Srishti Khanda Extracted Page 313

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-313

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Sanskrit Original

भार्या मयाल्पतपसा परितोषितेन दत्तं ममांबुजगृहं च मुनींद्र धात्रा । यस्मिन््रविष्टमपि कोटिशतं नृपाणां सामात्यकुंजररथौघजनावृतानाम् ॥९२॥ नालक्ष्यते क्वगतमम्बरगामिभिश्च तारागणेंदुरविरश्मिभिरप्यगम्यम् । तस्मात्किमन्यजननीजठरोद्भवेन धर्मादिकं कृतमशेषजनातिगं यत् ॥१३॥ सर्वैर्मयाथतनयैरथवानयापि सद्धार्यया तदखिलं कथय प्रचेतः । सोप्यभ्यधादथ भवांतरितं निरीक्ष्य पृथ्वीपते शृणु तदद्धुतहेतुवृत्तम् ॥१४॥ जन्माभवत्तवतु लुब्धकुलेपि घोरं जातस्त्वमप्यनुदिनं किल पापकारी । वपुरप्यभूत्तव पुनः पुरुषांगसंधि दुर्गधिसत्वकुनखाभरणं समंतात् ॥१५॥ न च ते सुहन्नसुतबंधुजनो न तादूक् नैव स्वसा न जननी च तदाभिशस्ता । अतिसंमता परमभीकष्टतमा भिमुखी जाता महीश तव योषिदियं सुरूपा ॥१६॥ अभूदनावृष्टिरतीव रौद्रा कदाचनाहारनिमित्तमस्याम् । ् षुत्पीडितेन भवता तु यदा न किंचि दासादितं वन्यफलादिभक्ष्यम् ॥९७॥ अथाभिदृष्टं महदंबुजाढ्यं सरोवरं पंकपरीतरोधः। पद्ान्यथादाय ततो बहूनि गतः पुरं वै दिशनामधेयम् ॥१८॥ तन्मूल्यलाभाय पुरं समस्तं भ्रांत त्वया शेषमहस्तदासीत् । क्रेता न कश्चित्तवकमलेषु जातः क्लांतः परं क्षुत्परिपीडितश्च ॥९९॥ अपने उन पुत्रों को देखकर राजा पुष्पवाहन बार-बार आश्चर्यित हो जाते थे ॥१०॥ एक बार उनके यहाँ प्रचेतसमुनि आये और राजा ने उनकी पूजा करके उनसे पूछा-- हे प्रचेतः आप बतलायें कि किस पुण्य के फल स्वरूप मुझको अचल ऐश्वर्य तथा देवताओं द्वारा पूजा की प्राप्ति हुयी है तथा लक्ष्मी के समान सुन्दर रानी मिली ॥११॥ मेरे द्वारा की गयी थोड़ी सी तपस्या के द्वारा सन्तुष्ट होकर ब्रह्माजी ने मुझे कमलरूपी गृह प्रदान किया है । उस कमल में मन्त्रियों हाथियों तथा रथों के साथ सैकड़ों करोड़ राजाओं के प्रवेश कर जाने पर भी, यह पता नहीं चलता है कि वे सब कहाँ चले गये ? इस बात को देवता भी नहीं जान पाते, उसका पता तारागण, चन्द्रमा तथा सूर्य भी नहीं लगा पाते हैं। कया इससे भी अधिक उत्कृष्ट तपस्या किसी दूसरे व्यक्ति ने किया है ॥१२-१३॥ क्या उसको मेरे पुत्रों से अधिक पुत्र अथवा मेरी पत्नी से अधिक सुन्दर पत्नी प्राप्त है ? इन सारी बातों को आप मुझे बतलाएँ महर्षि प्रचेता ने भी उस राजा के पूर्वजन्मों का साक्षात्कार करके कहा राजन् ! आप इस अद्धुत वृत्तान्त को सुनें ॥१४॥ पूर्वजन्म में तुम्हारा जन्म भयङ्कर व्याधों के वंश में हुआ और तुम प्रतिदिन पाप कर्म करते थे । तुम्हारे शरीर से सदा दुर्गधि निकलती रहती थी और तुम निन्दित नखों के आभूषणों को धारण करते थे ॥१५॥ तुम्हारे, मित्र, पुत्र, बंधु, बहन तथा तुम्हारी माता सबके सब निन्दित कोटि के थे, किन्तु हे राजन् ! तुम्हारी सुन्दरी पत्नी अपने पति को अत्यन्त प्रिय थी ॥१६॥ एक बार बहुत बड़ी अनावृष्टि हुयी, उसमें भूख से पीडित होकर तुम दोनों आहार करने के लिए जब कोई भी वन्य फल नहीं प्राप्त कर सके तो ॥१७॥ तुम दोनों ने एक कमल से भरे हुए सरोवर को देखा । वहाँ से कमलों को लेकर तुम दोनों विदिशा नामक नगर में गये ॥१८॥ उस दिन उन कमलों का मूल्य प्राप्त करने के लिए तुम दिन भर धूमते रहे, किन्तु उन कमलों को खरीद ने वाला वहाँ कोई नहीं मिला और तुम दोनों अत्यन्त भूखे तथा थके हुए थे ॥१९॥ तुम अपनी पत्नी के साथ एक भवन के आंगन में बैठ गये, वहाँ पर रात्रि

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