Srishti Khanda Extracted Page 317
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-317
Sanskrit Original
एतत्सारस्वतं नाम रूपविद्याप्रदायकम् । लक्ष्मीमभ्यर्च्य पंचम्यामुपवासी भवेन्नरः ॥६३॥ समांते हेमकमलं दद्याद्धेनुसमन्वितम् । स वै विष्णुपदं याति लक्ष्मीः स्याज्जन्मजन्मनि॥६४॥ एतल्लक्ष्मीब्रतं नाम दुःखशोकविनाशनम्। कृत्वोपलेपनं शंभोरग्रतः केशवस्य च ॥६५। यावदब्दं पुनर्देयं धेनुर्जलघटस्तथा । जन्मायुतं स राजा स्यात्ततः शिवपुरं व्रजेत् ॥६६॥ एतदायुर्त्रतं नामसर्वकामप्रदायकम् । अश्वत्थं भास्करं गंङ्गां प्रणम्यैकाग्रमानसः ॥६७॥ एकभक्तं नरः कुर्यादब्दमेकं विमत्सरः । व्रतांते विप्रमिथुनं पूज्यं धेनुत्रयान्वितम्॥६८॥ वृक्षं हिरण्मयं दद्यात्सोश्वरमेधफलं लभेत् । एतत्कीर्तिव्रतं नाम भूतिकीर्ति फलप्रदम् ॥६९॥ घृतेन स्नपनं कृवा शंभोर्वा केशवस्य वा । अक्षताभिः सपुष्पाभिः कृत्वा गोमयमंडलम् ॥७०॥ समांते हेमकमलं तिलधेनुसमन्वितम् । शूलमष्टांगुलं दद्याच्छिवलोके महीयते ॥७१॥ सामगायनकं चैव सामव्रतमिहोच्यते। नवम्यामेकभक्तं तु कृत्वा कन्याश्चशक्तितः ॥७२॥ भोजयित्वा समं दद्याद्धेमकंचुकवाससी । हैमं सिंहं च विप्राय दद्याच्छिवपदं व्रजेत्॥७३॥ जन्मार्बुदं सुरूपः स्याच्छत्रुभिश्चापराजितः । एतद्वीरव्रतं नाम नराणां च सुखप्रदम् ॥७४॥ चैत्रादिचतुरोमासाञ्जलंदद्याहदयान्वितः । व्रतांतेमणिकं दद्यादन्नं वस्त्रसमन्वितम्॥७५॥ तिलपात्रं हिरण्यं च ब्रह्मलोके महीयते । कल्पांते भूतिजननमानंदब्रतमुच्यते ॥७६॥ वह सारस्वत लोक में जाता है । वहाँ से वह इस लोक में नहीं लोटता है ॥६१-६२।। इस व्रत का नाम सारस्वत व्रत है, यह रूप तथा विद्या को प्रदान करने वाला व्रत हे । पञ्चमी तिथि को लक्ष्मीजी की पूजा करके जो मनुष्य उस दिन उपवास करता है ॥६३॥ वर्ष के अन्त में वह गौ के साथ सुवर्ण का कमल ब्राह्मण को दान देता है, ऐसा करने वाला व्यक्ति भगवान् विष्णु के लोक में जाता है और वह प्रत्येक जन्म में लक्ष्मी को प्राप्त करता है ॥६४॥ इस ब्रत को लक्ष्मीब्रत कहते है । भगवान् शङ्कर अथवा भगवान् विष्णु के सामने गोबर से लिपे यह दुख तथा शोक को विनष्ट करने वाला ब्रत है ॥६५॥ इसतरह एक वर्ष करने के बाद गौ तथा जल भरे घड़े का दान करे । ऐसा करने वाला दश हजार जन्मों तक राजा होता है और अन्त में वह शिवलोक में चला जाता है ॥६६॥ इसको आयु ब्रत कहते हैं यह समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला व्रत होता है । एकाग्रमन से अश्वत्थ वृक्ष, सूर्य नारायण तथा गङ्गा नदी को प्रणाम करके ॥६७॥ मनुष्य को एक वर्ष तक मत्सररहित होकर एक शाम भोजन करना चाहिए । गौओं के साथ व्रत के अन्त में ब्राह्मणदम्पती की पूजा करके ॥६८॥ उस सुवर्ण निर्मित वृक्ष को ब्राह्मण को दान करे, ऐस करने वाला व्यक्ति अश्वमेध याग करने का फल प्राप्त करता है । इस व्रत का नाम कीर्तिव्रत है तथा यह ऐश्वर्य तथा कीर्ति प्रदान करने वाला है ॥६९॥ भगवान् शिव अथवा केशव को घृत से स्नान कराकर पुष्पों अथवा अक्षत से गोमय का मण्डल बनवाये ॥७०॥ वर्ष के अन्त में सुवर्ण निर्मित आठ अंगुल का कमल तिल तथा धनु का दान करे, वह शिवजी के लोक में जाकर पूजित होता है ॥७१॥ उसे सामगान करने वाले ब्राह्मण से सामगान कराना चाहिए इस व्रत को सामत्रत कहते हैं । नवमी तिथि को अपनी शक्ति के अनुसार एक भक्त (एकबार) भोजन करे वर्ष भरके बाद अपनी शक्ति के अनुसार कन्याओं को भोजन कराकर उन सबों को सुवर्ण, चोली तथा दो वस्त्र प्रदान करे तथा सुवर्ण निर्मित सिंह का दान ब्राह्मण को दे । ऐसा करने वाला शिव के लोक में जाता है ॥७२-७३॥ वह अरबों जन्मों तक सुन्दर रूप प्राप्त करता है, उसे शत्रु पराजित नहीं कर सकते हैं । यह मनुष्यों को सुख प्रदान करने वाला वीर ब्रत है ॥७४॥ जो दया से प्रेरित होकर चैत्र मास से लेकर चार महीनों तक लोगों को जल पिलाता है और व्रत के अन्त में अन्न वस्र
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