Srishti Khanda Extracted Page 335
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-335
Sanskrit Original
स्नात्वा तु गुरवे दद्यान्मध्यमं पर्वतोत्तमम् । विष्कंभपर्वतान् दद्यादृत्विग्भ्यः क्रमशो नृप ॥११५॥ गावो देयाश्चतुर्विशदथवा दश पार्थिव । शक्तितः सप्त चाष्टौ वा पंच दद्यादशक्तिमान्॥९९१६॥ एकापि गुरवे देया कपिलाथपयस्विनी । पर्वतानामशेषाणामेष एव विधिः स्मृतः॥११७॥ त एव पूजने मंत्रास्तएवोपस्कराः स्मृताः । ग्रहाणां लोकपालानां ब्रह्मादीनां च सर्वतः ॥११८॥ स्वमंत्रेणैव सर्वेषु होमः शैलेषु पठ्यते । उपवासी भवेन्नित्यमशक्तौ नक्तमिष्यते ॥११९॥ विधानं सर्वशैलानां क्रमशः शृणु पार्थिव । दानेषु चैव ये मंत्राः पर्वतेषु यथाफलम्॥१२०॥ अन्नं ब्रह्म यतः प्रोक्तमन्नंप्राणाः प्रकीर्तिताः । अन्नाद्धवंति भूतानि जगदन्नेन वर्घते ॥१२९॥ अन्नमेव यतो लक्ष्मीरन्नमेव जनार्दनः । धान्यपर्वतरूपेण पाहि तस्मान्नगोत्तम ॥९२२। अनेन विधिना यस्तु दद्याद्धान्यमयं गिरिम् । मन्वंतरशतं साग्रं देवलोके महीयते॥१२३॥ अप्सरोगणगंधर्वै राकीर्णेन विराजितः । विमानेन दिवः पृष्ठमायाति नृपसत्तम॥१२४॥ कर्मक्षये राजराज्यमाप्रोतीह न संशयः। अथातः संप्रवक्ष्यामि लवणाचलमुत्तमम् ॥१२५॥ यत्प्रदानान्नरो लोकमाप्रोति शिवसंयुतम्। उत्तमः षोडशद्रोणैः कर्तव्यो लवणाचलः ॥१२६॥ मध्यमश्च तदर्धेन चतुर्भिरधमस्स्मृतः । वित्तहीनो यथाशक्ति द्रोणादूर्ध्वच कारयेत्॥१२७॥ चतुर्थाशेन विष्कंभपर्वतान्कारयेत्पृथक्। विधानं पूर्ववत्कुर्याद्ब्रह्मादीनां च सर्वदा ॥१२८॥ तद्ृद्धेममयं सर्वलोकपालनिवेशनम् । सरांसि वनवृक्षादितद्द च्चान्यान्निनिवेशयेत् ॥१२९॥ आवाहन करके प्रातःकाल ॥११४॥ स्नान करे बीच के श्रेष्ठ पर्वत को अपने आचार्य को दान दे दे । हे राजन् ! इसके बाद विष्कम्भ पर्वतों को ऋत्विजों को दान दे ॥११५॥ हे पार्थिव ! चौबीस गायों का या दश गायों का दान करे या सात या आठ गायों का दान दे । यदि शक्ति न हो तो पाँच गायों का दान दे ॥११६॥ कम-से-कम एक दूध देने वाली कपिला गौ का दान आचार्य को अवश्य दे । सभी पर्वतों के दान की यही विधि है ॥११७॥ उनके पूजन के वे ही मन्त्र है तथा उनकी सामग्री भी वही है, जो धान्यपर्वत की सामग्री है ग्रहों, लोकपालों तथा ब्रह्मा आदि की भी पूर्ववत् ही स्थापना करे ॥११८॥ उन पर्वतों के मन्त्रों से ही सर्वत्र होम करना चाहिए । ब्रती को सदा उपवास करना चाहिए । यदि उपवास करने का सामर्थ्य न हो तो रात्रि में भोजन कर लें ॥११९॥ हे राजन् ! आप सभी पर्वतों के विधान को क्रमशः सुनें । उन पर्वतों का दान करने से जो फल होते हैं उन सबो को आप सुनें॥१२०॥ अन्न को ही ब्रह्म कहा गया है और अन्न को ही प्राण भी कहा गया है । अन्न से ही सभी भूत उत्पन्न होते हैं, जगत् अन्न से ही बढता है ॥१२१॥ अन्न ही लक्ष्मी तथा नारायण दोनों हें । अतएव हे नगोत्तम ! आप धान्यपर्वत के रूप से मेरी रक्षा करे ॥१२२॥ इस विधि से जो धान्यमय पर्वत का दान करता है, वह देवलोक में सौ मन्वन्तरों से भी अधिक समय तक पूजित होता है ॥१२३॥ हे राजश्रेष्ठ ! वह पुरुष अप्सराओं तथा गन्धर्वो से परिपूर्ण विमान से स्वर्गलोक में जाता है ॥१२४॥ और धर्मो की समाप्ति हो जाने पर इस संसार में वह राजराज (राजाओं का भी राजा) होता है । अब मैं उत्तम लवणाचल (नमक पर्वत) का वर्णन करता हुँ ॥१२५॥ उसका दान करने वाला मनुष्य शिवलोक में जाता है । सोलह द्रोणों का लवणाचल उत्तम होता है ॥१२६। आठ द्रोण का वह मध्यम होता है और चार द्रोण का नमक पर्वत अधम कोटि का होता है । निर्धन व्यक्ति एक द्रोण से अधिक जितना हो सके उतने का ही अपनी शक्ति के अनुसार लवणाचल बनाये ॥१२७॥ जितने भी द्रोण का बनाये उसके चौथाई नमक से वह विष्कम्भ पर्वतों को बनाये । ब्रह्मा आदि का विधान धान्य पर्वत के ही समान करना चाहिए ॥१२८॥
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