Srishti Khanda Extracted Page 320

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-320

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Sanskrit Original

माघे मास्यथ चैत्रे वा गुडधेनुप्रदो भवेत्। गुडब्रतं तृतीयायां गौरीलोके महीयते ॥१०४॥ महाब्रतमिदं नाम परमानन्दकारकम् । पक्षोपवासी यो दद्याद्विप्राय कपिलाद्वयम् ॥१०५॥ स ब्रह्मलोकमाप्रोति देवासुर सुपूजितः। कल्पान्ते सर्वराजा स्यात्प्रभा व्रतमिदं स्मृतम् ॥१०६॥ वत्सरं त्वेकभक्ताशी सभक्ष्यजलकुंभदः । शिवलोके वसेत्कल्पं प्राप्तिब्रतमिदं स्मृतम् ॥१०७॥ नक्ताशी त्वष्टमीषु स्याद्दत्सरांते तु धेनुदः । पौरंदरं पुरं याति सुगतिव्रतमुच्यते ॥१०८॥ इंधनं यो ददेद्विप्रे वर्षादीश्चतुरस्त्वृतून् । घृतधेनुप्रदोते च स परंब्रह्म गच्छति ॥१०९॥ वैश्वानरव्रतं नामसर्वपापप्रणाशनम्। एकादश्यां तु नक्ताशी यश्चक्रं विनिवेदयेत् ॥११०॥ कृत्वा समांते सौवर्ण विष्णोः पदमवाप्नुयात् । एतत्कृष्णव्रतं नाम कल्पांते राज्यलाभकृत् ॥१११॥ पायसाशी समांते तु दद्याद्विप्राय गोयुगम् । लक्ष्मीलोके वसेत्कल्पमेतद्देवीव्रतं स्मृतम् ॥११२॥ सप्तम्यां नक्त भुग्दद्यात्समाप्ते गां पयस्विनीम् । सूर्यलोकमवाप्रोति भानुव्रतमिदं स्मृतम्॥१९३॥ चतुर्थ्या नक्तभुग्दद्याद्धेमंते गोयुगं तथा । एतद्वैनायकं नाम शिवलोकफलप्रदम् ॥११४॥ महाफलानि यस्त्यक्त्वा चातुर्मास्यं द्विजातये । हैमानि कार्तिके दद्याद्धोमान्ते गोयुतं तथा ॥११५॥ एतत्सौरब्रतं नाम सूर्यलोकफलप्रदम् । द्वादशद्वादशी यस्तु समाप्योपोषणे नृप ॥११६॥ गोवस्त्रकांचनै विप्रान्पूजयेच्छक्तितो नरः। परंपदमवाप्रोति विष्णुव्रतमिदं स्मृतम् ॥९९७॥ के अथवा चैत्र के महीने में जो पुरुष गुड़ की गौ का निर्माण करके उसे ब्राह्मण को तृतीया तिथि को दान देता है, वह गौरी लोक में पूजित होता है । इसे गुडव्रत कहते है ।।१०४।। अब मैं परम आनन्द देने वाले महाव्रत का वर्णन करता हुँ । जो पुरुष एक पक्ष तक उपवास करके त्रत के अन्त में दो कपिला गायों का दान ब्राह्मण को देता है॥१०५॥ वह ब्रह्मलोक में जाकर देवताओं तथा असुरों से पूजित होता है । कल्प के अन्त में वह पुरुष सबों का राजा होता है, इसे प्रभावव्रत कहते हैं ॥१०६॥ जो व्यक्ति एक वर्ष तक एक शाम ही भोजन करके रहता है तथा भक्ष्य भोज्य वस्तुओं तथा जल भरे घड़े का दान देता है, वह एक कल्प तक शिवलोक में निवास करता है । इसे प्राप्ति व्रत कहते है ॥१०७॥ जो पुरुष एक वर्ष तक अष्टमी तिथि को केवल रात्रि में भोजन करता है, दिन में भोजन नहीं करता है । वर्ष के अन्त में गौ का दान करता है, वह इन्द्र की नगरी में निवास करता है । इस व्रत को सुगति व्रत कहते है ॥१०८॥ जो पुरुष वर्षा ऋतु से प्रारम्भ करके चार ऋतुओं तक ब्राह्मण को इन्धन दान देता है, और व्रत के अन्त में घृत धेनु का दान करता है, वह पखंबह्य के लोक में जाता है ॥१०९॥ इसे सभी पापों को विनष्ट करने वाला वैश्वानर व्रत कहते हैं । जो एकादशी तिथि को रात्रि में ही भोजन करता है और वर्ष के अन्त में सुवर्ण का चक्र बनाकर ब्राह्मण को दान देता है वह भगवान् विष्णु के लोक में जाता है । इसे कृष्णब्रत कहते हैं । इसे करने वाला कल्प के अन्त में राज्य प्राप्त करता है ।॥११०-१११॥ जो एक वर्ष तक दुग्ध पीकर रहता है और वर्ष के अन्त में ब्राह्मण को दो गायों का दान करता है, वह एक कल्प तक लक्ष्मीजी के लोक में निवास करता है, इसे देवीव्रत कहते हैं ।।११२।। जो एक वर्ष तक सप्तमी तिथि को केवल रात्रि में भोजन करता है, व्रत की समाप्ति पर दृध देने वाली गौ का दान करता है, वह सूर्य लोक में जाता है । इसे सूर्यव्रत कहते हैं ॥११३॥ जो पुरुष एक वर्ष तक रात्रि में भोजन करता है, और ब्रत के अन्त में हेमन्त ऋतु में दो गायों का दान करता है, वह शिवलोक में जाता है । इस व्रत को वैनायक ब्रत कहते हैं ॥११४॥ जो पुरुष चैत्र मास भर बड़े-बड़े फलों का त्याग करता है, केवल खीर खाकर रहता है । व्रत के अन्त में होम करके ब्राह्मण को सुवर्ण निर्मित फल का दान देता है और दो

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