Srishti Khanda Extracted Page 314

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-314

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Sanskrit Original

उपविष्टस्त्वमेकस्मिन्सभायों भवनांगणे । ततो रात्रौ भवांस्तत्र अश्रौषीन्मंगलध्वनिम् ॥२०॥ सभार्यस्तत्र गतवान्यत्रासौ मंगलध्वनिः । तत्र मंडलमध्यस्था विष्णो रर्चाविलोकिता ॥२१॥ वेश्याऽनंगवती नाम बिभ्रती द्वादशीव्रतम् । समाप्य माघमासस्य द्वादश्यां लवणाचलम्॥२२॥ न्यवेदयत्तु गुरवे शय्यां चोपस्करान्विताम् । अलंकृत्य हृषीकेशं सौवर्णं सममादरात् ॥२३॥ सा तु दृष्टा ततस्ताभ्यामिदं च घरिचिंतितम्। किमेभिः कमलैः कार्य वरं विष्णुरलंकृतः॥२४॥ इति भक्ति तदा जाता दंपत्योस्तु नरेश्वर। तत््रसंगात्समभ्यर्च्यं केशवं लवणाचलम्॥२५॥ शय्या च पुष्पप्रकरैः पूजिताऽ भूच्च सर्वशः । अथानंगवती तुष्टा तयोर्धान्यशतत्रयम् ॥२६॥ दीयतामादिदेशाथ कलधौतपलत्रयम् । न गृहीतं ततस्ताभ्यां महासत्वावलंबनात् ॥ २७॥ अनंगवत्या च पुनस्तयोरन्नं चतुर्विधम् । आनीय व्याहतं चान्नं भुज्यतामिति भूपते ॥२८॥ ताभ्यां च तदपित्यक्तं भोक्ष्यावः श्वो वरानने । प्रसंगादुपवासो नौ तवाद्यास्तु शुभावहः ॥२९॥ जन्मप्रभृतिपापिष्ठावावां देवि दृढव्रते । त्वत्प्रसंगाद्धवद्नेहे धर्मलेशोस्तु नाविह॥३०॥ इति जागरणं ताभ्यां तत्प्रसंगादनुष्ठितम् । प्रभाते च तया दत्ता शय्या सलवणाचला ॥३९॥ ग्रामश्च गुरवे भक्तया विप्रेभ्यो द्वादशैव तु। वस्त्रालंकारसंयुक्ता गावश्च कनकान्विताः ॥३२॥ भोजनं च सुहन्मित्रदीनांधकृपणैः सह । तच्चलुब्धकदांपत्यं पूजयित्वा विसर्जितम् ॥३३॥ स भवान् लुब्धको जातः सपत्नीको नृपेश्वरः । पुष्करप्रकराचस्मात्केशवस्य तु पूजनात्॥३४॥ विनष्टाशेषपापस्य तव पुष्करमंदिरम्। तस्य सत्यस्य माहात्म्यादलोभतपसा नृप ॥३५॥ में तुमने किसी मङ्गल ध्वनि को सुना ॥२०॥ जहाँ वह मङ्गलध्वनि हो रही थी वहाँ तुम अपनी पत्नी के साथ गये । वहाँ पर मण्डल के बीच में हो रही भगवान् विष्णु की अर्चा का तुमने अवलोकन किया ॥२१॥ उस दिन अनंगवती नामकी वेश्या द्वादशी व्रत की थी । उसने द्वादशी व्रत करके अपने गुरु को लवण का पर्वत दान दिया ॥२२॥ उसने अपने गुरु को उपस्करों से युक्त शय्या तथा सुवर्ण से समलंकृत करके भगवान् हृषीकेश की मूर्ति भी प्रदान किया॥२३॥ उस व्याध दम्पती ने यह सब कुछ देखा और सोचा, इन कमलों को रखकर हम क्या करेंगे, अच्छा है कि इनसे भगवान् विष्णु को अलंकृत कर दिया जाय ॥२४॥। हे राजन् ! इस प्रकार से उस व्याध दम्पती के मन में भक्ति उत्पन्न हो गयी, उसी प्रसङ्ग में उन दोनों ने लवणाचल केशव की अर्चना की और उस शय्या की भी अच्छी तरह से पुष्प समूह से पूजा की । उसके कारण वेश्या अनंगवती ने प्रसन्न होकर लोगों को आदेश दिया कि उन लोगों को तीन सौ धान्य तथा तीन पल सुवर्ण दिया जाय । किन्तु सत्त्वगुण के उद्रिक्त हो जाने से उन दोनों ने उसे नहीं लिया ॥२६-२७॥ इसके बाद अनंगवती चार प्रकार के अन्नों को लेकर आयी और कही कि आपलोग भोजन करें॥२८॥ उन दोनों ने उसको भी त्याग दिया और कहा हे वरानने ! हमदोनों कल भोजन करेंगे आपके ही कारण आज हम दोनों का मङ्गलमय उपवास हो गया ॥२९॥ हे दृढव्रत देवि ! हमदोनों जन्म से ही अत्यन्त पापी हैं, आपके ही सम्बन्ध से हमारे भी घर में थोड़ा धर्म हो जाय ॥३०॥ उसी के साथ उन दोनों ने रात्रिभर जागरण किया। प्रातःकाल होने पर उस वेश्या ने लवणाचल के साथ शय्या तथा ग्राम को अपने गुरु को दे दिया । उसने बारह ब्राह्मणों को भी दान दिया । वस्त्र, अलङ्कार तथा सुवर्ण युक्त गायों को उसने दान दिया । फिर उसने अपने सुहदो, मित्रों तथा कृपणों के साथ उस व्याध दम्पती को भोजन कराया और उसकी पूजा करके विदा किया ॥३१-३३॥ वे बहेलिया ही आप अपनी पत्नी के साथ राजाओं के स्वामी ही उस कमल समूह के द्वारा भगवान् केशव की पूजा

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