Srishti Khanda Extracted Page 323
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-323
Sanskrit Original
नमो नारायणायेति मूलमंत्र उदाहतः । सदर्भपाणि विधिना आचांतः प्रयतः शुचिः ॥१४४॥ चतुर्हस्तसमायुक्तं चतुरस्रं समतंततः । प्रकल्प्यावाहयेद्गंगामेभि मंत्रे विचक्षणः॥१४५॥ विष्णोः पादप्रसूतासि वैष्णवी विष्णुदेवता । त्राहि नस्त्वेनसस्तस्मादाजन्ममरणांतिकात् ॥१४६॥ तिस्रः कोट्योर्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत्। दिवि भुव्यंतरिक्षे च तानि ते संति जाह्नवि ॥१४७॥ नंदिनीत्येव ते नाम देवेषु नलिनीति च। दक्षा पृथ्वी च सुभगा विश्वकाया शिवासिता॥१४८॥ विद्याधरी सुप्रसन्ना तथा लोकप्रसादिनी । क्षेमा च जाह्नवी चैव शांता शांतिप्रदायिनी ॥१४९॥ एतानि पुण्य नामानि स्नानकाले प्रकीर्तयेत् । भवेत्सन्निहिता तत्र गंगा त्रिपथगामिनी ॥१५०॥ सप्तवाराभिजप्तेन करसंपुटयोजितम् । मूर्घ्नि कुर्यज्जलं भूयस्त्रिचतुः पंचसप्तथा ॥१५९॥ स्नानं कुर्यान्मृदा तद्ददामंत्र्य तु विधानतः । अश्वक्रांते रथक्राते विष्णुक्रांते वसुंधरे ॥१५२॥ मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम् । उद्धतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना॥१५३॥ नमस्ते सर्वलोकानां प्रभवारणि सुव्रते । एवं स्नात्वा ततः पश्चादाचम्य तु विधानतः ॥१५४॥ उत्थाय वाससी शश्रे शुद्धे तु परिधाय वै। ततस्तु तर्पणं कुर्यत्रैलोक्याप्यायनाय वै॥१५५॥ ब्रह्माणं तर्पयेत्पूर्वं विष्णुं रुद्रं प्रजापतीन्। देवा यक्षास्तथा नागा गंधर्वाप्सरसांगणाः ॥१५६॥ मन्त्रज्ञ व्यक्ति मूल मन्त्र के द्वारा उसको तीर्थ (पवित्र) बना ले ॥१४३॥ ओम नमो नारायणाय इसी को मूलमन्त्र कहा गया है फिर हाथ में कुश लेकर विधिपूर्वक आचमन करके पवित्र हो जाय ।। १४४] उसके बाद चार हाथ के चतुरस्र की कल्पना करे और विचक्षण पुरुष उसमें इन मन्त्रों से गङ्ाजी का आवाहन करे ॥१४५॥ हे गङ्गे देवि ! आप भगवान् विष्णु के पैर से उत्पन्न हुयी हैं अतएव वैष्णवी है । भगवान् विष्णु ही आपके देवता हैं । अतएव आप मेरे जन्म से लेकर मरण पर्यन्त के पापों से मेरी रक्षा करें ॥१४६॥ वायु देवता ने कहा है कि द्युलोक, भूलोक तथा अन्तरिक्ष लोक में साढे तीन करोड़ जो तीर्थ हैं, वे सभी हे जाहृवि देवि ! आप में ही निवास करते हैं ॥१४७॥ आपका देवलोक में नाम नन्दिनी और नलिनी विख्यात है । उनके अतिरिक्त दक्षा, पृथ्वी, सुभगा, विश्वकाया, शिवा, असिता, विद्याधरी, सुप्रसन्ना, लोकप्रसादिनी, क्षेमा, शान्ता तथा शान्ति प्रदायिनी आपके नाम है ॥१४८-१४९॥ इन पवित्र नामों का स्नान काल में स्मरण करना चाहिए । ऐसा करने से वहाँ पर त्रिपथगामिनी गङ्गाजी का सन्निधान हो जाता है ॥१५०॥ इन मन्त्रों को हाथ जोड़कर सात बार जपे, फिर उसे तीन चार पाँच या सात बार अपने शिर पर चढाये ।।१५१।। उसी तरह से विधिपूर्वक अभिमन्त्रित करके मृतिका से भी स्नान करना चाहिए । मृतिका को अभिमन्त्रित करने का मन्त्र है-- अश्चक्रांते रथक्रांते विष्णुक्रांते वसुंधरे । मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुःष्कृतं कृतम् ।। उद्धतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।नमस्ते सर्वलोकानां प्रभवारणि सुव्रते ।। अर्थात् हे वसुन्धरे ! तुम्हारे ऊपर अश्व तथा रथ चलते है भगवान् वामन ने भी तुमको एक पग से नापा था । हे मृतिके ! मैंने जिन बुरे कर्मों को किया है, उनसे उत्पन्न पापों को तुम हर लो । हे देवि ! सैकड़ो भुजाओं वाले भगवान् विष्णु ने वाराह का रूप धारण करके तुम्हारा उद्धार किया था ॥१५२-१५३॥ हे सुव्रते ! समस्त लोकों को उत्पन्न करने के लिए तुम अरणि के समान हो । तुम्हे नमस्कार है । इसतरह से स्नान करके विधिपूर्वक आचमन करे।। १५४।। उसके बाद उठकर दो सुन्दर तथा शुद्ध वस््रों को धारण करे । उसके बाद त्रैलोक्य की पुष्टि के लिए तर्पण करना चाहिए ॥१५५॥ क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, प्रजापति, देव, यक्ष, नाग, गन्धर्व, अप्सराओं ॥१५६॥
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