Srishti Khanda Extracted Page 330
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-330
Sanskrit Original
प्राङ्मुखी कल्पयेद्धेनुं मृदा वा गां सवत्सकां । उत्तमा गुढधेनुः स्यात्सदा भारचतुष्टयम् ॥५४॥ वत्सं भारेण कुर्वीत भाराभ्यां मध्यमा स्मृता। अर्द्धभारेण वत्सस्स्यात् कनिष्ठा भारकेण तु॥५५॥ चतुर्थांशेन वत्सः स्याद्गृहवित्तानुसारतः । धेनुवत्सौ कृतौ चोभौ सितसूक्ष्मांबरावृतौ॥५६॥ शुक्तिकर्णाविक्षुपादौ शुचिमुक्ताफलेक्षणौ । सितसूत्रासिराजालौ सितकंबलकंबलौ ॥५७॥ ताप्नगंडक पृष्ठौ हौ सितचामरलोमकौ । विद्रुम भ्रूयुगावेतौ नवनीतस्तनान्वितौ ॥५८॥ काञ्चनाक्षियुगोपेताविन्द्रनीलकनीनिकौ । क्षौमपुच्छौ कांस्यदोहौ शुभ्रातिकमनीयकौ॥५९॥ सुवर्णश्ृंगाभरणौ राजताढ्यखुरौ च तौ। नानाफलसमायुक्तौ घ्राणगंधकरंडकौ ॥६०॥ इत्येवं रचयित्वा तु धूपदीपैस्तथार्चयेत् । या लक्ष्मीस्सर्वभूतानां या च देवेष्ववस्थिता ॥६१॥ धेनुरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु । विष्णोर्वक्षसि या लक्ष्मीः स्वाहा या च विभावसौ॥६ २॥ चंद्रार्कशक्रशक्तिर्या सा धेनुर्वरदास्तु मे स्वधा त्वं पितृमुख्यानां स्वाहा यज्ञभुजां यतः॥६३॥ सर्वपापहरा धेनुस्तस्माद्धूतिं प्रयच्छ मे । एवमामंत्र्य तां धेनुं ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥६४॥ विधानमेतद्धेनूनां सर्वासामपि पठ्यते । यास्तु पापविनाशिन्यः पठ्यंते दश धेनवः॥६५॥ तासां स्वरूपं वक्ष्यामि नामानि च नराधिप। प्रथमा गुडधेनुः स्यद् धृतधेनुरथापरा ॥६६॥ आगे गला रहे, ऐसा मृगचर्म पृथिवी पर बिछाये ॥५२॥ पृथिवी को गोबर से लिपा हुआ होना चाहिए और उस पर चारो ओर कुश बिछा दे । उसी तरह बछड़े के लिए छोटा मृगचर्म बिछाये ॥५३॥ उसके ऊपर गुड अथवा मिट्टी की गौ बनाये । गुड की धेनु उत्तम होती है । चार भार वजन वाली गुडधेनु को होना चाहिए ॥५४॥ बछड़ा एक भार गुड का होना चाहिए । दो भार गुड की गौ मध्यम कोटि की होती है । उस स्थिति में बछड़ा आधे भार गुड का होना चाहिए। एक भार गुड की गौ अधम कोटि की होती है ॥५५॥ अपने वित्त के अनुसार बछड़े को गौ के चौथाई भार वाला बनना चाहिए । गौ और बछडा दोनों के बन जाने पर उसे श्वेत तथा महीन वस्र ओढा दे ॥५६॥ उसका सीपी से दोनों कान बनाये । ईख का पैर बनाये सुन्दर मोतियों से दोनों नेत्र को बनाये । उजले सूत्र से उसके स्नायुओं को बनाये । और उजले कंबलों से उसके चमड़ों की कल्पना करे । उन दोनों के गाल तथा पीठ ताम्बे का होना चाहिए धवल चामरों से उसके रोओं को बनाये । मूंगों से उसकी भौहों को बनाये उसका स्तन नवनीत (मक्खन) से वनाये।५ ८॥ उनकी पूच्छ रेशम से बनाये, दोहनपात्र कांसे का होना चाहिए । दुग्ध पात्र को श्वेत तथा सुन्दर होना चाहिए ॥५९॥ सोने का सींग बनाये और चाँदी का खुर बनाये उनके प्राण और नाक इत्यादि को अनेक प्रकार के फलों से बनाये ॥६०॥ इसतरह से गुड धेनु और उसक बछड़े का निर्माण करके उसकी पूजा धूप तथा दीप से करे। उसके बाद प्रार्थना इन मन्त्रों से करे । जिस लक्ष्मी का निवास सभी प्राणियों में है तथा जो लक्ष्मी समस्त देवताओं में रहती हैं ॥६१॥ वही लक्ष्मी धेनुरूप से विद्यमान होकर मेरे पापों को नष्ट कर दें । भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल में जिस लक्ष्मीजी का निवास है जो लक्ष्मी अग्नि में स्वाहा रूप से विद्यमान रहती है ॥६२॥ जो लक्ष्मी चन्द्रमा, सूर्य तथा इन्द्र में शक्ति रूप से विद्यमान रहती हैं वही धेनु रूप से मुझे वर प्रदान करें । चूकि आप मुख्य पितरों की स्वधा रूपिणी और देवताओं की स्वाहा स्वरूपिणी हैं ॥६३।। धेनु सभी पापों को विनष्ट करने वाली होती है, अतएव आप मुझे ऐश्वर्य प्रदान करें । इस तरह से प्रार्थना करके उस गो को ब्राह्मण को दान दे देना चाहिए ॥६४।॥ इस तरह से सभी प्रकार की गायों का विधान बतलाया गया है । जो पापों को विनष्ट करने वाली दश प्रकार की गौ बतलायी गयी हैं ॥६५॥ हे राजन् ! उन सबों के नाम और स्वरूप को में बतला रहा हूँ । पहली धेनु गुड धेनु है, दूसरी घृत ३९
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