Srishti Khanda Extracted Page 326
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-326
Sanskrit Original
दशनारीसहस्त्राणां मध्ये श्रीरिवराजते । नृपकोटिसहस्रेण न कदाचित्समुच्यते ॥५॥ कदाचिदास्थानगतः पप्रच्छ स्वपुरोहितम् । विस्मयेनावृत्तो नत्वा वसिष्ठमृषिसत्तमम् ॥६॥ भगवन्केन धर्मेण मम लक्ष्मीरनुत्तमा। कस्माच्च विपुलं तेजो मच्छरीरे सदोत्तमम् ॥७॥ वसिष्ठ उवाच पुरा लीलावती नाम वेश्या शिवपरायणा । तया तरत्तश्चतुर्दश्यां पुष्करे लवणाचलः ॥८॥ हेमवृक्षामरैः सार्द्ध यथावद्विधिपूर्वकम्। शूद्रः सुवर्णकारश्च कर्मकृत्सोऽभवत्तदा ॥९॥ भृत्यो लीलावतीगेहे तेन हैमा विनिर्मिता: । तरवो हेमपुष्पाश्च श्रद्धायुक्तेन पार्थिव ॥१०॥ अतिरूपेण संपन्ना घटितास्ते सुशोभनाः । धर्मकार्यमिति ज्ञात्वा नगृहीतं च वेतनम् ॥९९॥ उज्ज्वालिताश्च ते पत्त्या सुबर्णमयपादपा:। लीलावती गृहे चापि परिचर्या च पार्थिव ॥१२॥ कृता ताभ्यामशाठ्येन द्विजशुश्रूषणादिका । सा च लीलावती वेश्या कालेन महतानघ ॥१३॥ सर्वपापविनिर्मुक्ता जगाम शिवमंदिरम्। योसौ सुवर्णकारश्च दरिद्रोप्यतिसत्त्ववान् ॥१४॥ नमूल्यमादाद्वेश्यातः सभवानिह सांप्रतम् । सप्तद्वीपपतिर्जातः सूर्यायुतसमप्रभः ॥१५॥ यया सुवर्णकारस्य तरवो हेमनिर्मिताः । सम्यगुज्ज्वलिताः पत्न्या सेयं भानुमती तव ॥१६॥ तस्माञ्चलोकेष्वपराजितस्त्व मारोग्यसौभाग्ययुता च लक्ष्मीः । तस्मात्त्वमप्यत्र विधानपूर्वंधान्याचला दीन्नूपते कुरुष्व ॥९७॥ पुलस्त्य उवाच तथेति संपूज्य सुधर्ममूर्ति ् वचो वसिष्ठस्य ददौ च सर्वान् । धान्याचलादीन् विधिना स्मरारे लोकं गतोसौ सुरपूज्यमानः ॥१८॥ हजार राजा उसको कभी नही त्यागे ॥५॥ एकबार सभा में जाकर राजा ने आश्चर्य चकित होकर ऋषिश्रेष्ठ वसिष्ठ से पूछा ॥६॥ हे भगवन् ! किस धर्म के कारण मुझे सर्वश्रेष्ठ लक्ष्मी की प्राप्ति हुयी है किस कारण से मेरे शरीर में विपुल मात्रा में तेज बना रहता है ॥७॥ वसिष्ठ महर्षि ने कहा-- प्राचीनकाल में. लीलावती नाम की शिवजी की मक्ता वेश्या थी । उसने पुष्कर क्षेत्र में चतुर्दशी तिथि को नमक का पर्वत बनाकर तथा देवताओं के सुवर्ण के वृक्षों को विधि पूर्वक बनवाकर दान किया । उस वेश्या के घर में शूद्र नमक एक सुनार नौकर था उसी ने उन सुवर्ण वृक्षों को बनाया था । हे राजन् ! उसने उन वृक्षं में श्रद्धा पूर्वक सुवर्ण पुष्पों को बनाया था ॥१०॥ वे देववृक्ष देखने में अत्यन्त सुन्दर लगते थे । उस सुनार ने धर्म का श्रम समझकर उन वृक्षों के निर्माण की मजदूरी नहीं ली ॥११॥ उस नमक के पर्वत पर जो सुवर्ण के वृक्ष बनाये गये थे, उन सबों को सुनार की पत्नी ने तपाकर देदीप्यमान बनाया था । वे दोनों लीलावती के घर में नौकर थे । वे बिना किसी कपट के ब्राह्मणों की सेवा करते थे हे अनघ ! बहुत दिन बीत जाने पर वह लीलावती ॥१२-१३॥ सभी पापों से मुक्त होकर शिवलोक में चली गयी । वह सुवर्णकार भी अत्यन्त दरिद्र होकर भी अत्यन्त धार्मिक था ॥१४॥ उसने उस वेश्या से उन वृक्षों को बनाने का मूल्य नहीं लिया वे ही आज आप सातो द्वीपों के स्वामी तथा दशों हजार सूर्य के समान तेजस्वी राजा हुए हें ॥१५। और वह जोसुनार की पत्नी थी जिसने उन सुवर्ण के वृक्षों को तपाकर चमकाया था वही आपकी पत्नी भानुमती है ॥१६॥ इसीलिए तुम मर्त्यलोक में अपराजित तथा निरोग तथा तुम्हारी अचला लक्ष्मी सौभाग्य सम्पन्न है । इसीलिए हे राजन् ! तुम भी विधिपूर्वक अन्नों के पर्वतों का निर्माण कराओ ।।१७॥। पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- राजा धर्ममूर्ति ने भी
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