Srishti Khanda Extracted Page 318
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-318
Sanskrit Original
पंचामृतेन स्मपक कृत्वा संवत्सरं विभोः । वत्सरांते पुनर्दद्याद्धेने पंचामृतान्विताम् ॥७७॥ विप्राय दह्याच्छंखं च सपदं याति शांकरम् । राजा भवति कल्पांते धृतिब्रतमिदं स्मृतम् ॥७८॥ वर्जयित्वा पुमान्मांसं ब्रतांते गोप्रदो भवेत् । तद्दद्धेममृगं दद्यात्सोश्वेध फलं लभेत् ॥७९॥ अहिंसाब्रतमित्युक्तं कल्पांते भूपति भवेत् । कल्यमुत्थाय वै स्नानं कृत्वा दांपत्यमर्चयेत् ॥८ ०॥ भोजयित्वा यथाशक्ति माल्यवस्त्रविभूषणैः । सूर्यलोके वसेत्कल्पं सूर्यब्रतमिदं स्मृतम् ॥८ १॥ आषाढादिचतुर्मासं प्रातः स्त्रायी भवेन्नरः । विप्राय भोजनं दत्वा कार्तिक्यां गोप्रदो भवेत्॥८ २॥ स वैष्णवं पदं याति विष्णुव्रतमिदं स्मृतम् । अयनादयनंयावद्वयेत्पुष्पसर्पिषी ॥८३॥ तदंते पुष्पमन्नानि घृतधेन्वा सहैव तु। दत्वा शिवपदं याति विप्राय धृतपायसम् ॥८४॥ एतच्छीलब्रतं नाम शीलारोग्यफलप्रदम् । यावत्समं भवेद्यस्तु पंचदश्यां पयोव्रतः॥८५॥ समाते श्राद्धकृद्दद्याद्राक्च पंच पयस्विनी:। वासांसि च पिशंगानि जलकुंभयुतानि च ॥८६॥ स याति वैष्णवं लोकं पितृणां तारयेच्छतम् ॥८ ७॥ कल्यांते राजराजेंद्र: पितृत्रतमिदं स्मृतम्। संध्यादीपप्रदो यस्तु धतैस्तैलं विवर्जयेत् ॥८ ८॥ समांते दीपकं दद्याच्चक्रं शूलं च कांचनम्। वस्त्रयुग्मं च विप्राय स तेजस्वी भवेन्नर: ॥८ ९॥ रुद्रलोकमवाप्रोति दीप्तिव्रतमिदं स्मृतम् । कार्तिकादितृतीयायां प्राश्य गोमूत्रयावकम्॥९०॥ तथा मणि का दान देता है ॥७५॥ एवं तिल से भरा पात्र तथा सुवर्ण का दान करता है, वह ब्रह्माजी के लोक में सुशोभित होता है । कल्प के अन्त तक ऐश्वर्य प्रदान करने वाले इस व्रत को आनन्द व्रत कहते हैं ॥७६॥ जो व्यक्ति पङ्ञामृत से एक वर्ष तक शङ्करजी को स्नान कराकर वर्ष के अन्त में पञ्चामृत से युक्त (दूध देने वाली) गौ का दान करता है ॥७७॥ तथा ब्राह्मण को शंख प्रदान करता है, वह शङ्करजी के लोक में जाता है वह कल्प के अन्त में राजा होता है । इसको धृति व्रत कहते हैं ॥७८॥ जो व्यक्ति मांस का त्याग करके उसकी पूर्ति के लिए गोदान करता है तथा सुवर्ण निर्मित मृग का दान करता है वह अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त करता है ॥७९॥ इस ब्रत को अहिंसा व्रत कहते हैं । वह कल्प के अन्त में राजा होता है । वह प्रातःकाल जगकर स्नान करके विप्रदम्पती की पूजा करे ॥८०॥ फिर उनको भोजन कराकर अपनी शक्ति के अनुसार माला, वस्त्र तथा आभूषणों से अलंकृत करे । ऐसा करने वाला व्यक्ति एक कल्प तक मूर्यलोक में निवास करता है, इस व्रत को सूर्यव्रत कहते हैं ॥८१॥ आषाढ से चार मासों तक प्रातःकाल जगकर जो मनुष्य प्रातःकाल ही स्नान करे । पुन: ब्राह्मण को भोजन कराकर कार्तिक पूर्णिमा को ब्राह्मण को गौ दान करे ॥८२॥ ऐसा करने वाला व्यक्ति विष्णुलोक में जाता है इसे विष्णुब्रत कहते हैं । एक अयन से प्रारम्भ करके दूसरे अयन पर्यन्त फूल तथा घी की परित्याग करे ॥८३॥ व्रत के अन्त में पुष्प, अन्न, घी गौ तथा घी मिश्रित खीर इन सबों का दान करने वाला व्यक्ति शिवजी के लोक में जाता है ॥८४॥ इसे शीलब्रत कहते है, यह शील तथा आरोग्य प्रदान करता है । जो व्यक्ति पूरे वर्ष भर पूर्णिमा के दिन दूध पीकर रहता है ॥८ ५॥ वर्ष के अन्त में श्राद्ध करके दूध देने वाली पाँच गौओं का दान करता है । जल भरे घड़े के साथ पीले वस्रों का दान करता है ॥८६॥ वह सौ पीढ़ी के पितरों को तार देता है तथा स्वयं भगवान् विष्णु के लोक में जाता है ॥८७॥ कल्प के अन्त में राजाओं का भी राजा होता है, इसे पितृत्रत कहा गया है । जो व्यक्ति सायंकाल घी का दीपक भगवान् शङ्कर के मन्दिर में जलता है और स्वयं तेल का परित्याग कर देता है ॥८८॥ वर्ष के अन्त में दीपक सुवर्ण निर्मित दीपक चक्र और त्रिशूल का ब्राह्मण को दान देता है तथा दो वस्रों का भी दान देता है, वह मनुष्य तेजस्वी होता
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