Srishti Khanda Extracted Page 334

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-334

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Sanskrit Original

पश्चात्तिलाचलमनेकसुगंधपुष्प सौवर्णपिप्पलहिरण्मयहंसयुक्तम् । आकारयेद्रजतपुष्पवनेन तद्गदव ख्रान्वितं दधिसितोदसरस्तथाग्रे ॥१ ० २॥ संस्थाप्य तंविपुलशैलथोत्तरेण शैलं सुपार्श्वमपि माषमयं सवस्त्रम् । पुष्पैश्च हेमवटपादपशेखरं त माकारयेत्कनककेतुविराजमानम् ॥९ ० ३॥ माक्षीकभद्रसरसा च वनेन तद्दद्रौप्येण भासुरवितानयुतं विधाय । होमश्चतुर्भिरथ वेदपुराण विद्धि दतिरनिंद्यचरिताकृतिभिर्दवजेद्रैः ॥९०४॥ पूर्वेण हस्तमितमत्र विधाय कुंडं कार्यस्तिलैर्यवघृतेन समित्कुशैश्च । रात्रौ च जागरमनुद्धतगीतरूपै रावाहनं च कथयामि शिलोच्चयानाम् ॥१०५॥ त्वं सर्व देवगणधामनिधे विरूद्धमस्मद्गृहेष्वमरपर्वत नाशमाशु । क्षेमं विधत्स्व कुरू शान्तिमनुत्तमां च संपूजितः परमभक्तिमता मया हि ।। ९०६।। त्वमेब भगवानीशो ब्रह्मा विष्णुर्दिवाकरः । मूर्तामूर्तमयंबीजमतः पाहि सनातन ॥१०७॥ यस्मात्त्वं लोकपालानां विश्चमूर्तेश्च मंदिरम्। रुद्रादित्यवसूनां च तस्माच्छान्ति प्रयच्छ मे॥९०८॥ यस्मादशून्यममरै र्नारीभिश्च शिरस्तव । तस्मान्मासुद्धमुष्माददुः खसंसारसागरात् ॥१०९॥ एवमभ्यर्च्य तं मेरुं मंदरं चाभिपूजयेत् । यस्माच्चैत्रथेन त्वं भद्राश्चेनत्र च पर्वत ॥११०॥ शोभसे मंदरक्षिप्रमतस्तुष्टिकरो भव । यस्माच्चूडामणि जबूद्वीपे त्वं गंधमादन ॥१११॥ गंधर्वगणशोभावांस्ततः कीतिर्दृढास्तु मे । यस्मात्त्वं केतुमालेन वैभ्राजेन वनेन च ॥११२॥ हिरण्मयाश्मशो भावांस्तस्मात्पुष्टि वास्तु मे। उत्तरैः कुरुभि यस्मात्सावित्रेण वनेन च ॥११३॥ सुपार्श राजसे नित्यमतः श्रीरक्षयास्तु मे । एवमामंत्र्य तान्सर्वान्रभाते विमले पुनः ॥११४॥ से बने वनों से युक्त होना चाहिए ॥१०१॥ उसके पश्चिम भाग में तिल निर्मित पर्वत होना चाहिए उसे सुगन्धित पुष्प, पिप्पल, सुवर्णमय हंस से युक्त होना चाहिए वहाँ चाँदी से पुष्पों को बनवाये, उसके आगे दधि के समान धवलजल को वस्र निर्मित होना चाहिए ॥१०२॥ उसके बाद उत्तर दिशा में माष (उड़द) और वस्र से सुपार्श्व पर्वत को बनाकर स्थापना करे । उसको पुष्पों से युक्त सुवर्ण निर्मित वट वृक्ष को उसके ऊपर होना चाहिए, फिर उस सुवर्ण के पताकों से सुशोभित बनाये ॥१०३॥ मधुमक्खी के छातों से सरस वन तथा चाँदी से सुशोभित चाँदनी से अलंकृत करके, चारो वेदों के ज्ञाता, दान्त, सदाचार सम्पन्न श्रेष्ठ विद्वानों द्वारा होम कराये ॥१०४॥ एक हाथ का कुण्ड बनाकर, तिल, यव, घृत तथा कुश से होम कराये, रात्रि में सौम्य गीतों के द्वारा जागरण करे । अब मैं पर्वतों का आवाहन बतलाता हूँ ॥१०५॥ हे देव पर्वत, सुमेरु ! आप सभी देवताओं के आश्रय स्वरूप है, अतएव हमारे विरुद्ध रहने वाले समस्त हमारे घर के तत्त्वों को विनष्ट करें । आप हमारे घर में सर्वोत्तम शान्ति स्थापित करें । मैने आपकी परमा भक्ति पूर्वक पूजा की है ॥१०६॥ आप ही रुद्र, ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य तथा सम्पूर्ण मूर्त एवं अमूर्त द्रव्य स्वरूप कारण तत्त्व है, अतएव आप मेरी रक्षा करें ॥१०७॥ चूकि आप लोकपालों तथा परमात्मा के मन्दिर हैं । आप रुद्र, आदित्य तथा वसुओं के भी मन्दिर हैं, अतएव आप मेरी रक्षा इस दुःखमय संसार सागर से करें ॥१०९॥ इस तरह से सुमेरु की पूजा करके मन्दणचल की भी पूजा करे और कहे- हे पर्वत ! आप चैत्ररथ वन से त॑था भद्रश्च वर्ष से सुशोभित होते हैं ॥१११॥ अतएव आप शीध्र मेरी तुष्टि करें । हे गन्धमादन तुम जम्बूद्वीप के चूडामणि हो । गन्धर्वगण से सुशोभित आप मेरे यश को सुदृढ बनायें । चूँकि आप केतुमाल वन तथा वैश्राज वन से ॥११२॥ तथा सुवर्णमय प्रस्तरों से सुशोभित हैं; अतएव आप मेरी पुष्टि को निश्चल बनायें । चूँकि तुम उत्तरकुरु वर्ष और सावित्र वन में सुशोभित हो ॥११३॥ अतएव हे सुपार्श्व पर्वत ! आप मेरी श्री की रक्षा करें । इसतरह से सभी पर्वतों का

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