Srishti Khanda Extracted Page 316

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-316

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Sanskrit Original

वैष्णवं सपदं याति नीलब्रतमिदं स्मृतम् । आषाढादिचतुर्मासमभ्यंगं वर्जयेन्नरः ॥४९॥ भोजनोपस्करं दद्यात्स याति भवनं हरेः । जनप्रीतिकरं नृणां प््रीतिब्रतमिहोच्यते ॥ ५ ०॥ बर्जयित्व मधौ यस्तु दधिक्षीरधृतैक्षवम्। दद्याद्दसत्राणि सूक्ष्माणि रसपात्रेण संयुतम् ॥५१॥ संपूज्यविप्रमिथुनं गौरी मे प्रीयतामिति । एतद्वौरीब्रतं नाम भवानीलोकदायकम् ॥५२॥ पुष्पयादौ यस्त्रयोदश्यां कृत्वा नक्तमथो पुनः। अशोकं कांचनं दद्यादिक्षुयुक्तं दशांगुलम् ॥५३॥ विप्राय वस्त्रं संयुक्तं प्रद्युम्नः प्रीयतामिति । कल्पं विष्णुपुरे स्थित्वा विशोकस्स्यात्पुनर्नृूप ॥५४॥ एतत्कामब्रतं नाम सदा शोकविनाशनम्। आषाढादिव्रते यस्तु वर्जयेद्यः फलाशनम् ॥५५॥ चातुर्मास्ये निवृत्ते तु घटं सपिर्गुडान्वितम् । कार्तिक्यां तत्पुनहैंमं ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥५६॥ स रूद्रलोकमाप्रोति शिवव्रतमिदं स्मृतम्। वर्जयेद्यास्तु पुष्पाणि हेमंते शिशिरावृते॥५७॥ पुष्पत्रयं च फाल्गुन्यां कृत्वा शक्तया च कांचनम् । दद्याद् द्विकालवेलायां प्रीयेतां शिवकेशवौ॥५८॥ दत्वापरंपदं याति सौम्यब्रतमिदं स्मृतम् । फाल्गुनादि तृतीयायां लवणं यस्तु वर्जयेत् ॥५९॥ समांते शायनं दद्याद्गृहं चोपस्करान्वितम् । संपूज्य विप्रमिथुनं भवानी प्रीयतामिति ॥६०॥ गौरीलोके वसेत्कल्पं सौभाग्यब्रतमुच्यते । संध्यामौनं नरः कृत्वा समांते घृतकुंभकम् ॥६९॥ वस्रयुग्मं तिलान् घंटां ब्राह्मणाय निवेदयेत् । लोकं सारस्वतं याति पुनरावृत्ति दुर्लभम् ॥६२॥ अन्तर देकर रात्रि को भोजन करता है, तथा एक वर्ष के बाद, नील कमल तथा सुवर्ण निर्मित कमल तथा चिनी से भरे हुए पात्र के साथ बेल का दान करता ॥४८॥ वह भगवान् विष्णु के लोक में जाता है । इस व्रत को नील व्रत कहते हैं । जो व्यक्ति आषाढ़ से प्रारम्भ करके चार महीने तक अपने शरीर में तेल नहीं लगाता है और भोजन की सामग्री का दान करता है, वह भगवान् श्रीहरि के धाम में जातः है । वह लोगों को प्रसन्न करने वाला प्रीतिव्रत कहा गया है ॥४९-५०॥ जो व्यक्ति चैत्र मास में दही, दूध, घी तथा ईख के रस का परित्याग करके रस पात्र के साथ ब्राह्मण दम्पती की पूजा करके उन्हें गौरी की प्रसन्नता के लिए दान देता है, उसे .गौरी व्रत कहते हैं । उस व्रत को करने वाला भवानी के लोक में जाता हे ॥५२॥ त्रयोदशी तिथि में पुष्य नक्षत्र के प्रारम्भ में रात्रि में उपवास करके दश अङ्गुल का सुवर्ण निर्मित अशोक वृक्ष का ईख के साथ ब्राह्मण को वस्र के साथ प्रद्युम्नः प्रीयताम् कहकर दान करने वाला व्यक्ति एक कल्प तक भगवान् विष्णु के लोक में निवास करके शोक रहित हो जाता है । यह शोक का विनाश करने वाला कामत्रत कहलाता है । आषाढ महीने के प्रारम्भ में ही जो व्यक्ति फल खाना बन्द कर देता है॥५३-५४॥ चातुर्मास्य बीतने तक इस व्रत को करके चातुर्मास्य के बीत जाने पर घृत तथा गुड से भरकर कार्तिक मास की पूर्णिमा को सुवर्ण का घड़ा दान करता है ॥५६॥ वह रुद्र के लोक में जाता है, उसे शिवत्रत कहते हैं । जो व्यक्ति हेमन्त तथा शिशिर ऋतुओं में पुष्पों को धारण करना छोड़ देता है ॥५७॥ व्रत की समाप्ति पर फाल्गुन मास की पूर्णिमा को सुवर्ण के तीन फूलों को अपनी शक्ति के अनुसार बनवाकर ब्राह्मण को शिव तथा केशव की प्रसन्नता के लिए दान देता है ॥५८॥ वह परंपद को प्राप्त करता है, इस ब्रत को सौम्यव्रत कहते हैं । जो व्यक्ति फाल्गुन मास की तृतीया से प्रारम्भ करके एक वर्ष तक तृतीया तिथि को नमक नहीं खाता है । वर्ष की समाप्ति होने पर विप्रदम्पती की पूजा करके सामग्री से युक्त शय्या तथा गृह का दान भवानी की प्रसन्नता के लिए करता है ॥५९-६०॥ वह गौरी के लोक में एक कल्प तक निवास करता है, इसको सौभाग्य व्रत कहते हैं । जो ब्राह्मण एक वर्ष तक मौन होकर संध्या करता है ओर वर्ष के अन्त मे, घी से भरा घड़ा, दो वस्त्र, तिल तथा घण्टा ब्राह्मण को दान देता हैं

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