Srishti Khanda Extracted Page 310
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-310
Sanskrit Original
मत्सरी पिशुनश्चैव बिसस्तैन्यं करोति यः । प्रत्याक्रोशत्ववाकृष्टस्ताडयत्वन्यताडितः ॥३५०॥ विक्रीणातु रसांश्चैव बिसस्तैन्यं करोति यः । गौतम उवाच अतिथि त्वागतं प्राप्य पाकभेदं करोतु सः ॥३५१॥ शूद्रान्नं च सदाश्नातु बिसस्तैन्यं करोति यः। दत्वा दानं कीर्तयतु परभार्यासु तुष्यतु ॥३५२॥ एकाकी मिष्टमश्नातु बिसस्तैन्यं करोति यः । विश्वामित्र उवाच नित्यकामपरः सोस्तु दिवसे चैव मैथुनी ॥३५३॥ नित्यं तु पातकी चैव बिसस्तैन्यं करोति यः। परापवादं वदतु परदारांश्च सेवतु ॥३५४॥ परनिंदारतश्चास्तु बिसस्तैन्यं करोति यः । मातरं पितरं चैव सोवमन्यतु दुर्मतिः॥३५५॥ समातर्यन्यबुद्धिः स्याद्विसस्तैन्यं करोति यः। परपाकं सदाश्चातु परनारी च सेवतु॥३५६॥ वेदविक्रयकृच्चास्तु बिसस्तैन्यं करोति यः । जमदग्निरुवाच परस्य यातु प्रेष्यत्वं स तु जन्मनि जन्मनि ॥३५७॥ सर्वधर्मक्रियाहीनो बिसस्तैन्यं करोति यः। शुनःसख उवाच न्यायेन वेदानध्येतु गृहस्थो स्तुप्रियातिथिः ॥३५८॥ सत्यं वदतु वाजन्त्रंबिसस्तैन्यं करोति यः । अग्नि जुहोतु विधिवद्यज्ञं यजतु नित्यशः ॥३५९॥ पड़े और ब्राह्मण होकर भी शूद्रा स्री से उसका सम्बन्ध हो ॥३४८॥ ऐसे लोगों को जिस लोक में जाना पड़ता है, उसी लोक में वह जाय । भरद्वाज महर्षि ने कहा-- जो मृणाल को चुराया हो वह अत्यन्त क्रूर स्वभाव वाला हो जाय हर प्रकार की समृद्धि के कारण वह अहङ्कारी हो जाय ॥३४९॥ लोगों से डाह करने वाला तथा चुगुलखोर हो जाय । दूसरे द्वारा की जाने वाली निन्दा को सुनकर वह भी निन्दा करे, दूसरे के द्वारा मारे जाने पर वह उसको मारे। ३ ५०॥ वह रस बेचने का काम करे । गौतम महर्षि ने कहा-- जिसने हमलोगों के मृणाल की चोरी की है, वह किसी अतिथि के आने पर उसके लिए दूसरा (खराब) भोजन बनवाये ॥३५१॥ सदा शूद्र का दिया हुआ अन्न खाय, दान देकर अपनी प्रशंसा करे तथा दूसरों की पत्नियों से सम्बन्ध रखे ॥३५२॥ वह अकेले ही अच्छी वस्तु को खा ले । विश्वामित्र ऋषि ने कहा-- जिसने मृणाल की चोरी की है, वह सदा कामी बना रहे, दिन में ही मैथुन करे ।।३५३।। वह सदा पाप कर्मा को करता रहे । वह दूसरों की निन्दा करे तथा दूसरों की पत्नी का सेवन करे॥३५४॥ वह सदा दूसरों की निन्दा करे तथा वह मूर्ख अपने माता-पिता का अपमान करे ॥३५५॥ वह अपनी समाता (माता की सौत के साथ दुष्टता) का व्यवहार करे, सदा दूसरे के लिए बनाये गये भोजन को खाय तथा दूसरे की पत्नी का सेवन करे ।।३५६।। उसको वेदों के बेचने का पाप लगे । जमदग्नि महर्षि ने कहा-- वह अनेक जन्मों में दूसरों का नौकर बने ।।३५७।। वह सभी प्रकार की धार्मिक क्रियाओं से हीन हो जाय । शुनःसख ने कहा-_ जिसने मृणालों को लिया है वह न्याय पूर्वक वेदों का अध्ययन करे, वह अतिथियों का प्रिय गृहस्थ होए॥३५८॥ वह सदैव सत्य बोले, वह विधिपूर्वक अग्निहोत्र करे । वह सदैव यज्ञों को करता रहे ॥३५९। और
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