Srishti Khanda Extracted Page 307

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-307

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Sanskrit Original

अपमानितस्तु न ध्यायेत्तस्य पापं कदाचन । स्वधर्ममपि चावेक्ष्य परधर्म न दूषयेत् ॥३९२॥ आत्मानमपि जानीयात्परं दोषैस्तु नाक्षिपेत् । मंत्रैहींनं क्रियाभिर्वा जन्मनाऽप्यथवा पुनः ॥३१३॥ दमश्छादयते सर्व॑ हीनमंगं पटो यथा । अधीयन्ते निरर्थन्ते नाभिजानाति ये दमम् ॥३१४॥ श्रुतस्य हि दमो मूलं दमो धर्मः सनातनः । योह्यात्मनस्तु लयते सुवर्ण तुलया दमम् ॥३१५॥ स तेन धृतिमान्ख्यातो न तु द्रव्येण मोहितः । व्रतानामपि सर्वेषां दम एव परायणम्॥३१६॥ यद्यधीते षडंगानि वेदतत्वार्थविद्द्विजः । दमेन तु विहीनश्च पूज्यत्वं नेह गच्छति ॥३१७॥ दमेन हीनं न पुनंति वेदा यद्यप्यधीता: सहषड्भिरङ्गै । सांख्यंच योगश्चकुलं च जन्म तीर्थाभिषेकश्च निरर्थकानि ॥३१८॥ अमृतस्येव तृप्येत अपमानस्य योगवित् । विषवच्च जुगुप्सेत संमानस्य सदा द्विजः॥३९९॥ अपमानात्तपोवृद्धिः संमानाच्च तपःक्षयः । अर्चितः पूजितो विप्रो दुग्धा गौरिव गच्छति॥३२०॥ पुनराप्यायते धेनुः सतृणैः सलिलै र्यथा । एवं जपैश्च होमैश्च पुनराप्यायते द्विजः ॥३२९॥ आक्रोशक समो लोक सुहृदन्यो न विद्यते । यस्तु दुष्कृतमादाय सुकृतं स्वं प्रयच्छति ॥३२२॥ आक्रोशमानान् नाक्रोशेन्मन्युं स्वं विनिवर्तयेत्। सन्नियम्य तदात्मानममृतेनाभिषिंचति ॥३२३॥ कपालं वृक्षमूलानि कुचेलमसहायता। अनपेक्षा ब्रह्मचर्यं नयन्ति परमां गतिम्॥३२४॥ अपमान करने वाले के अकल्याण की भावना नहीं करनी चाहिए, उसे अपने धर्म का भी विचार करके दूसरे के धर्म की निन्दा नहीं करना चाहिए ॥३१२॥ मनुष्य को अपने स्वरूप को भी जानना चाहिए किन्तु दूसरों पर दोष नहीं लगाना चाहिए । चाहे वह मन्त्र, क्रिया तथा जन्म से हीन कोटि का ही क्यों न हो ॥३१३॥ जिस तरह हीन अङ्ग को वस्त्र ढंक देता है, उसी तरह दम भी समस्त दोषों को ढँक देने का काम करता है । वे लोग व्यर्थ ही वेदाध्ययन करते है जों दम के स्वरूप आदि को नहीं जानते हैं ॥३१४॥ वेदाध्ययन (ज्ञान) का मूल दम है, दम ही सनातन धर्म है, जो सुवर्ण के समान मूल्यवान् दम को आत्मा से करता है, वह उसी के कारण धैर्यवान रूप से प्रख्यात होता है, द्रव्य से मोहित होने वाला पावन नहीं कहलाता है । सभी व्रतों का आश्रय दम ही है ॥३१५-३१६॥ यदि कोई ब्राह्मण षडड़वेद का अध्ययन करता है; किन्तु दम से रहित है तो वह इस संसार में पूज्य नहीं हो पाता है॥३१७॥ दैम से रहित व्यक्ति की शुद्धि षडङ्गवेदाध्ययन से नहीं होती है उसके लिए सांख्य तथा योग दर्शन का ज्ञान सद्वंश में जन्म, तीर्थो में जाकर स्नान करना ये सब के सब निरर्थक होते हैं ॥३१८॥ योगवेत्ता को अपमान को अमृत के समान मानकर तृप्त हो जाना चाहिए और ब्राह्मण को चाहिए कि वह सम्मान को विष के समान समझकर उसमें घृणा का अनुभव करे ॥३१९॥ अपमान के द्वारा तपस्या बढती है, और सम्मान के द्वारा तपस्या का क्षय होता हे । अर्चा तथा पूजा प्राप्त करके ब्राह्मण उस स्थान पर उसी तरह से जाता है जिस तरह गाय का सारा दूध दूहकर वहाँ से भेज दिया जाय ॥३२०॥ जिसतरह दूहने के बाद गौ की पुष्टि तूण और जल से पुन: होती है, उसी तरह जप तथा होम के द्वारा उस ब्राह्मण की पुनः पुष्टि होती है ॥३२१॥ निन्दा करने वाले के समान दूसरा कोई हितैषी नहीं होता है; क्योंकि निन्दा करने वाला अपना पुण्य देकर तथा निन्दा किए जाने वाले के पाप को लेकर चला जाता है ॥३२२॥ ब्राह्मण को चाहिए कि वह निन्दा करने वाले की निन्दा न करे, अपितु उसके प्रति होने वाले अपने क्रोध को रोक ले । अपने क्रोध को रोक कर वह अपनी आत्मा का अमृत से सींचन करता है ॥३२३॥ नारियल का भोजन पात्र (कपाल) रखना, वृक्ष की जड़ में निवास करना, मैला कुचैला वस्त्र धारण करना किसी की सहायता नहीं

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