Srishti Khanda Extracted Page 333

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-333

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Sanskrit Original

मेरुर्महात्रीहिमयस्तु मध्ये सुवर्णवृक्षत्रयसंयुतः स्यात् । मूर्दन्यवस्थानमथांबरेण कार्यत्वनेकं च पुनर्द्रिजाग्रथेः ॥९३॥ चत्वारि शृंगाणि च राजतानि नितंबभागा अपिराजताः स्स्युः । पूर्वेण मुक्ताफलवञ्रयुक्तो याम्येन गोमेदकपदरागैः ॥९४॥ पश्चाच्च गारुत्मतनीलरत्मैः सौम्येनवैडूर्यकपुष्यरागैः । श्रीखंडखंडैरभितः प्रवालै ल॑तान्वितो मौक्तिकप्रस्तराढ्यः ॥९५॥ ब्रह्माथ विष्णुर्भगवान्पुरारि र्दिवाकरोप्यत्र हिरण्मयः स्यात् । तथेक्षु वंशावृतकंदरस्तु घृतोदकप्रस्रबणोदिशासु ॥९६॥ शुभ्रांबराण्यंबुधरावलिः स्यात् पूर्वेण पीतानि च दक्षिणेन । वासांसि पश्चादथकर्बुराणि रक्तानि चैवोत्तरतो धनानि ॥९७॥ रौप्यान्महेद्रप्रमुखांस्तथाऽष्टौ संस्थाप्य लोकाधिपतीन्क्रमेण । नाना वनालीच समंततः स्यान् मनोरमम्माल्यविलेपनं च ॥९८॥ वितानकं चोपरि पंचवर्ण मम्लानपुष्पाभरणं सितं च । इत्थं निवेश्यामरशैलमम्र्यं मेरोस्तु विष्कं भगिरीन्क्रमेणा ॥९९॥ तुरीयभागेन चतुर्दिशं च संस्थापयेत्पुष्पविलेपनाढ्यम् । पूर्वेण मंदरमनेकफलैश्च युक्तं कामेन कांचनमयेन विराजमानम् ॥१० ०॥ याम्येन गंधमदनो विनिवेशनीयो गोधूमसंचयमयः कलधौतवांश्च । हैमेन यज्ञपतिना घृतमानसेन वस्त्रेण राजतवनैश्च ससंयुतः स्यात् ॥९० १॥ का अधम कोटि का धान्यपर्वत होता है ॥९२॥ धान्यपर्वत के ऊपर बीच में तीन सुवर्ण या सुवर्ण वृक्षो को स्थापित करे । उसको ऊपर से श्रेष्ठ ब्राह्मण कपड़े से ढँक दे ॥९३॥ उसके चाँदी के चार शिखरों को तथा चाँदी की तलहटी को बनाए उसके पूर्व में मोतियों या हीरों के तथा उसके दक्षिण तरफ पदाराग मणियों तथा गोमेद को लगाये ॥९४॥ उसके पीछे वाले भाग को नीले रत्नों से बनाये और पश्चिम वाले भाग को वैदूर्यमणि तथा पुष्पराग मणि से बनाये । चारो ओर से श्रीखण्ड के टुकड़ों तथा मूँगे से लताओं को बनाए । उन वृक्षों को मोतियों से बने प्रस्तरों से युक्त होना चाहिए ॥९५॥ इस धान्य पर्वत पर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र एवं सूर्य की सुवर्ण से बनी मूर्तियों को होना चाहिए | उस धान्य सुमेरु की कन्दराओं को ईखदण्ड से घिरा होना चाहिए उसके सभी दिशाओं में घृत रूपी जल चूते रहना चाहिए ॥९६॥ श्वेत वस्रं से मेघों को बनाये, उसके पूर्व भागों में पीले वस्रं को होना दक्षिण भाग में काले वस्नों को होना चाहिए । उत्तर दिशा में मेघों को लाल वस्रं से बना होना चाहिए ॥९७॥ चाँदी से निर्मित इन्द्र आदि आठ लोकपालों की क्रमशः स्थापना करके अनेक वनों को चारो ओर से बनाये और उन सबों पर सुन्दर मालाओं और चन्दन को लगाये ॥९८॥ उसके ऊपर पाँच रङ्गों की चाँदनी लगाकर उसे उजले पुष्पों से अलङ्कृत करे । इस तरह से सुमेरु पर्वत का निर्माण करके, उसमें विष्कम्भ गिरियों को क्रमश: उस सुमेरु के चौथाई भाग में चारो दिशाओं में स्थापित करके पुष्पों तथा चन्दनादि से अलङ्कृत करे । पूर्व दिशा में मन्दराचल की स्थापना करे । वह अनेक सुवर्णमय फलों से परिपूर्ण हो ॥९९-१००॥ दक्षिण दिश में गेहू की राशि से परिपूर्ण तथा सुवर्णमय गन्धमादन पर्वत को स्थापित करे । सुवर्ण निर्मित भगवान् विष्णु से युक्त वस्र निर्मित मानसरोवर वहाँ होना चाहिए । उसे चाँदी

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