Srishti Khanda Extracted Page 321

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-321

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Sanskrit Original

श्रीपद्यमहापुराण चतुर्दश्यां तुनक्ताशी समान्ते गोयुगप्रदः । शैवं पदमवाप्नोति त्रैयंबकमिदं स्मृतम्॥९१८॥ सप्तरात्रोषितो दद्याद्घृतकुंभं द्विजातये । वर्रतमिदं प्राहु ब्रहलोकफलप्रदम् ॥११९॥ असौ काशीं समासाद्य धेनुं दत्ते पयस्विनीम् । शक्रलोके वसेत्कल्पमिदं मंत्रव्रतं स्मृतम् ॥१२०॥ मुखवासं परित्यज्य समांते गोप्रदो भवेत् । वारुणं लोकमाप्रोति वारुणब्रतमुच्यते ॥९२९॥ चांद्रायणं च यः कुर्याद्धैमं चंद्रं निवेदयेत् । चंद्रब्रतमिदं प्रोक्तं चंद्रलोकफलप्रदम् ॥९२२॥ ज्येष्ठे पंचतपायोंते हेमधेनुप्रदो दिवम् । यात्यष्टमीचतुर्दश्यो रुद्रब्रतमिदं स्मृतम् ॥१२३॥ सकृद्विधानकं कुर्यात्तृतीयायां शिवालये। समाप्ते धेनुदो याति भवानीव्रतमुच्यते॥१२४॥ माघे निश्यार्द्रवासा: स्यात्सप्तम्यां गोप्रदो भवेत् । दिवि कल्पंवसित्वेह राजा स्यात्पवनव्रतम्॥१२५॥ त्रिरात्रोपोषितोदद्यात्फाल्गुन्यां भवनं शुभम् । आदित्यलोकमाप्रोति धामव्रतमिदं स्मृतम्॥९२६॥ त्रिसंध्यं पूज्य दांपत्यमुपवासी विभूषणैः । ददन्मोक्षमवाप्रोति मोक्षव्रतमिदं स्मृतम्॥१२७॥ दत्त्वा सितद्वितीयायामिंदौ लवणभाजनम् । समाप्ते गोप्रदो याति विप्राय शिवमंदिरम् ॥१२८॥ कांस्यं स वस्त्रं राजेन्द्र दक्षिणासहितं तथा । समाप्ते गां च यो दद्यात्सयाति शिवमंदिरम् ॥१२९॥ कल्पांते राजराजस्स्यात्सोम्रतमिदं स्मृतम् ।प्रतिपत्स्वेक भक्ताशी समाप्ते च फलप्रदः ॥१३०॥ गौओं का दान करता है ॥११५॥ वह सूर्य लोक में जाता है । इस ब्रत को सौर व्रत्त कहते हैं । जो पुरुष बारह द्वादशियों तक उपवास करता है । व्रत को समाप्त करके हे राजन् ॥११६॥ ब्राह्मणों की पूजा गौ, वस्र तथा सुवर्ण के द्वारा अपनी शक्ति के अनुसार करता है, वह परंपद को प्राप्त करता है, इसे विष्णुव्रत कहते हैं ॥११७॥ जो व्यक्ति एक वर्ष तक चतुर्दशी तिथि को केवल रात्रि में ही भोजन करता है । वर्ष के अन्त में दो गौओं का दान करता है । वह शिव पद को प्राप्त करता है, इसे त्रैयम्बक व्रत कहते हैं ॥११८॥ जो चार रात्रियों तक उवास करके ब्रत की समाप्ति पर ब्राह्मण को घी भरा घड़ा दान देता है । वह ब्रह्मलोक में जाता है इसे वार व्रत कहते हैं ॥ ११९॥ जो पुरुष काशी में जाकर दूध देने वाली गौ को दान देता है वह एक कल्प तक इन्द्र के लोक में निवास करता है, इस व्रत को मन्त्र व्रत कहते हैं ॥१२०॥ जो एक वर्ष तक मुखवास नहीं लेता है और वर्ष के अन्त में गोदान करता है । वह वरुण के लोक में जाता है । इस व्रत को वारुणव्रत कहते हैं ॥१२१॥ चान्द्रायण व्रत करने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह ब्रत के अन्त में सुवर्ण निर्मित चन्द्रमा का दान करे । ऐसा करने वाला चन्द्र लोक में जाता है । इस ब्रत को चन्द्रब्रत कहते हैं ॥१२२॥ जो ज्येष्ठ के महीने में पञ्चाग्नि तापता है । ब्रत के अन्त में अष्टमी या चतुर्दशी को सुवर्ण की गौ का दान कदता है, वह द्युलोक में जाता है इसे रुद्रब्रत कहते है ॥१२३॥ जो पुरुष प्रत्येक मास की तृतीया तिथि को शिव मन्दिर में जाकर एक बार हाथ जोड़ता है और वर्ष के अन्त में व्रत की समाप्ति होने पर गोदान करता है वह देवीं के लोक में जाता है, इसे भवानी ब्रत कहते हैं ॥१२४॥ जो पुरुष माघ मास में रात को गीला वस्त्र पहनता है तथा सप्तमी तिथि को गोदान करता है, वह एक कल्प तक द्युलोक में निवास करके अन्त मे राजा होता है, इसे पवनब्रत कहते है ॥१२५। जो व्यक्ति तीन रात तक उपवास करके फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को सुन्दर भवन का दान देता है, वह आदित्य लोक में जाता है, इसे धामत्रत कहते हैं ॥१२६॥ जो व्यक्ति शाम तक उपवास रहकर आभूषणों से ब्राह्मण दम्पती की पूजा कर आभषूण उनको प्रदान कर देता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है । इसे मोक्ष ब्रत कहा गया है ॥१२७॥ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को लवण (नामक) पात्र का जो दान करता है तथा ब्रत की समाप्ति होने पर ब्राह्मण को दान देता है वह शिवजी के लोक में जाता है ॥१२८॥ हे

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