Srishti Khanda Extracted Page 336
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-336
Sanskrit Original
कुर्याज्जागरमत्रापि दानमंत्रात्रिबोधत । सौभाग्यरससंयुक्तो यतोऽयं लवणे रसः ॥१३०॥ तदात्मकत्वेन च मा पाह्यापन्नं नगोत्तम । यस्मादन्ये रसाः सर्वे नोत्कटा लवणं विना ॥१३१॥ प्रियश्च शिवयोर्नित्यं तस्माच्छांतिप्रदो भव । विष्णुदेहसमुद्धूतो यस्मदारोग्यवर्धनः ॥१३२॥ तस्मात्पर्वतरूपेण पाहि संसारसागरात् । अनेन विधिना यस्तु दद्याल्लवणपर्वतम्॥१३३॥ उमालोके वसेत्कल्पं ततो याति परां गतिम् । अतः परं प्रवक्ष्यामि गुडपर्वतमुत्तमम् ॥१३४॥ यत्मदानान्नरः स्वर्ग प्राप्रोति सुरपूजितः । उत्तमो दशभिभारि मध्यमः पंचभिर्मतः ॥१३५॥ त्रिभिभरिः कनिष्ठः स्यात्तदर्धेनाल्पवित्तवान्। तद्ठदामंत्रणं पूजां हैमवृक्षान्सुरार्चनम् ॥१३६॥ विष्क भपर्वतांस्तद्वत्सरांसि वनदेवताः । होमं जागरणं तद्वदल्लोकपालाधिवासनम् ॥ १ ३७॥ धान्यपर्वतवत्कुर्यादिमं मंत्रमुदीरयेत् । यथा देवेषु विश्वात्मा प्रवरोयं जनार्दनः॥१३८॥ सामवेदस्तु वेदानां महादेवस्तु योगिनाम् । प्रणवः सर्वमंत्राणां नारीणां पार्वती यथा॥१३९॥ तथा रसानां प्रवरः सदैवेक्षुरसो मतः। मम तस्मात्परां लक्षमीं ददातु गुडपर्वतः ॥१४०॥ यस्मात्सौभागयदायिन्या धामत्वं गुडपर्वत । निर्मितश्चासि पार्वत्या तस्मान्मां पहि सर्वदा ॥९४१९॥ अनेन विधिना यस्तु दद्याहुडमयं गिरिम् । संपूज्यमानो गंधर्वै गौरीलोके महीयते ॥१४२॥ पुनः कल्पशतांते च सप्तद्वीपाधिपो भवेत्। आयुरारोग्यसंपन्नः शज्ञुभिश्चापराजितः ॥१४३॥ उसी के समान सोने के लोकपाल आदि को बनाना चाहिए । धान्य पर्वत के ही समान सरोवर, वन तथा वृक्ष आदि का भी सन्निवेश करना चाहिए ॥१२९॥ लवणाचल के दान में भी रात्रि को जागरण करना चाहिए । अब आप इसके दान के मन्त्रों को सुनें । लवण का रस सौभाग्य रस से युक्त होता है ॥१३०॥ हे नगोत्तम ! (पर्वत श्रेष्ठ) तदात्मक होने के कारण आप मेरी रक्षा करें । चूकि लवण के बिना दूसरे रस उत्कट नहीं हो पाते हैं ॥१३१।। और आप शिव तथा शिवा दोनों के प्रिय है, अतएव आप मुझे शान्ति प्रदान करें । आप भगवान् विष्णु के शरीर से उत्पन्न हैं और आरोग्य को बढाते हैं ॥१३२॥ इसलिए आप पर्वत रूप से इस संसार सागर से मेरी रक्षा करें । जो व्यक्ति इस विधि से लवणाचल का दान करता है ॥१३३॥ वह एक कल्प्र तक पार्वती जी के लोक में निवास करता है और उसके बाद मोक्ष को प्राप्त कर लेता है । इसके बाद मैं आपको गुड पर्वत के दान की विधि का वर्णन करता हूं॥१३४॥ गुड पर्वत का दान करने वाला मनुष्य देवताओं द्वारा सम्मानित होकर स्वर्गलोक में जाता है । दश भारों का गुड पर्वत उत्तम होता है । पाँच भारों का वह मध्यम कोटि का होता है ॥१३५॥ तीन भार का गुड पर्वत अधम कोटि का होता है । और जो वित्तहीन है वह डेढ भार का गुड पर्वत बनाये । इसमें भी पूर्ववत् ही आवाहन, पूजन और होम तथा वृक्ष के देवताओं की पूजा करनी चाहिए ॥१३६॥ पूर्ववत् ही विष्कम्भ पर्वत, सरोवरों, वन देवताओं, होम, रात्रि जागरण तथा लोकपालों का अधिवास करना चाहिए ॥१३७॥ इन सभी कार्यों को धान्य पर्वत के ही समान करना चाहिए । इस पर्वत के दान में इन मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिए । जिस प्रकार सभी देवताओं में सम्पूर्ण जगत् की आत्मा भगवान् विष्णु श्रेष्ठ हें ॥१३८॥ उसी तरह वेदों में सामवेद श्रेष्ठ है और योगियों में भगवान् शङ्कर श्रेष्ठ है, सभी मन्त्रों में प्रणव (ओंकार) श्रेष्ठ है तथा नारियों में पार्वतीजी श्रेष्ठ हैं ॥१३९॥ उसी तरह रसों में ् रेछ ईख का रस बतलाया गया है । इसीलिए यह गुड़ पर्वत मुझको सर्वोत्तम लक्ष्मी प्रदान करे ॥१४०॥ हे गुड़ पर्वत आप सौभाग्यदायिनी (पार्वती जी) के आश्रय हैं, और पार्वती ने ही तुम्हें बनाया है, इसीलिए तुम मेरी सदा रक्षा करो ॥१४१॥ जो व्यक्ति इस विधि से गुडपर्वत का दान करता है वह गन्धर्वो के द्वारा पूजित होते हुए गौरीजी के
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