Srishti Khanda Extracted Page 308
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-308
Sanskrit Original
कामक्रोधौ विनिर्जित्य किमरण्ये करिष्यति । अभ्यासेन तु वै शास्त्र कुलं शीलेन धार्यते ॥३२५॥ गुणैर्मन्त्रा विधार्यन्ते क्रोधस्सत्त्वेन धार्यते। यस्तु कोधं समुत्पन्नं संधारयति चात्मनः ॥३२६॥ अक्रोधेन जयेद्वीरः कस्तेन सदृशो भुवि । यस्तु क्रोधं समुत्पन्नं संतं संयम्य तिष्ठति ॥३२७॥ तं सत्सारतमम्मन्ये नास्मिन्सीदति यः पुमान्। एष पैतामहो गुह्यो ब्रह्मराशिस्सनातनः ॥३२८॥ घर्मस्य नियमो यो हि मया ते कथितो भृशम् । अन्ये च यज्वनां लोका अन्ये चापि तपस्विनाम् ॥३२९॥ अन्ये दमवतां लोकास्ते वै परमपूजिता: । एकः क्षमावतां दोषो द्वितीयो नोपपद्यते ॥३३०॥ यदिदं क्षमया युक्तमशक्तंमन्यते जनः । न चैष दोषो मंतव्यः क्षमा प्रज्ञावतां बलम् ॥३३१॥ प्रशमं योभिजानाति इष्टापूर्त महीयते । यत्क्रोधयुक्तो जपति जुहोति च यदर्चति ॥३३२॥ सर्वक्षरति तत्तस्य भिन्नकुंभादिवोदकम् । दमाध्यायमिमं पुण्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ॥३३३॥ सधर्मनावमारुहा दुर्गाण्यतितरिष्यति। दमाध्यायमिमं पुण्यं सततं आवयेद्द्विजः ॥३३४॥ स ब्रह्मलोकमाप्रोति तस्मान्न च्यवते पुनः । श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैतत््रधार्यताम् ॥३३५॥ आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् । मातृवत्परदारांश्च परद्रव्याणि लोष्ठवत् ॥३३६॥ आत्मवत्सर्वभूतानि यः पश्यति स पश्यति । पचनं वैश्वदेवार्थे परार्थे यच्च जीवितम् ॥३३७॥ एतद्भवेच्च सर्वस्वं धातूनामिव कांचनम् । सर्वभूतहितं राजन्नधीत्यामृतमश्नुते ॥३३८॥ स्वीकार करना, किसी वस्तु की अपेक्षा नहीं रखना तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना ये सभी मोक्ष को प्राप्त कराने वाले हे ॥३२४॥ जिसने काम तथा क्रोध पर विजय प्राप्त कर लिया है, वह वन में जाकर क्या करेगा ? अभ्यास से शास्त्र की, और शील से वंश की, रक्षा की जाती हैं ॥३२५॥ गुणों से मन्त्र की रक्षा की जाती है तथा सत्व से क्रोध को रोका जाता है । जो व्यक्ति अपने उत्पन्न हुए क्रोध को रोक लेता हे ॥३२६॥ जो व्यक्ति अक्रोध के द्वारा क्रोध को जीत लेता हैं, उसके समान संसार में दूसरा कोई वीर नहीं होता है ।जो व्यक्ति उत्पन्न हुए क्रोध को संयमित कर लेता हे ॥३२७॥। वही ब्रह्माजी के उपदेश का श्रेष्ठ सार है, यह सनातन वेदराशि है, व्यक्ति को इसके विषय में मनुष्य को असावधान नहीं होना चाहिए ॥३२८॥ मेने खूब अच्छी तरह से धर्म के नियमों को समझा दिया है । यज्ञ करने वालों को प्राप्त होने वाले लोक दूसरे हैं, तपस्वियों को प्राप्त होने वाले दूसरे हैं और ॥३२९॥ उनका पालन करने वालो को परम पूज्य लोक होते है । क्षमा करने वालों को प्राप्त करके दोष एक ही रहता है, वह एक से दो नहीं हो पाता है ॥३३०॥ क्षमा करने वालों को जो लोग असमर्थ मानते है, उसे दोष नहीं मानना चाहिए । क्षमा तो ज्ञानियों का वल है ॥३३ १॥ जो क्रोध को शान्त करना जानता है, उसके इष्टापूर्त कर्म समृद्ध होते हे । क्रोध करने वाल के जप, होम तथा पूजन ये सबके सब उसी तरह विनष्ट हो जाते हैं ॥३३२॥ जिस तरह फूटे हुए घड़े का सारा जल वह जाता है । जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर इस दमाध्याय का पाठ करेगा ॥३३३॥ वह धर्म की नाव पर चढकर सभी विपत्तियों को पार कर लेगा । द्विज को चाहिये कि वह इस पवित्र दमाध्याय को सुनाये ॥३३४॥ वह ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है, उस लोक से उसका पतन नहीं होता है ।आप धर्म के सारांश को सुनिये और सुनकर अपने हृदय में धारण कीजिये ।।३३५। जो अपने को प्रतिकूल प्रतीत हो उसको दूसरों के प्रति नहीं करे दूसरे की पत्नी को माता के समान तथा दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले के समान समझना चाहिए ॥३३६॥ जो अपने ही समान सभी जीवों को देखता है, उसी का दर्शन सददर्शन है, वही जीवन है जिसमें भोजन बलिवैश्वदेव करने के लिए, तथा दूसरों के लिए बनाया जाता है ॥३३७॥ जिस तरह सभी धातुओं का सार सुवर्ण है, उसीतरह सभी
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