Srishti Khanda Extracted Page 338
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-338
Sanskrit Original
भारेणाल्पधनो दद्याहित्तशाठ्यविवर्जित: । धान्यपर्वतवत्सर्वमासाद्यं राजसत्तम ॥१५८॥ प्रभातायां च शर्वर्या दद्यादिदमुदीरयेत्। त्वमेवावरणं यस्माल्लोकानामिह सर्वदा ॥१५९॥ कार्पासाद्रे नमस्तस्मादघौघध्वंसनो भव । इति कार्पास शैलेंद्रं यो दद्याच्छर्वसंनिधौ॥१६०॥ रुद्रलोके वसेत्कल्पं ततो राजा भवेदिह । अथातः संप्रवक्ष्यामि घृताचलमनुत्तमम्॥१६९॥ तेजोमयं घृतं पुण्यं महापातकनाशनम् । विंशत्या घृतकुंभानामुत्तमः स्यादघृताचलः ॥१६२॥ दशभिर्मध्यमः प्रोक्तः पंचभिस्त्वधमः स्मृतः । अल्पवित्तोपि कुर्वीत द्वाभ्यामिह विधानतः ॥१६३॥ विष्कम्भपर्वतांस्तद्वच्चतुागेन कल्पयेत् । शालितंडुलपात्राण कुंभोपरि निवेशयेत् ॥१६४॥ कारयेत्संहतान्नुच्चान्यथाशोभं विधानतः । वेष्टयेच्छुक्लवासोभिरिश्षुदंडफलादिकैः ॥१६५॥ धान्यपर्वतवत्सर्वं विधानमिह पठ्यते । अधिवासनपूर्वहि तद्वद्धोमसुरार्चनम्॥१६६॥ प्रभातायां च शर्वर्यां गुरवे विनिवेदयेत् । विष्कं भपर्वतांस्तद्वदृत्विगभ्यः शांतमानसः ॥१६७॥ संयोगाद् घृतमुत्पन्न॑ यस्मादमृततेजसि। तस्माद्घृतार्चिर्विश्वात्मा प्रीयतामत्र शंकरः ॥१६८॥ यस्मात्तेजोमयं ब्रह्मघृते चैव व्यवस्थितम् । घृतपर्वतरूपेण तस्मान्नः पाहि भूधर ॥१६९॥ अनेन विधिना दद्याद् घृताचलमनुत्तमम् । महापातकयुक्तोपि लोकमायाति शांभवम् ॥१७०॥ हंससारसयुक्तेन किंकिणीजालमालिना । विमानेनाप्सरोभिश्च सिद्धविद्याधरैर्वृतः ॥९७९॥ विचरेत्पितृभिः सार्धं यावदाभूतसंप्लवम् । अथातः संप्रवक्ष्यामि रत्नाचलमनुत्तमम् ॥१७२॥ कोटि का होता है और पाँच भारों का कनिष्ठ होता है ॥१५७॥ अल्प धन वाला व्यक्ति एक भार का कर्पास पर्वत दान करे । इसमें वित्तशाठ्य (कंजूसी) न करे । हे राजश्रेष्ठ ! इसमें धान्यपर्वत के ही समान सब कुछ करना चाहिए।। १५८।। इसका दान रात बीत जाने पर देना चाहिए । उस समय दाता इस तरह से कहे-- इस संसार के सभी लोगों के आवरण स्वरूप तुम ही हो ॥१५९॥ हे कर्पास पर्वत ! तुमको नमस्कार है, मेरे समस्त पाप समूह को तुम विनष्ट करो । इस प्रकार से जो व्यक्ति शङ्करजी के सन्निकट कर्पास पर्वत का दान करता है ॥१६०॥ वह रुद्र लोक में जाकर एक कल्प तक निवास करता है, उसके बाद वह संसार में आकर राजा होता है । अब मैं सर्वोत्तम घृत पर्वत का वर्णन करता हुँ ॥१६१॥ घृत तेजोमय तथा महापातकों को विनष्ट करने वाला होता है । बीस घड़ों का घृतपर्वत सर्वोत्तम होता है ।।१६२॥ दश घड़ों का वह मध्यम कोटि का होता है और पाँच घड़ों का घृत पर्वत अधम कोटि का होता है । जो अल्प वित्त वाले लोग हैं वे दो घड़ों का घृत पर्वत दान करें । उसके चौथाई भाग से विष्कम्प पर्वतों को बनाये । घड़ों के ऊपर चावल को पात्र में भरकर पूर्णपात्र बनाये ॥१६४॥ उन घड़ों को ऐसे ऊंचा करे कि वे देखनें में अच्छे लगे । उसको वस्त्र तथा ईख एवं फलों से वेष्टित करके अलङ्कृत करे ॥१६५॥ इसके भी सारे विधान धान्य पर्वत के ही समान होते हैं । उसी के समान इस घृतपर्वत का अधिवासन पूर्वक होम तथा देवताओं का पूजन करे ॥१६६॥ रात्रि के बीत जाने पर प्रातःकाल उसका दान अपने आचार्य के लिए करे । शान्तमना होकर विष्कम्भ 'पर्वतों का दान ऋत्विजं को देना चाहिए । चूकि घृत अमृत के तेज के संयोग से उत्पन्न हुआ है इसलिए घृतार्चि स्वरूप भगवान् शङ्कर प्रसन्न हों ॥१६८॥ चूकि तेजोमय ब्रह्म का निवास घृत में है, अतएव हे पर्वत ! घृतपर्वत रूप से तुम हमारी रक्षा करो ॥१६९॥ इस विधि से श्रेष्ठ घृताचल (घृत पर्वत) का दान करना चाहिए । घृत पर्वत का दान करने वाला यदि महापापी भी है तो भी वह भगवान् शङ्कर के लोक में जाता है ॥१७०॥ हंसों तथा सारस आदि पक्षियों से युक्त, जिसमें घुंघुरू बंधे हुए रहते हैं ऐसे अप्सराओं, सिद्धों तथा विद्याधरों से युक्त ७b
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