Srishti Khanda Extracted Page 325

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-325

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Sanskrit Original

:७० श्रीपद्ममहापुराण दिवाकर नमस्तेस्तु प्रभाकरनमोस्तु ते । एवं सूर्य नमस्कृत्य त्रिः कृत्वा च प्रदक्षिणम् ॥१७०॥ द्विजं गां कांचनं चैव दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा गृहं ब्रजेत् । स्वगेहस्थां ततः पुण्यां प्रतिमां चापि पूजयेत् ॥१७९॥ भोजनं च ततः पश्चादद्विजपूर्व च कारयेत्। अनेन विधिना सर्वऋषय: सिद्धिमागताः ॥१७२॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे स्नानविधिर्नाम विंशोऽध्यायः ॥२०॥ Ae इक्कीसवाँ अध्याय पुलस्य उवाच आसीत्पुरा बृहत्कल्पे धर्ममूर्तिर्जनाधिपः । सुहच्छक्रस्य निहता येन दैत्यास्सहस्रशः॥१॥ सोमसूर्यादयो यस्य तेजसा विगतप्रभाः। भवंति शतशो येन दानवाश्च पराजिताः ॥२॥ यथेच्छरूपधारी च मानुषोप्यपराजितः । तस्य भानुमती भार्या सती त्रैलोक्य सुंदरी॥३॥ लक्ष्मीसदूशरूपेण निर्जितामरसुंदरी । राज्ञस्तस्याग्रमहिषी प्राणेभ्योपि गरीयसी ॥४॥ अर्थात् हे भगवन् सूर्य ! आप विश्वरूप है, और ब्रह्म स्वरूप हैं । आपके इन दोनों रूपों को नमस्कार है । आप सहस्रों किरणों से सुशोभित और सबों के तेजोरूप हैं आपको सदा नमस्कार है । रुद्र रूप धारण करने वाले आप परमेश्वर को बारम्बार नमस्कार है । कुण्डल तथा अङ्गद आदि आभूषणों से विभूषित पद्मनाथ आपको नमस्कार है । हे भगवन् ! आप संसार के समस्त सोए हुए लोगों को जगाते हैं । आपको मैं नमस्कार करता हूँ । आप सदा सबों के पुण्यों तथा पापों को देखते हैं । हे सत्यदेव आपको नमस्कार है । हे भास्कर आप प्रसन्न हो जाइये । दिवाकर आपको नमस्कार है । प्रभाकर ! आपको नमस्कार है । इस तरह से सूर्य को नमस्कार करके उनकी तीन बार प्रदक्षिणा करे ॥१६८-१७०॥ इसके बाद ब्राह्मण, गौ तथा सुवर्ण का दर्शन तथा स्पर्श करके अपने घर जाय । उसके बाद अपने घर में विद्यमान पवित्र मूर्ति का पूजन करे ॥१७१॥ फिर पहले ब्राह्मणों को भोजन कराकर बाद में स्वयं भोजन करे । इसीतरह से सभी ऋषि सिद्धि को प्राप्त किए ।।१७२॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के स्नानविधि वर्णन नामक बीसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। २०।। ऋ धर्ममूर्तिराज का वर्णन, धान्यपर्वत आदि की दान विधि, विशोक द्वादशी व्रत, गुड आदि से निर्मित दश प्रकार के गायों के दान का वर्णन, धान्य आदि दश प्रकार के पर्वतों का वर्णन तथा सौर धर्म वर्णन महर्षि पुलस्त्य ने कहा-- प्राचीन बृहत् कल्प में धर्ममूर्ति नाम के एक राजा थे वे इन्द्र के मित्र थे । उन्होने हजारों दैत्यों को मारा था ॥१॥ उस राजा के तेज के सामने सूर्य एवं चन्द्रमा की कान्ति फीकी प्रतीत होती थी । उन्होंने सैकड़ो दैत्यों को पराजित किया था ॥२॥ वे अपनी इच्छा के अनुसार अपना रूप बना लेते थे तथा मनुष्य होने पर भी वे किसी से पराजित नहीं हुए । उनकी भानुमती नाम की पत्नी त्रैलोक्य सुन्दरी थी ॥३॥ लक्ष्मी के समान अपने रूप के कारण उसने देवताओं की सुन्दरियों को रूप के विषय में जीत लिया था । वह राजा की पटरानी थी तथा प्राणबल्लभा थी ॥४॥ राजा की दश हजार पत्नियों के बीच में वह श्रीदेवी के समान सुशोभित होती थी । करोड़ों

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