Srishti Khanda Extracted Page 324
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-324
Sanskrit Original
क्रूरास्सर्पा: सुपर्णाश्च तरवो जंभकादयः । विद्याधरा जलधरास्तथैवाकाशगामिनः ॥१५७॥ निराधाराश्च ये जीवा पापधर्मरताश्च ये। तेषामाप्यायनायैतह्णीयते सलिलं मया ॥१५८॥ कृतोपवीतो देवेभ्यो निवीती च भवेत्ततः । मनुष्यांस्तर्पयेद्भक्तया ऋषिपुत्रानृषींस्तथा॥१५९॥ सनकश्च सनंदश्च तृतीयश्च सनातनः। कपिलश्चासुरिश्चैव वोढुः पंचशिखस्तथा॥१६०॥ सर्वे तेतृप्तिमायांतु महत्तेनांबना सदा। मरीचिमत्र्यंगिरसौ पुलस्त्यं पुलह क्रतुम्॥१६९॥ प्रचेतसं वसिष्ठ च भृगुं नारदमेवच । देवब्रह्मऋषीन्सर्वास्तर्पयेत्साक्षतोदकैः ॥१६२॥ अपसव्यं ततः कृत्वा सव्यं जानु च भूतले । अग्निषवात्तांस्तथा सौम्यान्हविष्मतस्तथोष्मपान् ॥१६३॥ सुकालिनो बर्हिषदस्तथा चैवाज्यपान्पुनः । संतर्पयेत्पितृन्भक्त्या सतिलोदकचंदनै: ॥ १६ ४॥ सदर्भपाणि विधिना पितृंन्स्वांस्तर्पयेतत्तः । पित्रादीन्नामगोत्रेण तथा मातामहानपि ॥१६५॥ संतप्य विधिवद्धक्तया इमं मंत्रमुदीरयेत् । ये बांधवाबांधवा ये येन्यजन्मनि बांधवाः ॥१६६॥ ते तृप्तिमखिला यांतु येप्यस्मत्तोयकांक्षिणः । आचम्य विधिना सम्यगालिखेत्पद्ममग्रत: ॥१६७॥ साक्षताद्धिस्सपुष्पाभिः सतिलारुणचंदनैः । अर्घ्य॑ दद्यात्प्रयत्मेन सूर्यनामानुकीर्तनैः ॥१६८॥ नमस्ते विश्वरूपाय नमस्ते विष्णुरूपिणे । सर्वदेवनमस्तेस्तु प्रसीद मम भास्कर ॥१६९॥ क्रूरसर्पो, सुपर्ण, वृक्ष, जम्भ आदि असुर, विद्याधर, मेघ, (जलधर) आकाशचारी जीव ॥१५७॥ निराधारजीव, पापी जीव तथा धर्मपरायण जीवों की तृप्ति के लिए मैं जल दान करता हूँ ॥१५८॥ इन देवताओं का तर्पण सव्य रहकर ही करना चाहिए, इसके बाद भक्ति पूर्वक निवीती होकर (यज्ञोपवीत को माला की तरह करके) मनुष्यों, ऋषियों तथा ऋषिपुत्रों का तर्पण करे ॥१५९॥ सनक, सनन्दन, सनातन, कपिल, आसुरि, बोढु तथा पंचशिख ॥१६०॥ ये सभी मेरे द्वारा प्रदत जल से तृप्त हो जायँ । मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह क्रतु ॥१६१॥ प्रचेता, वसिष्ठ और नारद इन देवताओं तथा ब्रह्मर्षियों का तर्पण अक्षत तथा जल से करना चाहिए ॥१६२॥ उसके बाद अपसव्य होकर तथा वायाँ घुटना पृथिवी पर करके बैठे । उसके बाद अग्निष्वाता, सौम्य, हविष्मान्, उष्मप ॥१६३॥ सुकाली, वर्हिषद् तथा आज्यप नामक पितरों का तिल से तथा चन्दन से तर्पण करे ॥१६४॥ उसके बाद' हाथ में कुश लेकर विधिपूर्वक अपने पितरों का तर्पण करना चाहिए । पिता आदि तथा मातामह आदि पितरों के नाम तथा गोत्र का उच्चारण करके तर्पण करना चाहिए ।।१६५॥ विधिपूर्वक तर्पण करके इस मंत्र का उच्चारण करे ये बांधवाबांधवा ये येन्यजन्मनि बांधवाः । ते तृप्तिमखिला यांतु येप्यस्मत्तोयकांक्षिणः।। अर्थात् जो लोग मेरे बन्धव न हो, जो लोग मेरे बन्धव हों, जो लोग किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहें हों, वे सब मेरे दिये हुए जल से तृप्त हों । उनके अतिरिक्त यदि कोई दूसरा भी जीव मुझसे जल की अभिलाषा रखता हो तो वह भी तृप्त हो जाय । उसके बाद आचमन करके अपने सामने कमल का चिह्न बनाये ॥१६७॥ उसके बाद अक्षत, पृष्प, तिल, लालचन्दन मिलाकर सूर्यनारायण को अर्ध्य प्रदान करे । उस समय सूर्य के नामों का उच्चारण करना चाहिए ॥१६८॥। सूर्यार्घ्य देने का मन्त्र हैं-- नमस्ते विश्वरूपाय नमस्ते ब्रह्मरूपिणे । सहस्ररश्मये नित्यं नमस्ते सर्वतेजसे। । नमस्ते ू द्रवपुषे नमस्ते भक्तवत्सल । पड़नाभ नमस्तेऽस्तु कुण्डलाङ्गद भूषित ।। नमस्ते सर्वलोकेषु सुप्तांस्तान प्रतिबुध्यसे । सुकृतं दुष्कृतं चैव सर्वं पश्यसि सर्वदा ।। सत्यदेव नमस्तेऽस्तु प्रसीद मम भाष्कर। दिवाकर नमस्तेऽस्तु प्रभाकर नमोऽस्तु ते।।
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