिवाकरः ॥२७८॥ बसंतामलसप्तम्यां सुस्नातो गौरसर्षपैः । तिलपात्रे च सौवर्णं निधाय कमलं शुभम् ॥२७९॥ वस्रयुग्मावृतं कृत्वा गंधपुष्पैरथार्चयेत् । नमस्ते पद्महस्ताय नमस्ते विश्रधारिणे ॥२८०॥ दिवाकरनमस्तेस्तु प्रभाकरनमोस्तु ते । ततो द्विकालवेलायामुदकुं भसमन्वितम् ॥२८ १॥ विप्रायदद्यात्संपूज्य वस्त्रमाल्यविभूषणैः । शक्तितः कपिलां दद्यादलंकृय विधानतः ॥२८ २॥ कराये । स्वयं तेल तथा नमक से रहित भोजन करके उस दिन मौन रहे ॥२६८॥ इसी प्रकार से सारे नियमों का पालन प्रत्येक मास में करे, संवत्सर के अन्त में चीनी भरे कलश के साथ ॥२६९॥ यदि शक्ति हो तो सभी सामग्रियों के साथ गृह तथा दूध देने वाली गौ का दान करे ॥२७०॥ एक हजार सुवर्ण मुद्रा अथवा सौ मुद्रा या दश मुद्रा, या तीन मुद्रा या एक सुवर्ण मुद्रा के द्वारा कमल का निर्माण करके उसे अपनी शक्ति के अनुसार दान करे और पहले के ही समान मन्त्र को पढे । इस काम में कंजूसी न करे, कंजूसी करने से पाप होता है ॥२७१-२७२॥ जिससमय सूर्य अमृत पी रहे थे, उस समय उनके मुख से जो अमृत की बूंदे पृथिवी पर गिर गयीं उसीसे धान, मूंग, तथा ईख पैदा हुए । इसलिए ईख का सार शर्करा है और वह अमृत से युक्त है । इसीलिए शर्करा सूर्य को प्रिय है, और वह हव्य तथा कव्य दोनों में मिलायी जाती है ॥२७४॥ यह र्शकरासप्तमी अश्वमेघ यज्ञ करने का फल प्रदान करनेवाली है । यह सभी दुष्टों को विनष्ट करने वाली तथा पुत्रों एवं पौत्रों का बढाने वाली है ॥२७५॥ जो इस शर्करासप्तमी का ब्रत परा भक्ति पूर्वक करता है, वह परपद को प्राप्त कर लेता है ॥२७६॥ जो व्यक्ति इस प्रसङ्ग को सुनता है या स्मरण करता है अथवा पढता है, अथवा इस त्रत को करने की किसी को प्रेरणा देता है, वह भी देवताओ की नगरी में देवताओं तथा मुनीन्द्रं द्वारा पूजित होता है ॥२७७॥ इसके बाद में में उसी तरह कीकमलसप्तमी व्रत का वर्णन करता हूँ इस ब्रत का नाम लेने मात्र से भगवान् सूर्य को प्रसन्नता होती है ॥२७८॥ वसंत ऋतु की अमल सप्तमी तिथि को पीली सरसो मिश्रित जल से स्नान करे । फिर तिल से भरे पात्र में सुवर्ण निर्मित कमल रखे ॥२७९॥ उसको दो वस्रं में लपेट दे । उसकी चन्दन तथा पुष्प आदि से पूजा करे । उसके बाद इस मंत्र को पढे-- अपने हाथ में कमल को धारण करने वाले तथा विश्व को धारण, पोषण करने वाले भगवान् सूर्य को नमस्कार है ॥२८०॥ हे दिवाकर ! हे प्रभाकर ! आपको नमस्कार है । उसके बाद सायंकाल की बेला में जल भरे घड़े के साथ ब्राह्मण की वस्त्र, माला तथा भूषण से पूजा करके उसे दान दे दे । यदि शक्ति हो तो अलंकृत करके

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know