Srishti Khanda Extracted Page 345
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-345
Sanskrit Original
प्रतिपक्षं फलत्यागमेतत्कुर्वन्समाचरेत् । व्रतांते विप्रमिथुनं पूजयेद््रभूषणैः ॥२५५॥ शर्कराकलशं दद्याद्धेमपद्फलान्वितम्। यथा न विफलः कामस्त्वद्धक्तानां सदा भवेत्।२५६॥ तथानंतफलावाप्तिरस्तु मे जन्मजन्मनि । इमामनंतफलदां यः कुर्यात्फलसप्तमीम् ॥२५७॥ भूतभव्यांश्च॒ पुरुषांस्तारयेदेक विशतिम्। यः शृणोति पठेद्वापि सोपि कल्याणभाग्भवेत्॥२५८॥ सर्वपापविशुद्धात्मा सूर्यलोके महीयते। सुरापानादिकं किञ्चिदत्रामुत्र च वा कृतम् ॥२५९॥ तत्सर्वं नाशमायाति यः कुर्यात्फलसप्तमीम्। शर्करा सप्तमीं वक्ष्ये तद्वत्कल्मषनाशिनीम् ॥२६०॥ आयुरारोग्यमैश्वर्य ययानंतं प्रजायते। माधवस्यसिते पक्षे सप्तम्यां नियतब्रतः ॥२६१॥ प्रातः स्नात्वा तिलैः शुभ्रैः शुद्धमाल्यानुलेपनः। स्थंडिले पद्ममालिख्य कुंकुमेन सकर्णिकम्॥२६२॥ तस्मिन्नमः सवित्रेति गंधपुष्पं निवेदयेत्। स्थापयेदुदकुंभं च शर्करापात्रसंयुतम् ॥२६३॥ शुक्लवस्रैरलंकृत्य शुक्लमाल्यानुलेपनैः । स्वर्णपुष्पसमायुक्तं मंत्रेणानेन पूजयेत् ॥२६४॥ विश्ववेदमयो यस्मात्त्वं वेदेषु च पठ्यसे । त्वमेवामृतसर्वस्वमतः शांतिं प्रयच्छ मे ॥२६५॥ पंचगव्यं ततः पीत्वा स्वपेततत्पार्श्वतः क्षितौ। सौरसूक्तं जपन्नास्ते पुराणश्रवणेन च॥२६६॥ अहोरात्रे गते पश्चादष्टम्यां कृतनैत्यकः। तत्सर्वं वेदविदुषे ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥२६७॥ भोजयेच्छक्तितो विप्रान्शर्कराघृतपायसैः । भुंजीतातैललवणं स्वयमप्यथ वाग्यतः॥२६८॥ श्रीमान् प्रीयताम्, १०. विभावसुः प्रीयताम्, ११. त्वष्टा प्रीयताम् और १२. वरुणः प्रीयताम् ॥२५३-२५४॥ इसतरह से करते हुए प्रत्येक पक्ष में एक-एक फल का त्याग करता जाय । व्रत के समाप्त हो जाने पर ब्राह्मण दम्पती की पूजा वस्र तथा भूषण से करे ॥२५५॥ सुवर्ण फल से युक्त चीनी भरे कलश का दान करे । इसके बाद प्रार्थना करे जिस तरह आपके भक्तों की कोई कामना विफल नहीं होती है ॥२५६॥ उसी तरह मुझे भी प्रत्येक जन्मों में फल की प्राप्ति होती रहे । इस अनन्त फल देने वाली फलसप्तमी का ब्रत जो करता है ॥२५७॥ वह इक्कीस पीढी पहले के तथा इक्कीस पीढी बाद के पितरों को तार देता है । इस ब्रत के प्रसङ्ग को जो सुनता अथवा पढता है वह भी कल्याण प्राप्ति का पात्र बन जाता है ॥२५८॥ वह सभी पापों से मुक्त होकर सूर्य के लोक में आनन्दानुभव करता हैं । जो इस लोक में अथवा परलोक में मदिरा पान इत्यादि पाप किए रहता है ॥२५९॥ उसके वे सभी पाप विनष्ट हो जाते हैं; यदि वह फलसप्तमी का व्रत करता है । अब में उसी प्रकार की पापों को विनष्ट करने वाली शर्करासप्तमी का वर्णन करता हूँ ॥२६०॥ शर्करा सप्तमी करने से अनन्त आयु आरोग्य तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है । चैत्र के महीने में शुक्ल पक्ष की सप्तमी को इस व्रत को करना चाहिए ॥२६१॥ प्रातःकाल उजले तिल मिश्रित् जल से स्नान करके श्वेत माला और चन्दन को लगाये । उसके बाद कुंकुम से वेदी पर कर्णिका युक्त अष्टदल कमल का निर्माण करे ॥२६२॥ उस पर सवित्रे नमः इस मन्त्र से चन्दन तथा फूल चढाये । उसके बाद वहाँ चीनी भरे पूर्णपात्र से युक्त जल के घड़े की स्थापना करे ॥२६३॥ उसको श्वेत वस्र तथा श्वेत माला के अलङ्कृत करे । स्वर्ण निर्मित पुष्प से युक्त उस कलश की पूजा इस मन्त्र से करे ॥२६४॥ चूकि आप वेदों में विश्ववेद (सर्वज्ञ) रूप से पढे जाते है; आप ही अमृत के सर्वस्वरूप हैं, अतएव मुझे शान्ति प्रदान करें ॥२६५॥ उसके बाद पञ्चगव्य का पान करके उस कलश के सत्रिकट ही पृथिवी पर सो जाय । उस समय वह सूर्य सूक्त का जप करे तथा पुराणों का श्रवण करे ॥२६६॥ इस तरह से दिन और रात्रि के बीत जाने पर अष्टमी तिथि को नित्य कृत्य करने के पश्चात् उन सारीसामग्रियों को ब्राह्मण को दान कर दे ॥२६७॥ अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को चीनी, घी तथा खीर का भोजन
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