Srishti Khanda Extracted Page 332

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-332

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

सुष्टिखण्ड ३०७ भीष्म उवाच भगवन् श्रोतुमिच्छामि दानमाहात्म्यमुत्तमम् ॥८०॥ यदक्षयं पर लोके देवर्षिगणपूजितम् । पुलस्त्य उवाच मेरोः प्रदानं वक्ष्यामि दधा नृपसत्तम ॥८ ९॥ यत्प्रदातानंतलोका्प्राप्रोति सुरपूजितान् । पुराणेषु च वेदेषु यज्ञेष्वायतनेषु च॥८२॥ न तत्फलमधीतेषु कृतेष्विह यदश्नुते । तस्माद्दानं प्रवक्ष्यामि पर्वतानामनुक्रमात् ॥८ ३॥ प्रथमो धान्यशैलः स्याद्दितीयो लवणाचलः । गुडाचलस्तृतीयस्तु चतुर्थो हेमपर्वतः ॥८४॥ पंचमस्तिलशैलस्स्यात् षष्ठः कार्प्पासपर्वतः। सप्तमो घृतशैलः स्याद्रत्नशैलस्तथाष्टमः ॥८५॥ राजतो नवमस्तद्वदशम: शर्कराचलः । वक्ष्येविधानमेतेषां यथावदनुपूर्वशः ॥८६॥ अयने विषुवे पुण्ये व्यतीपाते दिनक्षये। शुक्लपक्षे तृतीयायामुपरागे शशिक्षये ॥८७॥ विवाहोत्सवयज्ञेषु द्वादश्यामथवा पुनः । शुक्लायां पंचदश्यां वा पुण्यरक्षें वा विधानतः॥८८॥ धान्यशैलादयो देयाः कार्तिक्यां ज्येष्ठपुष्करे। तीर्थेष्वायतने वापि गोष्ठे वा भवनांगणे ॥८९॥ मंडपं कारयेद्धक्त्था चतुरस्तरमुदङ्मुखम् । प्रागुदक्प्रवणं पुण्यं प्राङ्मुखं वा विधानतः ॥९०॥ गोमयेनानुलिप्तायां भूमावास्तीर्य वै कुशान् । तन्मध्ये पर्वतं कुर्याद्विष्कंभं पर्वतान्वितम् ॥९ १॥ घान्यद्रोणसहस्त्रेण भवेत्तिरिरिहोत्तमः । मध्यमः पंचशतकैः कनिष्ठश्च त्रिभिः शतैः ॥९२॥ इस ब्रत को करने की राय देता है, वह भी एक कल्प पर्यन्त इन्द्र के लोक में निवास करता है तथा देवताओं के द्वारा पूजित होता हैं । भीष्मजी ने कहा-- हे भगवन् ! मैं उस दान के उत्तम माहात्म्य को सुनना चाहता हूँ ॥८ ०॥ जा दान परलाक में अक्षय तथा देवों एवं ऋषियों के समूह द्वारा पूजित होता है । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- हे नृपश्रेष्ठ ! में दश प्रकार के सुमेरुओं के दान को आपको बतलाता हुँ ।॥८१।। उन सबों का दान करने वाला देवताओं से पूजित अनन्त लोकों को प्राप्त करता है । जिस फल को पुराणों तथा वेदों के पढने से अथवा यज्ञों को करने से नहीं प्राप्त किया जा सकता है जो फल दानों को करने से होता हे । इसीलिए मैं क्रमश: पर्वतों के दान का वर्णन करूंगा ॥८३॥ पहला धान्य पर्वत है, दूसरा लवण (नमक) पर्वत है । तीसरा पर्वत गुड पर्वत है, चौथा सुवर्ण पर्वत हैं ॥८४॥ पाँचवाँ पर्वत तिल पर्वत है, छठा कर्पास (रुई) पर्वत है । सातवाँ घृतपर्वत है, आठवाँ रत्नपर्वत है॥८५॥ नवाँ चाँदी का पर्वत हे और दशवाँ शर्करा (चीनी का) पर्वत है । अब मैं इस सबों के दान का विधान क्रमश वतलाता हूँ ।८६।। उत्तरायणादि अयनो के बदलने पर, पवित्र विषुव काल में, व्यतीपात योग के होने पर अथवा दिनक्षय के समय अथवा शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को, या ग्रहण के समय, या चन्द्रमा का क्षय (अमावस्या) होने पर ॥८७॥ या विवाह के समय या यज्ञ के समय अथवा द्वादशी तिथि को, अथवा पूर्णिमा के दिन या किसी पवित्र नक्षत्र में विधिपूर्वक ॥८८॥ कार्तिक पूर्णिमा के दिन ज्येष्ठ पुष्कर में धान्यपर्वत आदि का दान देना चाहिए । तीर्थ में, या घर में या गोशाले में, या मकान के आंगन में उत्तराभिमुख का चतुरस्र मण्डप बनवाये । पूर्व का आर जिसका जल बहता हो अथवा पूर्वाभिमुख होकर विधि पूर्वक इन दोनों को करे ॥८९-९०॥ सबसे पहलेगाबर से लीपी हुयी भूमि पर कुशों को बिछाये । उसके बीच में विष्कम्भ पर्वत से युक्त पर्वत का निर्माण करे ॥९१॥ एक हजार द्रोण धान्य का पर्वत सर्वोत्तम कोटि का होता है । पाँच सौ द्रोण का मध्यम कोटि का तथा तीन सौ द्रोण

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know