Srishti Khanda Extracted Page 309

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-309

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Sanskrit Original

एवं वै धर्मसर्वस्वमुक्ता ते तु शुनः सखम्। तेनैव सहिताः सर्वे निविष्टास्सरसस्तटे ॥३३९॥ सरो पश्यन्सुविस्तीर्ण पद्योत्पलजलावृतम् । तत्रावतारं कृत्वा ते बिसानि च कलापशः ॥३४०॥ तीरे निक्षिप्य सरसश्चक्ुः पुण्यां जलक्रियाम् । अथोत्तीर्य जलात्तस्मात्ते समेत्य परस्परम् ॥३४९॥ बिसान्येतान्यपश्यंत इदं वचनमन्रुवन्। ऋषय ऊचुः केन क्षुधाभितप्तानामस्माकं पापकर्मणाम् ॥३४२॥ नृशंसेनापनीतानि विसान्याहारकांक्षिणा । ते शंकमानास्त्वन्योन्यं पर्यपृच्छन् द्विजोत्तमाः ॥३४३॥ चक्कु श्चनिश्चयं सर्वे शपथं प्रति पार्थिव । कश्यप उवाच सर्वत्र सर्वं हरतु न्यासलोपं करोतु च ॥३४४॥ कूटसाक्षित्वमभ्येतु बिसस्तैन्यं करोति यः । दंभेन धर्म चरतु राजानं चोपसेवताम् ॥३४५॥ मधुमांसं समश्नातु बिसस्तैन्यं करोति यः । अनृतं भाषतु सदा विषयांश्चोपसेवतु ॥३४६॥ ददातु कन्यां शुल्केन बिसस्तैन्यं करोति यः । वसिष्ठ उवाच अनृतौ मैथुनं यातु दिवास्वप्नं निषेवतु ॥३४७॥ अन्योन्यातिथितामेतु बिसस्तैन्यं करोति य: । एककूपेवसेदग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपतिः ॥३४८॥ तस्य सालोक्यतां यातु बिसस्तैन्यं करोति यः । भरद्वाज उवाच नृशंसस्सोऽ स्तुसर्वेषु समृध्या चाप्यहंकृतः ॥३४९॥ उपदेशों का सार यह उपदेश है । हे राजन् भीष्म ! सभी जीवों के कल्याणार्थ किया गया अध्ययन मुक्तिप्रद होता है।३३८॥ ऋषियों ने इस तरह से धर्म के सार का शुन: सखा को उपदेश दिया और उसी के साथ वे सरोवर के तट पर गये ॥३३९॥ उन लोगों ने कमल से व्याप्त उस विस्तृत सरोवर को देखा उस सरोवर में प्रवेश करके मृणाल को ढेर के ढेर उखाड़कर तीर पर रख दिया । इसके बाद उन लोगों ने सरोवर के जल से पवित्र तर्पणादि क्रिया को किया । उसके बाद वे जब एक साथ सरोवर से बाहर निकले तो ॥३४०-३४१॥ देखा कि वे मृणाल वहाँ पर नहीं थे । मृणालों को नहीं देखकर ऋषियों ने कहा-- कौन ऐसा पापी है जो भूख से सन्तप्त हमलोगों के मृणालों को चुरा लिया है । भोजन करना चाहने वालों के अहार को किसने चुराया है, वे एक दूसरे पर शङ्का करके एक दूसरे से पूछे भी ॥३४२-३४३॥ हे राजन् ! उनलोगों ने शाप देने का निश्चय भी कर लिया । कश्यप महर्षि ने कहा-- जिसने मृणाल की चोरी की हो उसको सर्वत्र सब कुछ चुराने का, रखी हुयी थाती को हड़पने का।।३४४॥ और झूठी गवाही देने का पाप लगे । वह दम्भपूर्वक धर्माचरण करे, तथा उसे राजा की सेवा करनी पड़े ॥३४५॥ जिसने मृणाल की चोरी की है वह मदिरा पीए तथा मांस खाये, वह सदा मिथ्या भाषण करे तथा विषयों को भोगता रहे ॥३४६॥ जिसने हमलोगों के मृणाल को चुराया है उसे पैसा लेकर कन्या बेचने का पाप लगे । वसिष्ठ महर्षि ने कहा-- जिसने हमलोगों के विस को चुराया है वह बिना ऋतुकाल के भार्यागमन करे, दिन में उसको स्वप्नदोष होए ॥३४७॥ वह एक दूसरे के यहाँ अतिथि बन कर जाय । जिस ग्राम में एक ही कूआँ हो उसी ग्राम में उसे रहना

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