Srishti Khanda Extracted Page 322
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-322
Sanskrit Original
वैश्वानरपद॑ याति शिखिब्रतमिदं स्मृतम् । हैमं पलद्रयादृर्ध्वं रथमश्वयुगान्वितम्॥१३९॥ दद्यात्कृतोपवासः स दिविकल्पशतं वसेत् । तदंते राजराजस्स्यादश्चव्रतमिदं स्मृतम् ॥१३२॥ तद्ृद्धेमरथं दद्यात्करिभ्यां संयुतं पुनः । सत्यलोकेवसेत्कल्पं सहस्रमपि भूमिपः ॥१३३॥ भ्रवेदिहागतो भूम्यां करिव्रतमिदं स्मृतम् । दशम्यामेकभक्ताशी समाप्ते दश धेनुदः ॥१३४॥ दीपं च कांचनं दद्याद्वह्माण्डाधिपति भवेत् । एतद्विश्चब्रतं नाम महापातकनाशनम् ॥१३५॥ कऱ्यादानं तु कार्तिक्यां पुष्करे यः करिष्यति । एकविंशहुणोपेतो ब्रह्ालोकं गमिष्यति ॥१३६॥ कन्यादानात्परं दानं नैव चास्त्यधिकं क्वचित् । पुष्करे तु विशेषेण कार्तिक्यां तु विशेषतः ॥९३७॥ विप्राय विधिवद्देयं तेषां लोकोऽ क्षयो भवेत् । तिलपिष्टमयं कृत्वा गजं रत्मसमन्वितम्॥१३८॥ | विष्राय ये प्रयच्छति जलमध्ये स्थिता नराः। तेषां चैवाक्षयो लोको भविता भूतसंपल्वम् ॥१३९॥ यः पठेच्छणुयाद्वापि व्रतषष्ठिमनुत्तमाम् । मन्वंतरशतं सोपि गंधर्वाधिपति भवेत् ॥१४०॥ षष्ठिव्रतं भारत पुण्यमेत त्तवोदितं विश्वजनीनमद्य। श्रोतुं यदीच्छा तव राजराज भृणुद्विजातेः करणीयमेतत् ॥१४९॥ नैर्मल्यं भावशुद्धश्च विनास्नानं न विद्यते । तस्मान्मनोविशुद्भ्यर्थं स्नानमादौ विधीयते ॥१४२॥ अनुद्धतैरुद्धतैर्वा जलैः स्नानं समाचरेत् । तीर्थ प्रकल्पयेद्विद्वान् मूलमंत्रेण मंत्रवित् ॥९४३॥ राजेन्द्र ! जो वस्त्र से ढंककर दक्षिणा सहित कांस्यपात्र दान देता है तथा व्रत की समाप्ति पर गोदान करता है, वह शिवलोक में जाता है ॥१२९॥ कल्प की समाप्ति होने पर वह राजाओं का भी राजा होता है । इस व्रत को सोमत्रत कहते हैं । जो प्रतिपत् तिथियों को एक अन्न खाता है और व्रत के समाप्त होने पर जो फलों का दान करता है॥१३०॥ वह वैश्वानर लोक में जाता है । इस व्रत को शिखी (अग्नि) व्रत कहते है । जो उपवास करके दो पल से अधिक सुवर्ण का घोड़ों से युक्त रथ बनवाकर दान करता है वह स्वर्गलोक में सौ कल्पों से भी अधिक समय तक निवास करता है । उसके बाद वह राजराज होता है । इस ब्रत को अश्चत्रत कहते है ॥१३१-१३२।। उसी तरह का | रथ यदि दो हाथियों के साथ उपवास करने वाला व्यक्ति ब्राह्मण को दान देता है । वह हजार कल्पों तक ब्रह्माजी के लोक में निवास करे ॥१३३॥ इसके बाद वह पृथिवी का राजा होता है । इस व्रत को करित कहते हैं । जो दशमी तिथि को एक ही अन्न खाता है और एक वर्ष के अन्त में दश गायों का दान करता है ॥१३४॥ तथा सुवर्ण का दीप दान करता है तो वह ब्रह्माडाधिपति होता है । यह महान पापों को विनष्ट करने वाला विश्वत्रत है ॥१३५॥ जो व्यक्तिपुष्कर तीर्थ में कन्यादान करेगा वह इक्कीस गुणों से युक्त होकर ब्रह्मलोक में जायेगा ॥१३६॥ कन्यादान से बड़ा दान कहीं भी कोई भी नहीं है, खासकर पुष्करतीर्थ में उसमें भी कार्तिक पूर्णिमा को कन्यादान करने का बड़ा ही महत्त्व है ।।१३७॥। ब्राह्मण को जो सविधि कन्यादान करता है, उसको अक्षय लोक की प्राप्ति होती है जो लोग तिल की पीठी के बने हुए हाथी के भीतर रत्न भरकर ब्राह्मण को जल में खड़ा होकर दान देते है उन लोगों को भी । प्रलयकाल पर्यन्त अक्षय लोकों की प्राप्ति होती है ॥१३९॥। जो व्यक्ति इस व्रतषष्ठि (साठ व्रतो) के उत्तम प्रसङ्ग को पढता अथवा सुनता है वह भी सौ मन्वन्तरों तक गन्धर्वो का स्वामी होता है ॥१४०॥ हे भारत ! मैंने यहविश्वविख्यात उत्तम षष्ठि व्रत आपको सुनाया यदि तुम्हारी सुनने की इच्छा हो तो ब्राह्मणों के कर्मों का श्रवण करो॥१४१॥ चूकि स्नान किए बिना निर्मलता तथा भावों की शुद्धि नहीं होती है, अतएव मन की विशुद्धि के लिए सर्वप्रथम स्नान करना चाहिए ।।१४२।। जल चाहे निकाले गये हों या नहीं निकाले गये हों उससे स्नान करना चाहिए। th,
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