Srishti Khanda Extracted Page 311

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-311

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Sanskrit Original

ब्रह्मणस्सदनं यातु विसस्तैन्यं करोति य: । ऋषय ऊचु: इष्टमेवद्विजातीनां यदिदं शपथी कृतम् ॥३६०॥ त्वया कृतं बिसस्तैन्यं सर्वेषां नः शुनः सख । शुनःसख उवाच मयाह्यांतर्हितान्यासन् बिसानीमानि वोद्विजाः ॥३६९॥ धर्म च श्रोतुकामेन जानीध्वं मां च वासवम् । अलोभादक्षयालोका जिता वो मुनिसत्तमाः ॥३६२॥ विमानमधितिष्ठध्वं गच्छामस्त्रिदशालयम् । ततो महर्षयस्ते तु विज्ञायाथपुरंदरम् ॥३६३॥ ऊचुःपुरंदरं चेदं वाक्यं वाक्यविशारदाः। इहागत्य नरो यस्तु मध्यमं पुष्करं विशेत् ॥३६४॥ त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा लभेदावश्यकं फलम्। द्वादशवार्पिकीदीक्षा स्मृताया तु वनौकसाम् ॥३६५॥ तस्याः फलं समग्रं च लभेदिह न संशयः। नासौदुर्गतिमाप्रोति स्वगणैः सह मोदते ॥३६६॥ विरिञ्जिस्थानमासाद्यतिष्ठेद्वै ब्रह्मणो दिनम्। पुलस्त्य उवाच इद्रेण सह संप्रीतास्तदाजग्मुस्त्रिविष्टपम् ॥३६७॥ एवं विलोभ्यमानास्ते लोभैर्बहुविधैरिह । नैव लोभं तथा चक्रुस्तेन जग्मुस्त्रविष्टपम् ॥३६८॥ इदं यः शृणुयान्नित्यमृषीणां चरितं शुभम्। विमुक्तः सर्वपापेभ्यः स्वर्गलोके महीयते ॥३६९॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे सप्तर्षिसंवादो नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९॥ — ke ब्रह्माजी के लोक में जाय जिसने मृणाल को लिया है उसकी ऐसी ही गति हो । शुन: सख की बात को सुनकर ऋषियों ने कहा-- तुमने तो द्विजातियों के अनुकूल शपथ किया है ॥३६०॥ इससे लगता हैं कि तुमने ही मृणालों को चुराया है । शुनःसख ने कहा-- हे ब्राह्मणों ! मेने ही इन मृणालों को छिपा दिया था ॥३६१॥ में आपलोगों के मुख से धर्म की बातें सुनना चाहता था । मैं इन्द्र हूँ । हे श्राठ मुनियों ! आपलोगों ने लोभ रहित होने के कारण अक्षय लोकों को जीत लिया है ॥३६२॥ आपलोग इस विमान पर वेठें, हम सभी स्वर्ग लोक चलते हैं । उसके बाद वाक्य विशारद उन महर्षियों ने शुनःसख को इन्द्र जानकर ॥३६३॥ उनसे कहा-- इस मध्य पुष्कर में आकर जो व्यक्ति तीन रात्रियों तक उपवास करके निवास करे वह अपने समस्त अभिप्रेत फल को प्राप्त करे । वनवासियों की जो बारह वर्षो की दीक्षा बतलायी गयी है उसका जो फल बतलाया गया है, उस फल को वह मनुष्य पूर्णरूप से प्राप्त करे । वह कभी दुर्गति को न प्राप्त करे और अपने बान्धवों के साथ आनन्दित हो ॥३६४-३६६॥ वह ब्रह्माजी के लोक में जाकर पूरे एक कल्प तक निवास करे । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- इसके बाद वे सभी महर्षिगण इन्द्र के साथ प्रसन्नता पूर्वक स्वर्गलोक में चले गये ॥३६७॥ इसतरह से इस लोक में अनेक प्रकार के लोभ से लुभाये जाने पर भी वे चूकि लोभ नहीं किए इसीलिए वे महर्षिगण स्वर्गलोक में गये ॥३६८॥ जो मनुष्य महर्षियों के इस चरित्र का सदा श्रवण करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर स्वर्गलोक में जाता है ॥३६९॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के सप्तर्षि संवाद नामक उन्नीसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। १९।। नल ie

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