Srishti Khanda Extracted Page 340

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-340

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Sanskrit Original

कलधौतमयांस्तद्वल्लोकेशान् कारयेद् बुध: । ब्रह्मविष्ण्वर्कवान्कार्यो नितंबोत्र हिरण्मयः ॥१८७॥ राजतं स्यात्तदन्येषां पर्वतानां च कांचनम् । शेषं च पूर्ववत्कुर्याद्धोमजागरणादिकम् ॥१८८॥ दद्यात्तदवत्प्रभातेतुगुर वेरौप्यपर्वतम् । विष्कं भशैलातृत्विग्भ्यः पूज्यवस्त्रविभूषणे: ॥९८९॥ इमं मंत्रं पटठन्दद्याददर्भपाणिर्विमत्सरः । पितृणांवल्लभं यस्मादिन्दोर्वा शंकरस्य च ॥१९०॥ रजतं पाहि तस्मान्नः शोकसंसारसागरत्। इत्थं निवेश्य यो दद्याद्रजताचलमुत्तमम् ॥१९९॥ गवामयुतसाहस्त्रफलमाप्रोति मानव: । सोमलोके सगंधर्वैः किन्नराप्सरसां गणैः ॥१९२॥ पूज्यमानो वसेद्विद्वान्यावदाभूतसंप्लवम् । अथातः संप्रवक्ष्यामि शर्कराचलमुत्तमम् ॥१९३॥ यस्य प्रदानाद्रिष्ण्वर्क रुद्रास्तुष्यन्ति सर्वदा । अष्टभिः शर्कराभारैरुत्तमः स्यान्महाचलः ॥१९४॥ चतुर्भिर्मध्यमः प्रोक्तो भाराभ्यामधमः स्मृतः । भारेण चार्द्धभारेण कुर्याद्यः स्वल्पवित्तवान् ॥१९५॥ बिष्क भपर्वतान्कुर्यात्तुरीयांशेन मानवः । धान्यपर्वतवत्सर्व हैमांबरसुसंयुतम् ॥१९६॥ मेरोरुपरितः स्थाप्यं हैमं तत्र तरुत्रयम् । मंदारः पारिजातश्च तृतीयः कल्पपादपः ॥१९७॥ एतद्वृक्षत्रयं मूर्ध्निसर्वेष्वपि निवेशयेत् । हरिचंदनसंतानौ पूर्वपश्चिमभागयोः ॥१९८॥ निवेश्यौ सर्वशैलेषु विशेषाच्छर्कराचले । मंदरे कामदेवस्तु प्रत्यग्वक्त्रः सदा भवेत् ॥१९९॥ निर्माण होता हें ॥१८५॥ जो असमर्थ व्यक्ति है, उसको अपनी शक्ति के अनुसार बीस पल से अधिक चाँदी से रजताचल का निर्माण करना चाहिए । उसके चौथाई पल रजत से विष्कम्भ पर्वतों का निर्माण करे । धान्य पर्वत के ही समान मन्दराचल आदि पर्वतों का निर्माण करे ॥१८६॥ विज्ञ पुरुषों को पहले के ही समान चाँदी के ही लोकपालों को बनवाना चाहिए । रौप्याचल की तलहटी का निर्माण ब्रह्मा, विष्णु तथा सूर्य से युक्त करे और उसे सुवर्ण का होना चाहिए ॥१८७॥ अन्य पर्वतों की तलहटी का निर्माण चाँदी और सोने से करे । शेष कार्यों को पहले के ही समान करना चाहिए । पहले के ही समान प्रातःकाल उस पर्वत का दान आचार्य को कर दे और विष्कम्भ पर्वतों का दान ऋत्विजों को करे और उनकी पूजा वस्रों तथा आभूषणों से करे ॥१८८-१८९॥ दान देते समय हाथ में कुश लेकर बिना किसी मत्सर (द्वेष) के इस मन्त्र को पढे । चूँकि पितरों, चन्द्रमा तथा शङ्करजी को चाँदी प्रिय है॥१९०॥ इसीलिए हे रजत ! आप हमलोगों की इस शोकमय संसार सागर से रक्षा करें । इस तरह से बनाकर जो व्यक्ति रजताचल का दान करता है ॥१९१॥ वह दश हजार गायों के दान करने का फल. प्राप्त करता है । वह सोमलोक में गन्धर्व, किन्नर तथा अप्सराओं से पूजित होते हुए प्रलय काल पर्यन्त निवास करता है । अब मैं उत्तम शर्कराचल (चीनी के पर्वत) का वर्णन करता हूँ ॥१९२-१९३॥ इस शर्कराचल का दान करने से विष्णु, सूर्य तथा द्र को प्रसन्नता होती है । आठ भार चीनी के द्वारा उत्तम कोटि का शर्कराचल होता है ॥१९४॥ चारभार चीनी का वह मध्यम कोटि का होता है तथा दो भार चीनी का शर्कराचल अधम कोटि का होता है । जो अत्यल्पपवित्त वाला व्यक्ति हो उसको एक भार अथवा आधे भार का शर्कराचल बनाना चाहिए ॥१९५॥ उसके चौथाई भाग का विष्कम्भ पर्वतों को बनाना चाहिए । इस पर्वत को सुवर्ण तथा वख्रों से सजाना चाहिए ॥१९६॥ उस सुमेरु पर्वत के ऊपर मुवर्ण के बने तीन वृक्षों की स्थापना करनी चाहिए । पहला मन्दार वृक्ष हो दूसरा परिजात एवं तीसरा कल्पवृक्ष होना चाहिए ॥१९७॥ इन तीनों वृक्षों को सभी पर्वतों के ऊपर स्थापित करना चाहिए । हरि चन्दन तथा सन्तान इन दो वृक्षों को क्रमशः पूर्वभाग तथा पश्चिम भाग में होना चाहिए ॥१९८॥ इन दोनों वृक्षों को सभी पर्वतं पर स्थापित करना चाहिए और शर्कराचल पर तो अवश्य स्थापित करना चाहिए । मन्दारचल पर्वत पर कामदेव को पूर्वाभिमुख

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