Srishti Khanda Extracted Page 344
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-344
Sanskrit Original
कुर्यद्यावत्पुनर्माघशुक्लपक्षस्य सप्तमी। ब्रतांते कलशं दद्यात्सुवर्णकमलान्वितम् ॥२४९॥ शय्यां सोपस्करा दद्यात्कपिलां च पयस्विनीम् । अनेन विधिना यस्तु वित्तशाठ्येन वर्जितः ॥२४२॥ विशोकसप्तमीं कुर्यात्स याति परमां गतिम् । यावज्जन्मसहस्राणां साग्रं कोटिशतं भवेत् ॥२४३॥ तावन्नशोकमाप्रोति रोगदौर्गत्यवर्जितः । यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्रोति पुष्कलम्।। २४४॥ निष्कामं कुरुते यस्तु स परं ब्रह्म गच्छति। यः पठेच्छणुयाद्वापि विशोकाख्यां तु सप्तमीम्॥२४५॥ सोपीद्रलोकमासाद्य न दुःखी जायते क्वचित् । अन्यामपि प्रवक्ष्यामि नाम्ना तु फलसप्तमीम् ॥२४६॥ यामुपोष्य नरः पापै विमुक्तः स्वर्गभाग्भवेत्। मार्गशीषे शुभे मासि पंचम्यां नियतव्रतः ॥२४७॥ षष्ठीमुपोष्य कमलं कारयित्वा तु कांचनम् । शर्करासंयुतं दद्याद्वाह्मणाय कुटुंबिने॥२४८॥ रूपं च कांचनं कृत्वा फलस्यैकस्य धर्मवित् । दद्याद्द्वकाल वेलायां भानुर्मे प्रीयतामिति ॥२४९॥ शक्तत्रा तु विप्रान् संपूज्य सप्तम्यां क्षीरभोजनम् ।कृत्वा कुर्यात्फलत्यागं यावत्स्यात्कृष्णसप्तमी ॥२५०॥ तामुपोष्याथ विधिवदनेनैव क्रमेण तु । तद्वद्वेमफलं दत्वा सुवर्णकमलान्वितम्॥२५९॥ शर्करापात्रसंयुक्तं वस्त्रमालासमन्वितम् । संवत्सरमनेनैव विधिनोभयसप्तमीम् ॥२५२॥ उपोष्य दद्यात्क्रमशः सूर्यमंत्रमुदीरयेत्। भानुरकों रविर्ब्रह्मा सूर्यः शक्रो हरिः शिवः॥२५३॥ श्रीमान्विभावसुस्त्वष्टा वरुणः प्रीयतामिति । प्रतिमासं च सप्तम्यामेकैकं नाम कीर्त्तयेत् ॥२५४॥ श्रवण करना चाहिए । इस प्रकार से वह दोनों पक्षों की सप्तमी तिथि को व्रत करे ॥२४०॥ यह व्रत तब तक करते रहना चाहिए जब तक कि पुन: माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि नहीं आ जाय । ब्रत की समाप्ति के अवसर पर सुवर्ण निर्मित कमल से युक्त कलश का दान करना चाहिए ॥२४१॥ सभी सामग्रियों से युक्त शय्या तथा कपिला गो का दान करना चाहिए । जो व्यक्ति उदारता पूर्वक इस प्रकार से ॥२४२॥ विशोकसप्तमी का व्रत करता है, वह मुक्ति को प्राप्त कर लेता है । जब तक उसके करोड़ों जन्म होते हैं ॥२४३॥ तब तक उसको किसी भी प्रकार का शोक, रोग तथा दैन्य नहीं होता है । वह जिन-जिन वस्तुओं को प्राप्त करने की कामना करता है, उन समस्त वस्तुओं को पुष्कल मात्रा में प्राप्त करता है ॥२४४॥ जो व्यक्ति कामना रहित होकर इस व्रत को करता है वह परख्रह्म को प्राप्त करता है । जो व्यक्ति विशोकसप्तमी के इस प्रसङ्ग को पढ़ता अथवा सुनता है, ॥२४५॥ वह भी इन्द्र लोक में चला जाता है, और वह कभी भी दु:खी नहीं होता है । अब में इससे भिन्न फलसप्तमी ब्रत का वर्णन करता हुँ।२४६।। इस फल सप्तमी का व्रत करने वाला मनुष्य स्वर्गलोक में जाता है । मार्गशीर्ष (अगहन) के महीने के कृष्णपक्ष की पञ्चमी तिथि को व्रत रखे ॥२४७॥ षष्ठी तिथि को उपवास करके सुवर्ण कमल बनाकर, उसको चीनी के साथ गृहस्थ ब्राह्मण को दान करे ॥२४८॥ धर्मवेत्ता पुरुष को चाहिए कि वह एक फल को सुवर्ण के समान बनवाकर द्विकाल (दोपहर) की वेला मे भगवान् सूर्य की प्रसन्नता के लिए दान करे ॥२४९॥। सप्तमी के दिन अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों की पूजा करे स्वयं खीरान्न का भोजन करे कृष्णपक्ष की सप्तमी तिथि पर्यन्त फल का त्याग करे ॥२५०॥ इसी क्रम से इस सप्तमी तिथि को भी सविधि उपवास करे । पहले के ही समान सुवर्ण तथा सुवर्ण निर्मित कमल ब्राह्मण को दान दे ॥२५१॥ उसी के साथ चीनी भरा हुआ पात्र, वस्र तथा माला भी ब्राह्मण को दे । इसीविधि से एक वर्ष तक दोनों पक्ष की सप्तमी को ॥२५२॥ उपवास करके दान करे और इसी क्रम से सूर्य के बारह नामों का प्रत्येक मास में उच्चारण करे । वे नाम हैं- १. भानुः प्रीयताम्, २. रवि: प्रीयताम्, ३. अर्क प्रीयताम्, ४. ब्रह्मा प्रीयताम्, ५. सूर्यः प्रीयताम्, ६. शक्रः प्रीयताम्, ७. हरिः प्रीयताम्, ८. शिवः प्रीयताम्, ९.
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