Srishti Khanda Extracted Page 327
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-327
Sanskrit Original
पश्येद्यदीमानुपनीयमानान् स्पृशेन्मनुष्यैरिहदीयमानान् । श्रुणोति भक्तद्याथमतिं ददाति विकल्मषः सोपि दिवं प्रयाति ॥९९॥ दुः स्वप्रप्रशममुपैति पठ्यमानैः शैलेद्रै भवभयभेदनै मनुष्य: । यः कुर्यात्किमु नृपपुंगवेहसम्यक् शांतात्मा सकलगिरीद्रसंप्रदानम् ॥२०॥ भीष्म उवाच किमभीष्टवियोगशोकसंघा नलमुद्धर्तुमुपोषणं व्रतं वा । विभवधुवकारिभूतलेस्मिन् भवभीतेरपि सूदनं च पुंसः ॥२९॥ पुलस्त्य उवाच परिपृष्टमिदं जगत्तप्रियं ते विबुधानामापि दुर्लभं महत्त्वात् । तव भक्तिमतस्तथापि वक्ष्ये व्रतमिंद्रासुरमानवेषु गुह्यम् ॥२२॥ पुण्यमाश्चयुजे मासि विशेकद्वादशीव्रतम् । दशम्यां लघुभुग्विद्दान्प्राःभेत यमेन तु॥२३॥ उदङ्मुखः प्राङमुखो वा दंतधानवपूर्वकम् । एकादश्यां निराहारः सम्यगभ्यर्च्य केशवम् ॥२४॥ श्रियं चाभ्यर्च्य विधिवद्धोक्ष्येऽहं चापरेहनि । एवं नियमकृत्सुप्त्वा प्रातरुत्थाय मानवः ॥२५॥ स्नानं सर्वौषधैः कुर्यात्पंचगव्यजलेन तु । शुश्रमाल्यांबरधरः पूजयेच्छीशमुत्पलैः॥२६॥ विशोकाय नमः पादौ जंघे च वरदाय वै। श्रीशाय जानुनी तद्ददूरू च जलशायिने॥२७॥ महर्षि वसिष्ठ की वाणी का समादर करके धान्य आदि के विविध पर्वतों को बनावाकर उन सबों का दान किया और अन्त में भगवान् शिव के लोक में देवताओं से पूजित होते हुए चला गया ॥१८॥ जो भी मनुष्य इस प्रसङ्ग में वर्णित दानों का दर्शन तथा स्पर्श करता है, अथवा इस प्रसङ्ग का श्रवण तथा मनन करता है वह भी स्वर्गलोक में जाता है। जो मनुष्य इन श्रेष्ठ तथा संसार के भय को विनष्ट करने वाले पर्वतों का पाठ करता है उसके दुःस्वप्न शान्त हो जाते हैं । हे राजश्रेष्ठ ! जो मनुष्य इस लोक में इन समस्त पर्वतों को तैयार करके दान करता है, उसके विषय में क्या कहना है 2॥२०॥ भीष्मजी ने कहा-- ऐसा कौन सा उपवास अथवा ब्रत है जो प्रिय व्यक्ति के वियोगजन्य शोक में उत्पन्न अग्नि को शान्त करने में समर्थ है ? इस भूलोक में ऐश्वर्य को स्थिर करने वाला तथा संसार के भय को विनष्ट करने वाला कौन सा व्रत अथवा उपवास है 2॥२१॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- तुमने संसार का कल्याण करने वाले, देवताओं के लिए भी दुर्लभ महत्त्वशील मनुष्यों तथा असुरों के लिए भी गोपनीय ब्रत के विषय में पूछा है । अतएव भक्ति सम्पन्न तुमको मैं सर्वश्रेष्ठ ब्रत बतलाता हूँ ॥२२॥ पवित्र कार्तिक के महीने में विशोक द्वादशी व्रत होता हे । व्रती को चाहिए कि दशमी के दिन थोड़ा सा भोजन करके इस ब्रत को प्रारम्भ करे ।।२३॥ इन्द्रियों को वह अपने वश में रखे । वह उत्तर की ओर अथवा पूर्व की ओर मुख करके मुँह धोये । एकादशी के दिन अच्छी तरह से भगवान् केशव की पूजा करके निराहार रहे ॥२४॥ दूसरे दिन मैं लक्ष्मीजी की पूजा करके भोजन करूंगा, इस तरह से सङ्कल्प करके रात्रि में सोये, पुनः प्रात: काल जगकर मनुष्य को चाहिए कि वह ॥२५॥ सर्वोर्षिध से पञ्चगव्य तथा जल से स्नान करे । फिर श्वेत वस्त्र धारण करके श्रीभगवान् की कमल से पूजा करे ॥२६॥ श्रीभगवान् के पूजा का क्रम इस प्रकार है- विशोकाय नमः पादौ पूजयामि इस मन्त्र से श्रीभगवान् के दोनों चरणों की पूजा करे, बरदाय नमः जङ्घे पूजयामि इस मन्त्र से श्रीभगवान् के दोनों जंड्लों की पूजा करे । श्रीशाय नमः जानुनी पूजयामि इस मन्त्र से दोनों घुटनों की पूजा करे जलशायिने नमः ऊरू पूजयामि इस मंत्र से दोनों ऊरूयों की पूजा
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