Srishti Khanda Extracted Page 339

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-339

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

मुक्ताफलसहस्रेण पर्वतस्स्यादनुत्तमः । मध्यमः पंचशतिकस्त्रिशतेनाधमः स्मृतः ॥१७३॥ चतुर्थाशेन विष्कंभपर्वताः स्युः समन्ततः । पूर्वेण वञ्रगोमेदै ् दक्षिणेनेद्रनीलकैः ॥१७४॥ पुष्परागैर्युतः कार्योविद्दद्धिर्गधमादनः । वैडूर्यविद्रुमैः पश्चात्संमिश्रोविपुलाचलः ॥१७५॥ पद्मरागैः ससौवर्ण रुत्तरेणापि विन्यसेत् । धान्यपर्वतवत्सर्वमत्रापि परिकल्पयेत् ॥१७६॥ तद्ददावाहनं कृत्वा वृक्षान्देवांश्च कांचनान् । पूजयेत्पुष्पगन्धाद्यैः प्रभाते स्याद्विसर्जनम् ॥१७७॥ पूर्ववहुरुऋत्विगभ्य इमं मंत्रमुदीरयेत् । यथादेवगणाः सर्वे सर्वरत्नेष्ववस्थिताः ॥१७८॥ त्वं च रत्ममयो नित्यमतः पाहि महाचल। यस्माद्रत्नप्रदानेन तुष्टिमेतिजनार्दनः ॥९७९॥ पूजामंत्रप्रसादेन तस्मान्नः पाहि पर्वत । अनेन विधिना यस्तु दद्याद्रत्नममयं गिरिम् ॥१८०॥ स याति वैष्णवं लोकममरेश्वरपूजितः । यावत्कल्पशतं साग्रं वसैत्तत्रनराधिप ॥१८ १॥ रूपारोग्यगुणोपेतः सप्तद्वीपाधिपो भवेत् । ब्रह्महत्यादिकं किंचिदत्रामुत्राथवा कृतम् ॥१८२॥ तत्सर्व नाशमायाति गिरिर्वज्राहतो यथा । अथातः संप्रवक्ष्यामि रौप्याचलमनुत्तमम् ॥९८३॥ यत्प्रदानान्नरो याति सोमलोकं नरोत्तम। दशभिः पलसाहस्रैरुत्तमो रजताचलः ॥१८४॥ पंचभिर्मध्यमः प्रोक्तस्तदर्धेनाधमः स्मृतः । अशक्तो विंशतेरूद्र्थ्व कारयेच्छक्तितः सदा ॥१८ ५॥ विष्कं भपर्वतांस्तद्वत्तरीयांशेन कल्पयेत् । पूर्ववद्राजतान् कुर्यान्मंदरादीन्विधानतः ॥१८६॥ विमान से घृत पर्वत का दान करने वाला पुरुष ॥१७१॥ प्रलय काल पर्यन्त पितृगणों के साथ अपनी इच्छानुसार विचरण करता है । अब मैं श्रेष्ठ रत्न पर्वत के दान की विधि का वर्णन करता हूँ ॥१७२॥ एक हजार मुक्ताओं का रत्नाचल उत्तम कोटि का होता है । पाँच सौ मुक्ताओं का वह मध्यम कोटि का होता है और तीन सौ मुक्ताओं का वह अधम कोटि का होता है । जितनी मुक्ताओं का रत्माचल बनाये उसके चतुर्थ अंश से विष्म्भक पर्वतों को बनाये । पूर्व दिशा में हीरा और गोमेद से दक्षिण दिशा में इन्द्र नीलमणि से ॥१७३-१७४॥ तथा पुष्पराग मणि से गन्धमादन नामक विष्कम्भक पर्वत का निर्माण करना चाहिए । पश्चिम दिशा में वैडूर्य तथा विद्रुम दोनों को मिलाकर षिष्कम्भक पर्वत का निर्माण करे ॥१७५॥ सुवर्ण के साथ पद्मराग मणियों के द्वारा उत्तर दिशा में विष्कम्भक पर्वत का निर्माण करे । धान्यपर्वत के ही समान इस रत्न पर्वत के भी दान तथा सारे कार्यो को करना चाहिए ।॥१७६॥ उसी के समान वाहनों का निर्माण करके वृक्षों तथा देवताओं को सुवर्ण का बनवाना चाहिए । उन सबों की पूजा चन्दन तथा फूलों से करना चाहिए एवं प्रातःकाल सबों का विसर्जन करे ॥१७७॥ धान्यपर्वत के ही समान आचार्य एवं ऋत्विजों के द्वारा इस मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए । जिस तरह सभी देवताओं का सभी रत्नों में निवास रहता है ॥१७८॥ अतएव हे रत्नाचल ! तुम मेरी सदा रक्षा करो । जो व्यक्ति इस विधि से रत्नाचल का दान करता है ॥१८०॥ वहदेवताओं के स्वामी इन्द्र के द्वारा पूजित होकर भगवान् विष्णु के लोक में जाता है । हे राजन् ! वह भगवान् विष्णु के लोक मे सौ कल्प से भी ज्यादा समय तक निवास करता है ॥१८१॥ उसके बाद वह रूप तथा आरोग्य से युक्त होकर सातो द्वीपों का स्वामी होता है । उसके द्वारा इस लोक में अथवा परलोक में ब्रह्महत्या आदि जो कुछ भी पाप किए गये रहते हैं ॥१८२॥ वे सब उसी तरह से विनष्ट हो जाते हैं जिसतरह वज्र के प्रहार से पर्वत विनष्ट हो गये। अब मैं श्रेष्ठ रौप्य (चाँदी के पर्वत) के दान का वर्णन करता हूँ ॥१८३॥ हे नरोत्तम ! उस रौप्यपर्वत का दान करने वाला मनुष्य सोमलोक में जाता है । उत्तम रजताचल का निर्माण दश हजार पल चाँदी से होता है ।।१८४॥ पाञ्च हजार पल चाँदी से मध्यम कोटि का रजताचल बनता है । ढाई सौ पल चाँदी के द्वारा अघम कोटि का रौप्याचल का

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know