Srishti Khanda Extracted Page 315

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-315

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Sanskrit Original

प्रादात्कामगमं यानं लोकनाथश्वतुर्मुख: । संतुष्टस्तव राजेंद्र पुष्करं त्वं समाश्रय ॥३६॥ कल्पं सत्वं समासाद्यविभूतिद्वादशीव्रतम् । कुरु राजेद्रनिर्वाणमवश्यं समवाप्स्यासि॥३७॥ एतदुक्त्वा तु समुनिस्तत्रैवांतरधीयत। राजा यथोक्तं च पुनरकरोत्पुष्पवाहनः॥३८॥ इदमाचरतो राजन्नखंडव्रतता भवेत् । यथाकथचित्कालेन द्वादशद्वादशीर्जृप ॥३९॥ कर्तव्या शक्तितो देव विप्रेभ्यो दक्षिणा नृप। ज्येष्ठे गावः प्रदातव्या मध्ये भूमिरुत्तमा ॥४०॥ कनिष्ठे कांचनं देयमित्येषा दक्षिणा स्मृता । प्रथमं ब्रह्मदैवत्यं द्वितीयं वैष्णवं तथा ॥४९॥ तृतीयं रुद्रदैवत्यं त्रयो देवास्त्रिषु स्थिताः । इति कलुष विदारणं जनानां पठति च यस्तु श्रृणोति चापि भक्तया ॥४२॥ मतिमपि च स याति देवलोके वसति च रोमसमानि वत्सराणि । अथातः संप्रवक्ष्यामि ब्रतानामुत्तमं व्रतम् ॥४३॥ कथितं तेन रुद्रेण महापातकनाशनम्। नक्तमन्नं चरित्वा तु गवासार्ध कुटुंबिने ॥४४॥ हैमं चक्रं त्रिशूलं च दद्याद्विप्राय वाससी । एवं यः कुरुते पुण्यं शिवलोके स मोदते॥४५॥ एतदेव व्रतं नाम महापातकनाशनम् । यस्त्वेक भक्तेन क्षिपेद्धेनुं वृषसमन्विताम् ॥४६॥ धेनुं तिलमयीं दद्यात्स पदं याति शांकरम्। एतद्रुद्रवतं नाम भयशोकविनाशनम् ॥४७॥ यश्चनीलोत्पलं हैमं शर्करापात्र संयुतम् । एकांतरितनक्ताशी समांते वृषसंयुतम् ॥४८॥ करने के कारण हुए हें ॥३४॥ हे राजन् ! उस सत्य की महिमा के कारण तथा लोभ नहीं करने से तुम्हारे सारे पाप विनष्ट हो गये ॥३५॥ ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर तुम्हारी इच्छा के अनुसार चलने वाले इस पुष्कर मन्दिर को तुम्हे प्रदान किया है । अतएव हे राजन् ! तुम भी पुष्कर क्षेत्र में प्रसन्नता पूर्वक जाओ । वहाँ पर सत्त्वगुण सम्पन्न होकर विभूति द्वादशी ब्रत को करो । हे राजेन्द्र ! ऐसा करके तुम मोक्ष को प्राप्त कर लोगे ॥३७॥ इसतरह कहकर वे मुनि वहीं अन्तर्धान हो गये और उन्होंने जैसा कहा था उसी तरह से राजा पुष्पवाहन ने विभूति द्वादशी ब्रत का अनुष्ठान किया ॥३८॥ हे राजन् ! इस व्रत को अखण्ड व्रत करना चाहिए । जिस किसी भी समय से बारह द्वादशी ब्रत करे॥३९॥ और इस व्रत के अन्त में अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिए । ज्येष्ठ पुष्कर में गायों का दान करना चाहिए । मध्य पुष्कर में भूमि का दान करना चाहिए और कनिष्ठ पुष्कर में सुवर्ण का दान करना चाहिए । यही यहाँ की दक्षिणा बतलायी गयी है । ज्येष्ठ पुष्कर के देवता ब्रह्माजी हैं । मध्य पुष्कर के आराध्य भगवान् विष्णु बतलाये गये हैं ॥४०-४१॥ कनिष्ठ पुष्कर के अधिष्ठतृ देवता रुद्र हैं ये तीनों देवता इन तीनों पुष्करों में निवास करते हैं । यह प्रसङ्ग लोगों के पापों को विनष्ट करने वाला है, जो पुरुष इसको भक्ति पूर्वक पढता अथवा सुनता है ॥४२॥ अथवा इस ब्रत को करने का विचार करता है, वह देवलोक में जाकर उतने वर्षों तक निवास करता है । अब मैं आपको सर्वोत्तम ब्रत को वतलाता हूँ ॥४३॥ उसको रुद्र ने महापातक का नाश करने वाला बतलाया है । रात्रि में अन्न तैयार करके किसी कुटुम्ब वाले व्राह्मण को बुलाये और उसको सोने का चक्र और त्रिशूल बनवाकर गौ के साथ ब्राह्मण को दान दे तथा उसे दो वस्र भी दे । इसतरह करने वाला व्यक्ति शिवजी के लोक में जाकर आनन्दानुभव करता है ॥४४-४५॥ इसी को महापातक नाशन व्रत कहते है । जो व्यक्ति एक दिन एक ही अन्न को खाकर तिल निर्मित गौ और वृषभ का दान ब्राह्मण को देता है ॥४६।। वह भगवान् शङ्कर के लोक को प्राप्त करता है । इसको भय तथा शोक को विनष्ट करने वाला रुद्र व्रत कहते हैं ॥४७॥ जो व्यक्ति एक दिन का

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