Srishti Khanda Extracted Page 312
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-312
Sanskrit Original
बीसवाँ अध्याय भीष्म उवाच अत्याश्चर्यवती रम्या कथेयं पापनाशिनी। विस्तरेण च मे ब्रूहि याथातथ्येन पृच्छतः ॥१॥ माहात्म्यं मध्यमस्यापि ऋषिभिः परिकीर्तितम् । फलं चान्नस्य कथितं माहात्म्यं च दमस्य तु ॥२॥ विष्णुना च पदन्यासः कृतो यत्र महामुने । कनीयसस्तथोत्पत्तिर्थथाभूता वदस्व मे ॥३॥ पुलस्त्य उवाच पुरा रथंतरे कल्पे राजासीत्पुष्पवाहनः । नाम्रा लोकेषु विख्यातस्तेजसा सूर्यसन्निभः ॥४॥ तपसा तस्य तुष्टेन चतुर्वक्त्रेण भारत । कमलं कांचनं दत्तं यथाकामगमं नृप ॥५॥ सप्तद्वीपानि लोकं च यथेष्टं विचरत्सदा । कल्पादौ तु समं द्वीपं तस्य पुष्करवासिना ॥६॥ लोकेन पूजितं तस्मात्पुष्करट्वीपमुच्यते । तदेव ब्रह्मणा दत्तं यानमस्य ततोंबुजम् ॥७॥ पुष्पवाहन इत्याहु तस्मात्तं देवदानवाः । नौपम्यमस्तीह जगत्त्रयेपि ब्रह्मांबुजस्थस्य च तस्य राज्ञः॥८॥ तपोनुभावादथ तस्य राज्ञी नारीसहस्रैरभिबंद्यमाना । नाम्ना चलावण्यवती बभूव या पार्वतीवेष्टतमा भवस्य ॥९॥ तस्यात्मजानामयुतं बभूव धर्मात्मनामग्र्यधनुर्धराणाम् । तदात्मजांस्तानभिवीक्ष्य राजा मुहुर्मुहुर्विस्मयमासाद ॥१०॥ सोभ्यागतं पूज्य मुनिप्रवीरं प्रचेतसं वाक्यमिदं बभाषे । कस्माद्विभूतिरचलामरमर्त्यपूजा जाता कथं कमलजा सदृशी सुराज्ञी ॥११॥ मध्यपुष्कर का माहात्म्य, पुष्पवाहन राजा की कथा, विभूति द्वादशी इत्यादि साठ व्रतों का वर्णन तथा स्नान एंव तर्पण विधि भीष्मजी ने कहा-- यह पापों को विनष्ट करने वाली कथा अत्यन्त मनोहर है, इसे आप पूर्ण रूप से मुझे विस्तार से सुनायें ।।१॥ ऋषियों ने मध्यम पुष्कर का माहात्म्य बतलाया है । आपने अन्नदान करने का फल बतलाया तथा दम का भी महत्त्व बतलाया है ॥२॥ जहाँ पर भगवान् विष्णु ने निवास किया उस छोटे पुष्कर की उत्पत्ति का मी वर्णन आप करें ॥३॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- प्राचीन रथन्तर कल्प में एक पुष्पवाहन नाम का राजा हुआ उसका नाम लोकों में विख्यात था और वह सूर्य के समान तेजस्वी था ॥४॥ हे भारत ! उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसको स्वर्णिम कमल तथा इच्छानुसार गमन का वरदान दिया । वह सातो द्वीपों तथा सभी लोकों में अपनी इच्छा के अनुसार विचरण करता था । कल्प के प्रारम्भ में उस पुष्कर (कमल) में निवास करने वाले राजा के साथ उस द्वीप की भी पूजा हुयी इसीलिए उसका नाम पुष्कर द्वीप हुआ । इसीलिए ब्रह्माजी ने उसे पुष्कर विमान प्रदान किया ॥६-७॥ इसीलिए सभी देवता तथा दानव उसको पुष्पवाहन कहते थे । ब्रह्माजी के द्वारा प्रदत्त कमल में रहने वाले उस राजा की उपमा त्रैलोक्य में किसी वस्तु से नहीं दी जा सकती थी ॥८॥ उसकी रानी भी अपनी तपस्या के प्रभाव से हजारों नारियों द्वारा वन्दित थी । गुण के ही अनुसार उसका नाम लावण्यवती था । जिस तरह पार्वतीजी शिवजी की प्रियतमा हैं उसी तरह वह राजा पुष्पवाहन को प्रिय थी ॥९। उसके दश हजार श्रेष्ठ धनुर्धर पुत्र हुए ।
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