Srishti Khanda Extracted Page 329

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-329

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Sanskrit Original

अभिगम्य च विप्राणां मिथुनानि च पूजयेत् । शक्तितस्रीणि चैकं वा वस्त्रमाल्यानुलेपनैः ॥४ १॥ शयनास्थानि पूज्यानि नमोस्तु जलशायिने। ततस्तु गीतवाद्येन रात्र्यां जागरणे कृते ॥४२॥ प्रभाते च ततः स्नानं कृत्वा दांपत्यमर्चयेत्। भोजयेच्च यथाशक्ति वित्तशाठ्येन वर्जितः ॥४३॥ भक्तया श्रुत्वा पुराणानि तहिनं चातिवाहयेत् । अनेन विधिना सर्व मासि मासि समाचरेत् ॥४४॥ ब्रतांते शयनं दद्याहुडधेनुसमन्वितम् । सोपधानं सविश्रामं स्वास्तरावरणं शुभम् ॥४५॥ यथालक्ष्मीर्नरेशत्वां न परित्यज्य गच्छति । तथा सुरूपतारोग्यमशोकं चास्तु मे सदा ॥४६॥ यथा देवेन रहिता न लक्ष्मीर्जायते क्वचित् । तथा विशोकता मेस्तु भक्तिरग्र्या च केशवे ॥४७॥ मंत्रेणानेन शथनं गुडधेनुसमन्वितम् । सूर्यश्च लक्ष्म्या सहितो दातव्यो भूतिमिच्छता॥४८॥ उत्पलं करवीरं वाप्यम्लानं चैव कुंकुमम् । केतकं सिधुवारं च मल्लिका गंधपाटला ॥४९॥ कदंबं कुब्जकं जाती शस्तान्येतानि सर्वदा । भीष्म उवाच गुडधेनुविधानं च समाचक्ष्व मुनीश्वर ॥५०॥ कि रूपा केन मंत्रेण दातव्या तदिहोच्यताम् । पुलस्त्य उवाच गुडधेनुविधानस्य यद्रूपमिह यत्फलम् ॥५९॥ तदिदानीं प्रवक्ष्यामि सर्वपापविनाशनम्। कृष्णाजिनं चतुर्हस्तं प्राग्ग्रीव॑ विन्यसेद्धुवि ॥५२॥ गोमयेनानुलिप्तायां दर्भानास्तीर्य सर्वतः । लधेवणकाजिनं तद्वत् वत्सं च परिकल्पयेत् ॥५३॥ चाँदी के पात्रों में कुशोदक रखे ।।३९॥ उसके बाद सारी रात नृत्य एवं गीत करायें । उसके बाद रात्रि के तीन प्रहर बीत जाने पर ब्राह्मणों के पास जाकर अपनी शक्ति के अनुसार तीन अथवा एक ब्राह्मण दम्पत्तियों की पूजा माला तथा चन्दन से करे ॥४०-४१॥ इसके पश्चात् शयन स्थान की जलशायिने नमः इस मन्त्र से करे । इसके वाद गीत तथा वाद्य के द्वारा रात्रि में जागरण करे लेने पर ॥४२॥ सबेरा होने पर ब्राह्मण दम्पती की पूजा करके और अपनी शक्ति के अनुसार उदारता पूर्वक उनको भोजन कराये ॥४३॥ भक्ति पूर्वक पुराणों का श्रवण करते हुए उस दिन को बिताये । इसी प्रकार प्रत्येक मास में विधिपूर्वक विशोक द्वादशी का व्रत करे ॥४४॥ वर्ष की समाप्ति होने पर जब ब्रत समाप्त हो जाय तो गुड़ की गौ के साथ शय्यादान करे । शय्या में अच्छे मसनद, विस्तर और चादर को होना चाहिये ॥४५॥ इसके बाद हे नरेश ! जिस तरह आपको छोड़कर लक्ष्मी कहीं नहीं जाती है उसी तरह से सदा सुन्दर रूप आरोग्य तथा शोक राहित्य मुझमें बने रहें ॥४६॥ जिस तरह से श्रीभगवान् के बिना अकेले लक्ष्मीजी कहीं भी नहीं जाती है, उसी तरह से मुझमें शोक राहित्य तथा श्रीभगवान् में श्रेष्ठ भक्ति बनी रहे ॥४७॥ इस तरह से गुड निर्मित धेनु से युक्त शय्या की मन्त्र पूर्वक स्तुति करके कल्याण चाहने वाले ब्रती को चाहिऐ कि लक्ष्मी, सूर्य तथा शय्या इत्यादि को ब्राह्मण को दान दे दे ॥४८॥ ताजा कमल करवीर, कुंकुम, केतकी, सिन्धुवार, चमेली, गन्धपाटला (सुगन्धित गुलाब), कदम्ब, कुब्जक तथा जाती (जूही) के पुष्प पूजन में प्रशस्त होते हैं । भीष्मजी ने कहा-- हे मुनीश्वर ! आप गुडधेनु का विधान मुझे बतलायें ॥५०॥ उस गुडधेनु को कैसा होना चाहिए तथा किस मन्त्र से उसका दान करना चाहिए उसे आप मुझे बतलायें । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- गुडधेनु के विधान तथा उसके दान का फल मैं तुम्हें बतला रहा हूँ ॥५१। वह सभी पापों को विनष्ट करने वाला है चार हाथ लम्बा तथा जिसके

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