Srishti Khanda Extracted Page 343
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-343
Sanskrit Original
ततस्त्रयोदशे मासि गाश्च दद्यात्रयोदश । वस्त्रालंकारसंयुक्ताः स्वर्णश्रृंगा: पयस्विनीः ॥२२७॥ एकामपि प्रदद्याच्च वित्तहीनो विमत्सरः । नवित्तशाठ्यं कुर्वीत यतो मोहात्पतत्यथ: ॥२२८॥ अनेन विधिना यस्तु कुर्यात्कल्याणसप्तमीम् । सर्वपापविनिर्मुक्त सूर्यलोके महीयते ॥२२९॥ आयुरारौग्यमैश्वर्यमनंतमिह जायते। सर्वपापहरा चेयं सवैदैवत पूजिता ॥२३०॥ सर्वदुष्टोपशमनी सदा कल्याणसप्तमी । इमामनंतफलदां यस्तु कल्याणसप्तमीम् ॥२३९॥ शृणोति यः पठेद्वापि स च पापैः प्रमुच्यते । विशोकसप्तमीं तद्वद्वक्ष्यामि नृपसत्तम॥२३२॥ यामुपोष्य नरः शोकं न कदाचिदिहाश्नुते। माघे कृष्णतिलैस्नातः पंचम्यां शुक्लपक्षतः ॥२३३॥ कृताहारः कृसरसा दंतधावनपूर्वकम्। उपवासत्रतं कृत्वा ब्रह्मचारी निशि स्वपेत् ॥२३४॥ ततः प्रभाते उत्थाय कृतस्नानजपः शुचिः। कृत्वा तु कांचनं पद्ममकयिति प्रपूजयेत् ॥२३५॥ करवीरेणरक्तेन रक्तवस्त्रयुगेन च । यथाविशोकं भुवनं त्वयैवादित्य सर्वदा ॥२३६॥ तथा विशोकता मे स्यात्त्वद्धक्तिः प्रतिजन्म च । एवं संपूज्य षष्ठ्यां तु भक्त्या संपूजयेदद्विजान् ॥२३७॥ स्वयं संप्राश्य गोमूत्रमुत्थाय कृतनैत्यकः । संपूज्य विप्रान्यत्नेन गुडपात्रसमन्वितम् ॥२३८॥ सद्दस्रयुग्मं पद्मं च ब्राह्मणाय निवेदयेत्। अतैललवणं भुक्त्वा सप्तम्यां मौनसंयुतः ॥२३९॥ ततः पुराणश्रवणं कर्त्तव्यं भूतिमिच्छता । अनेन विधिना सर्वमुभयोरपि पक्षयोः ॥२४०॥ दान दे और कहे कि मेरे इस व्रत से भगवान् सूर्य प्रसन्न हों । इसी प्रकार से प्रत्येक महीने में व्रत करे ॥२२५-२२६॥ उसके बाद तेरहवें मास में, वस्र तथा अलङ्कार से अलङकृत जिनके सींग में सुवर्ण लगा हो; ऐसी दूध देने वाली तेरह गायों का दान करे ॥२२७॥ धनरहित मनुष्य मत्सर रहित होकर एक भी गौ का दान कर सकता है । वह इस कार्य में कंजूसी न करे, क्योंकि कंजूसी करने वाले व्यक्ति का पतन हो जाता है ॥२२८॥ इस विधि से जो व्यक्ति कल्याण सप्तमी का ब्रत करता है, वह समस्त पापों से रहित होकर सूर्य लोक में सुशोभित होता है ॥२२९॥ वह इस लोक में आयु, आरोग्य तथा अनन्त ऐश्वर्य को प्राप्त करता है । यह कल्याण सप्तमी सभी पापों को विनष्ट करने वाली तथा सभी देवताओं से पूजित है ॥२३०॥ कल्याण सप्तमी का ब्रत सभी दुष्टों को शान्त करने वाला होता है। इस कल्याण सप्तमी के प्रसङ्ग को जो कोई भी पढता अथवा सुनता है, उसको यह व्रत अनन्त फल प्रदान करता है॥ २३ १५॥ इसको पढने अथवा सुनने वाला भी व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है हे राजवर्य ! अब में आपको विशोकसप्तमी के व्रत को बतलाता हूँ ॥२३२॥ विशोक सप्तमी के दिन उपवास करने वाले व्यक्ति को कभी भी शोक नहीं होता है । माघ मास के शुक्ल पक्ष में पञ्चमी तिथि को काली तिल मिश्रित जल से स्नान करे ॥२३३॥ फिर खिचड़ी खाकर मुहँ धोए । उसके बाद ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए रात्रि में सो जाय ॥२३४॥ फिर प्रातःकाल उठकर, स्नान करके जप इत्यादि करके पवित्र हो जाय । सुवर्ण का कमल बनवाकर उस पर अर्काय नमः इस मंत्र से सूर्य की पूजा करे ॥२३५॥ पूजन लाल करवीर के पुष्प से तथा दो वस्रों से करे । उसके बाद प्रार्थना करे कि हे आदित्य ! जिस तरह आपके द्वारा जगत् सदा शोक रहित रहता है ॥२३६।। उसी तरह आपकी भक्ति के फलस्वरूप मैं प्रत्येक जन्म में शोक रहित बना रहूँ । इसतरह षष्ठी तिथि को भक्ति पूर्वक पूजा करके भक्ति पूर्वक ब्राह्मणों की पूजा करे ॥२३७॥ फिर सप्तमी के दिन जगकर गोमूत्र से आचमन करे । उसके पश्चात् नित्य कृत्य करके ब्राह्मणों की पूजा करे, तदन्तर ब्राह्मण को दो हजार कमल तथा गुड भरे पात्र का दान दे । उसके बाद तेल तथा नमक से रहित भोजन करे । सप्तमी के दिन मौन ब्रत रखे ॥२३८-२३९।। तदनन्तर ऐश्वर्यकामी को पुराण का
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